ब्रह्मास्त्र देश दुनिया के घटनाक्रम, भारत की राजनीति, भारत की संस्कृति और सभ्यता, समाज की वर्तमान स्थिति पर अभिव्यक्ति का माध्यम है.
विचार
शनिवार, 27 अप्रैल 2019
नारे : मौत के सौदागर से चौकीदार चोर है तक
आधे देश में मोदी के इर्द गिर्द लड़ा जा रहा है चुनाव
मंगलवार, 19 मार्च 2019
मोदी के जल रूट पर प्रियंका वाड्रा का सफर
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019
विपक्षी गठबंधन : ज्यादा जोगी मठ उजाड़
हस्तिनापुर(तकरीबन वर्तमान दिल्ली) के लिये समर की तैयारियां तेज हो गईं हैं। दोनों ही पक्ष , सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने तीर कमान दुरुस्त करने में जुटा है। दोस्त भी जुटाए जा रहे हैं। इस पर दोनों पक्षों से अलग तमाम लोग नज़र भी रख रहे हैं। इस बीच मुझे एक बार फिर लगता है कि जीत तो उसी की होगी जिस तरफ कृष्ण(जनता) होंगे। भले ही उनकी अक्षौहिणी सेना(तमाम राजनीतिक दलों को समझ सकते हैं) किसी दूसरी तरफ से लड़े, एक बार फिर यह मानने में कोई दो राय नहीं होगी कि किसी भी प्रकार से घटनाक्रम ऐसा घटित होगा कि कृष्ण सही और उचित की ओर से लड़ेंगे यानी जीत तो सच की होनी चाहिए। खैर इस दृष्टांत के जरिये मैं आने वाले लोकसभा चुनाव को समझने का प्रयास कर रहा हूँ। इससे पहले हमारे यहां मशहूर दो कहावतों पर नज़रसनी चाहता हूँ। एक ज्यादा जोगी मठ उजाड़ और दूसरा नौ कनौजिया नब्बे चूल्हा मोटामोटी अर्थ यह समझिए कि इतने अधिक विभिन्नता वाले लोगों में मतैक्य की गुंजाइश कम समझिए। अब चलते हैं आज के राजनीतिक परिदृश्य पर। कोलकाता से हैदराबाद तक में कम से कम चार गठबंधन मोर्चे पर हैं जगह-जगह जोरआजमाइश हो रही है।
सोमवार, 4 फ़रवरी 2019
पश्चिम बंगाल: मोर्चा भले ही पोलिस आयुक्त के आसपास है लड़ाई का मैदान लोकसभा चुनाव है
देश में व्यक्तित्व की विचित्रता वाले नेताओं के उभार से लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं, ये नेता ऐसे हैं कि कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते के अहंकार भाव से ग्रस्त हैं। इसकी शुरुआत यूपीए २ में अपनी ही सरकार के अध्यादेश को मीडिया के सामने फाड़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहसिंह को शर्मिंदा करने वाले वर्तमान पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने की। तब से यह रोग बढ़ता ही जा रहा है।
दिल्ली से कोलकाता तक ऐसे मंजर आम है। इससे अराजकता का माहौल बन रहा है और देश के संघीय ढांचे को नुक़सान पहुंच रहा है। अफसोसनाक बात है सियासी मजबूरियों के कारण इसके लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। एक सवाल है कि क्या केंद्र सरकार के विरोध में होने भर से देश की पूरी व्यवस्था को ध्वस्त करने की आजादी दे दी जानी चाहिए। ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शारदा चिट फंड मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम को रविवार को कोलकाता में हिरासत में ले लिया गया। केंद्रीय जांच एजेंसी की यह टीम कभी इसी मामले की जांच कर रही sit के अफसर और वर्तमान कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची थी। इस दौरान सीबीआई की टीम को घंटों थाने में बैठाया जाना राज्य सरकार और पुलिस की सोच पर सवाल उठाता है। बाद में टीम को छोड़ दिया गया और मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गईं और आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों को परेशान किया जा रहा है।
सवाल यह है कि कोलकाता पुलिस आयुक्त क्या राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं और पूछताछ से पहले किसी मुख्यमंत्री को किसी अफसर को क्यों क्लीनचिट देना चाहिए था या इसके लिए कोर्ट का रास्ता नहीं था पर जो रास्ता अपनाया गया अभूतपूर्व था और अब इसने सुबहे को जरूर जन्म दे दिया। सबको पता है कि पुलिस और प्रशासन का मुखिया सरकार का पसंदीदा अफसर ही होता है ऐसे में मुख्यमंत्री का राजीव कुमार के पक्ष में उतरना और जिस घोटाले में बनर्जी सरकार से जुड़े मंत्री और लोग आरोपित हों उस जांच टीम के मुखिया को अहम जिम्मेदारी दिया जाना सवाल तो उठाएगा। इससे राजीव कुमार की व्यक्तिगत छवि को भी धक्का पहुंचेगा। शारदा घोटाले की जांच सीबीआई supreme Court ki निगरानी में कर रही है ऐसे में केंद्रीय एजेंसी को पूछताछ से रोककर क्या माननीय न्यायालय का सम्मान किया गया या संघीय ढांचे की फिक्र की गई या यह बातें विभिन्न दलों के लिए बस जुमले हैं।
या सवाल उठता है कि इससे सीबीआई और पोलिस को सांस्थानिक रूप से कोई मजबूती मिली या उसकी छवि और व्यवस्था को ही नुकसान पहुंचा और क्या सिर्फ केंद्रीय सरकार के विरोध के कारण ही सभी संस्थाओं को दांव पर लगा देने की छूट है जबकि सबको पता है कि इन संस्थाओं के जरिये ही शांसन व्यवस्था कायम होती है। दरअसल लड़ाई में मोहरा कोई भी बने इसकी बिसात आगामी लोकसभा चुनाव है और दांव पर है प्रधानमंत्री की कुर्सी। पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश समेत हिंदी पट्टी के राज्यों ने वर्तमान सरकार के प्रतिनिधियों पर खूब प्यार लुटाया था पर दक्षिण पश्चिम बंगाल आदि में अपेक्षित सफलता नही मिल सकी थी। हिंदी पट्टी में सर्वाधिक उभार के बाद ही भाजपा ने समझ लिया था कि अगले लोकसभा चुनाव में उसे शायद उतनी सफलता न मिले, इसलिए यहां होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए उसने दूसरे राज्यों में प्रयास शुरू कर दिया था। इसमें उसे सबसे ज्यादा उम्मीद 42 सीट वाले पश्चिम बंगाल और 21 सीट वाले उड़ीशा से है जहाँ पिछले चुनाव में भाजपा को ओडिशा में 1 सीट और बंगाल में 2 सीट ही जीत पाई है।
इधर दोनों ही राज्यों में भाजपा मजबूत विपक्ष बनकर उभरी है और यहां पहले से स्थापित पार्टीयों को पीछे धकेल कर नंबर 2 की पोजिशन ले ली है और पार्टी के पास करिश्माई चेहरा नरेंद्र मोदी का होने से डरे दल इसे रोकने के लिए ये सारी कवायद करते नज़र आ रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में टीएमसी ने सभी 19 जिलों की 2467 पंचायत सीटों पर कब्जा जमाया और बीजेपी 386 सीट जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि टीएमसी से पहले कई दशक तक शांसन करने वाली माकपा को 94 सीट ही नसीब हुई। इससे पहले हुए नगरीय निकाय चुनाव में सभी 7 पर कब्जा जमाया था और 148 में से 140 वार्ड में जीत दर्ज की थी पर अधिकतर पर बीजेपी दूसरे स्थान पर थी। इससे राज्य में तृणमूल के लिए खतरे की घंटी बज गई है क्योंकि राज्य में उसकी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी बन चुकी है और दुसरे राज्यों मेंक्षेत्रीय दलों की तरह हाशिये पर जाने से बचने के लिए तृणमूल को उसे रोकना होगा। ऐसे में यह सारी कवायद खुद को प्रधानमंत्री मोदी के सामने मजबूत दिखाने की कवायद का हिस्सा नज़र आ रहा है क्योंकि यूपीए2 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कमजोर होने और मोदी के फैसले लेने में मजबूत होने की छवि का भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने में अहम योगदान रहा था। इ
विपक्षी दलों की ओर से प्लान बी पर भी काम किया जा रहा है जिसमें न भाजपानीत एनडीए की सरकार बने न कांग्रेसनीत यूपीए की, बल्कि इनसे अलग बाकी दलों की गठबंधन सरकार बने ऐसे में पूर्व में हुए इन्द्र कुमार गुजराल और hd देवगौड़ा वाले प्रयोग के मुताबिक कइयो को अपने लिए संभावना दिखती है। ऐसे में अंदरखाने सब अपने समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं। बंगाल में ममता खुद को मोदी से टक्कर लेते दिखना चाहती हैं तो महाराष्ट में पवार और उत्तर प्रदेश में माया की हसरत किसी से छिपी नहीं है। वहीं दक्षिण में केसीआर और चंद्र बाबू नायडू अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। दिल्ली के केजरीवाल तो मोदी के खिलाफ चुनाव तक लड़ चुके हैं। इसमे जांच एजेंसियों से लेकर चुनाव आयोग तक को निशाना बनाये जाने से कोई झिझक नही रहा है। इसमें किसी को चिंता नहीं है कि संस्थानों पर से आम जनता का विश्वास उठ गया तो इनकी लगाई आग बुझाए न बुझेगी। फिर कुर्सी पर कोई भी क्यों न हो।
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019
सदन में मोदी मोदी और राहुल जागो - राहुल जागो के लगे नारे
गुरुवार, 24 जनवरी 2019
प्रियंका वाड्रा की एंट्री : क्या कांग्रेस ने हार मान ली या कोई रणनीति
अभी तक प्रियंका वाड्रा गांधी राजनीति में नहीं थी तो उन पर कम राजनीतिक हमले होते थे। कभी कभार कोई मामला सामने आया होगा पर अब बिपक्षी शायद ही छूट दें वो भी तब जब पति रॉबर्ट उनकी कमजोर कड़ी हों। उन्हें हरियाणा और राजस्थान में उन जमीन घोटालों का जवाब तलाशना होगा कि कैसे महज लाख की कंपनिया यूपीए के कार्यकाल में कुछ साल में ही करोंङों की हो गई।
वहीं बीकानेर जमीन घोटाले की जांच में राबर्ट वाड्रा को राजस्थान हाईकोर्ट ने ईडी के सामने पेश होने का आदेश दिया है। अब 12 फरवरी को राबर्ट वाड्रा और उनकी मां समेत स्काईलाइट हास्पीटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड के सभी साझीदारों को ईडी में पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ेगा। राहत की बात सिर्फ इतनी है कि ईडी वाड्रा को गिरफ्तार नहीं कर सकता है। इडी को शक है कि वाड्रा कि मुखौटा कंपनी के जरिये इसमे विस्थापितों के लिए निर्धारित जमीन को खुर्द बुर्द की गई।
इसके अलावा भी राजस्थान और हरियाणा के कई अन्य जमीन घोटाला और आर्थिक अपराध के मामले में अक्सर इनका नाम भी मीडिया की जीनत बनती रही हैं, उनका भी जवाब तलाशना होगा। कैसे औने पौने दाम पर सरकारी जमीन इन तक पहुंची और करोड़ों की हो गई। कैसे बिल्डर इन पर मेहरबान रहे क्यों सरकारी प्रोजेक्ट इन्हीं की जमीनों के आसपास पास हुए। ऐसे बेशुमार सवालों के जवाब वाड्रा को ढूंढने होंगे। तब कांग्रेस बचाव में यह दलील नहीं दे पाएगी कि प्रियंका राजनीति में नहीं हैं।
शनिवार, 19 जनवरी 2019
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कितने हिंदू
रविवार, 13 जनवरी 2019
प्रयाग में माघ महीने में गंगा किनारे रहकर इन्द्रियों को वश में कर स्नान - ध्यान कर ईश्वर की आराधना करना ही कल्पवास है
संयम का अभ्यास और पवित्रता को पाने की कोशिश कल्पवास की बुनियादी शर्त है। यह पौष माह के ११ वें दिन से माघ माह के १२ वें दिन तक लगता है। धैर्य और भक्ति के लिए जाना जाता है। इस अवधि में एक दिन में एक बार ही भोजन किया जाता है।
भारत कोष के मुताबिक हजारों साल पहले जब प्रयाग शहर बसा भी नहीं था गंगा और यमुना के किनारे आसपास जंगल था। यहां ऋषि मुनि तपस्या करते थे उन्होंने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। इस दौरान यहां आने वालों को शिक्षा दीक्षा दी जाती थी। इस दौरान उन्हें पर्णं कुटी में रहना पड़ता था। अब पत्ते की कुटी की जगह तंबुओं ने के ली है। कल्पवास के दौरान गृहस्थों के तीन कार्य होते थे। तप, होम और दान। कल्पवासियों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से शुरू होती है और डर रात तक भजन प्रवचन आदि जैसे कार्यों के साथ समाप्त होती है।
भारत कोष के मुताबिक हजारों साल पहले जब प्रयाग शहर बसा भी नहीं था गंगा और यमुना के किनारे आसपास जंगल था। यहां ऋषि मुनि तपस्या करते थे उन्होंने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। इस दौरान यहां आने वालों को शिक्षा दीक्षा दी जाती थी। इस दौरान उन्हें पर्णं कुटी में रहना पड़ता था। अब पत्ते की कुटी की जगह तंबुओं ने के ली है। कल्पवास के दौरान गृहस्थों के तीन कार्य होते थे। तप, होम और दान। कल्पवासियों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से शुरू होती है और डर रात तक भजन प्रवचन आदि जैसे कार्यों के साथ समाप्त होती है।

पद्म पुराण में कल्पवास को इस तरह परिभाषित किया गया है।
प्रयागे माघ पर्यन्त त्रिवेणी संगमे शुभे। निवासः पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥
पुराण के मुताबिक तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर माघ मासभर निवास करने से (साधना कर कल्पवास करने)पुण्य फल प्राप्त होता है। संगम तट पर कल्पवास करने के संदर्भ में माना गया है कि कल्पवासी को इच्छित फल तो मिलता ही है, उसे जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।
महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का जो फल मिलता है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है। जगह जगह यह वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस के वध की क्षमता कल्पवास से ही प्राप्त की थी। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों को कल्पवास करने से आत्मदर्शन का लाभ हुआ।
कल्पवास की अवधि : कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि की है। बहुत से श्रद्धालु जीवनभर माघ मास गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं। विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है। इसकी महत्ता को देखते हुए पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि इसी कारण आकाश तथा स्वर्ग में जो देवता हैं, वे भूमि पर जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। वे चाहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य का जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में कल्पवास करें।
महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन्! प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना इंद्रियों को वश में करके स्नान- ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है।
कल्पवास का विधान : प्रयाग क्षेत्र में निवास से पहले दिन में एक बार भोजन का अभ्यास कर लेना चाहिए। प्रयाग के लिए चलने से पहले गणेश पूजा अनिवार्य है। मार्ग में भी व्यसनों से बचे रहें। त्रिवेणी तट पर पहुंच कर यह संकल्प लें कि कल्पवास की अवधि में बुरी संगत और गलत वााणी निकालने की बुराई का त्याग करेंगे, यहां कहा जाता है कि महीनेभर संयम का पालन करने से व्यक्ति की इच्छाशक्ति दृढ़ होती है और वह आगे का जीवन सदाचार से व्यतीत करता है।
कल्पवासी को चाहिए कि निम्नलिखित मंत्र पढ़कर अपने ऊपर गंगा जल छिड़के।
मंत्र : ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष से बाह्याभ्यंतरः शुचि । इस मंत्र से आचमन करें- ॐ केशवाय नमः ॐ माधवाय नमः ॐ नाराणाय नमः का जाप करें ।
हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें। इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।
मंगलवार, 8 जनवरी 2019
गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण: मोदी ने खींच ली कांग्रेस के पैरों तले से जमीन
रविवार, 6 जनवरी 2019
प्रयाग में और आसपास क्या है खास
यह वही परंपरा है कि भीषण युद्ध के बाद भी विजेता राम पराजित रावण के पास राजनीति की शिक्षा लेने भाई लक्ष्मण को भेजते हैं और उसके सम्मान में पैर के पास खड़े होने की सलाह देते हैं और जिसके हाथों पूरे कुल का नाश हुआ उन मर्यादा पुरुषोत्तम के भाई को रावण भी शिक्षा देता है। खैर चलते हैं इलाहाबाद । भले ही किसी वजह से हो आजादी के पहले अंग्रेजों ने इलाहाबाद और देश को कई चीजें दी है। उनकी भी विरासत प्रयागराज अपने में समेटे हुए है।
प्र याग में अब भी कई मोहल्ले उनके नाम पर मिल जाएंगे, मसलन कीडगंज, जॉनसन गंज, जार्ज ताउन आदि। इसके अलावा दिल्ली से कोलकाता के लिए बिछाई गई रेल लाइन के लिए यमुना पर बना ब्रिज अंग्रेजों की ही देन है, सैकड़ों साल पुराना यह ब्रिज अब भी मुस्तैदी के साथ हमारा जीवन आसान बना रहा है।
इसके अलावा इलाहाबाद विश्व विद्यालय की स्थापना म्योर कालेज के रूप में १८८७ में अंग्रेजों ने ही की थी, जो बाद में डिग्री प्रदान करने वाला विश्व विद्यालय बना। यह हिंदुस्तान के शुरुआती चार विश्व विद्यालयों में है जिसका वास्तु दर्शनीय है। मिंटो पार्क: अब इसका नाम मदन मोहन मालवीय पार्क हो गया है पर आम लोग मिंटो पार्क के नाम को भी बता देंगे। यह ऐतिहासिक पार्क है। इलाहाबाद में स्थित सफेद पत्थर के इस मैमोरियल पार्क में सरस्वती घाट के निकट सबसे ऊंचे शिखर पर चार सिंहों के निशान हैं। लार्ड मिन्टो ने इन्हें 1910 में स्थापित किया था।
1 नवम्बर 1858 में लार्ड कैनिंग ने यहीं रानी विक्टोरिया का लोकप्रिय घोषणापत्र पढा था। इससे पूर्व ब्रिटेन की संसद में 2 अगस्त 1858 को लार्ड स्टेनले ने भारतीय अधिनियम को संसद के समक्ष रखा। इस बिल के तहत भारत मे सत्ता का हस्तांतरण ईस्ट इंडिया कंपनी सेे ब्रिटेन की महारानी को किया गया । कंपनी गार्डन अल्फ्रेड पार्क या चंद्रशेखर आजाद पार्क: भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी और सपूत चंद्रशेखर आजाद की यह शहादत स्थली है। १९३१ में पार्क में आजाद अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी। संग्रहालय: आजाद पार्क में ही एक संग्रहालय भी है जिसमें पुरातात्विक और आधुनिक इतिहास की प्रचुर सामग्री संजोई हुई है।
आंनद भवन : यह स्थान इलाहाबाद विश्व विद्यालय के पास ही स्थित है।।यह देश के पहले प्रधानमंत्री का आवास है ,जिसमें अब संग्रहालय (नेहरू जी से जुड़ी सामग्री है यहां)और तारामंडल खोल दिया गया है। इलाहाबादी अमरूद: सर्दी के मौसम में इलाहाबाद गए और इलाहाबादी अमरूद न खाया तो क्या खाया। यह अपने आकर्षक रंग और स्वाद के लिए मशहूर है। इस पर लाल रंग की चित्ती (प्राकृतिक दानों वाली छाप)काफी आकर्षक लगती है। दूर से कई बार सेब का भ्रम होने लगता है। यह काटने पर इसका गूदा भी लाल रंग का होता है।
किला: इलाहाबाद में यमुना नदी के किनारे अकबर का किला भी है पर यह आम लोगों के लिए बंद है। उत्तर प्रदेश का उच्च न्या यालय भी यहीं है। इसके अलावा भी प्रयागराज में बहुत कुछ देखने और समझने के लिए है जिसे उत्तर प्रदेश सूचना विभाग ने एक बुकलेट के रूप में प्रकाशित किया है। इसलिए उसके फोटो अटैच कर दे रहा हूं। सूचना विभाग की वेबसाइट से भी जानकारी ले सकते हैं। कुंभ की भी सरकार ने एक वेबसाइट बनवाई है,जिससे जरूरी जानकारी मिल सकती है। यातायात: प्रयागराज दिल्ली और देश के सभी प्रमुख शहरों से रेल से जुड़ा है। यहा एयर पोर्ट भी है, साथ ही दिल्ली से बस से भी आ सकते हैं।
आ स पास के प्रमुख शहर और दर्शनीय स्थल: इलाहाबाद से ९० किलोमीटर की दूरी पर मिर्जापुर है। यह विंध्याचल, अष्टभुजा और काली खोह मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। मिर्जापुर नगरपालिका कार्यालय की नक्काशी काफी खूबसूरत है। गंगा किनारे बसे शहर के घाट बहुत खूब सूरत हैं। शहर से ८ किलोमीटर दूर विंधम फाल, टांडा फाल अपनी खूबसूरती के लिए चर्चित रहते हैं।
खजूरी डैम का नज़ारा बेहद खू बसूरत है। इसके अलावा भी आसपास कई खूबसूरत स्थान है। यहां से ३० किलोमीटर दूर चुनार गढ़ किला (नीरजा गुलेरी के चंद्रकांता धारावाहिक वाला यहीं हैं) इसके अलावा पास में ही शक्तेशगढ आश्रम आदि हैं। अधिक जानकारी www.mirzapur.nic.in से प्राप्त की जा सकती है। Chunar यह मीरजापुर की ही तहसील है और प्लास्टर of पेरिस के बर्तनों के लिए देश भर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा मिर्जापुर जिला कालीन निर्माण और पीतल के बर्तनों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। इलाहाबाद से 120 kilomeetar दूर स्थित वाराणसी हिन्दू और बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था का प्रमुख केंद्र है।
विश्वनाथ टेंपल,bhu, सारनाथ समेत अनेक स्थल यहां आसपास दर्शनीय है। मिर्ज़ापुर और बनारस दोनों ही बस और रेल मार्ग से अच्छे से जुड़े हुए हैं। बनारस से अंतर राष्ट्रीय उड़ान भी संचालित होती है।























बुधवार, 2 जनवरी 2019
तस्वीरों में देखिए कुंभ की तैयारी और प्रयागराज की भव्यता

स्त लोगों को देखें तो हैरान मत होइएगा। दरअसल यह आपका प्रयागराज ही है, जिसे अर्ध कुंभ २०१९ में आपके स्वागत और आध्यात्मिक खुशियां देने के लिए संवारा गया है। आखिर हो भी क्यों न , अंदर और बाहर की चुनौतियों से जूझ रहे हिंदू समाज के लिए हर्ष प्रकट करने का सबसे बड़ा आध्यात्मिक उत्सव है कुंभ।कुंभ मेला है क्या: कुंभ पर्व हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु कुंभ के दौरान स्नान करते हैं । यह मेला देश में चार स्थानों पर हर बारहवें वर्ष हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में बारी बारी से लगता है। इसके अलावा प्रयाग में हर छठे वर्ष अर्ध कुंभ लगता है। प्रयाग में पिछला कुंभ २०१३ में लगा था। इस तरह २०१९ में प्रयाग में लग रहा यह मेला अर्धकुंभ है, जिसे सरकार कुंभ की तरह आयोजित कर रही है । खगोल गणनाओं के अनुसार यह मेला मकर संक्रांति के दिन प्रारम्भ होता है, जब सूर्य और चन्द्रमा, वृश्चिक राशि में और वृहस्पति, मेष राशि में प्रवेश करते हैं। मकर संक्रांति के होने वाले इस योग को "कुम्भ स्नान-योग" कहते हैं और इस दिन को विशेष मंगलकारी माना जाता है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन पृथ्वी से उच्च लोकों के द्वार इस दिन खुलते हैं और इस प्रकार इस दिन स्नान करने से आत्मा को उच्च लोकों की प्राप्ति सहजता से हो जाती है।
इतिहास : भारत में नदी मेलों का इतिहास हजारों साल पुराना है विकिपीडिया के मुताबिक इतिहासकार एस बी रॉय ने भारत में अनुष्ठानिक नदी स्नान को १०,००० ईसापूर्व (ईपू) बताया है। इसके अलावा बौद्ध लेखों में ६०० ईपू नदी मेलों की उपस्थिति बताई है। वहीं सम्राट चन्द्रगुप्त के दरबार में आए एक यूनानी दूत ने देश में ४०० ईपू एक नदी मेले का जिक्र किया है। क्या होता है कुंभ मेला: वैसे तो हर साल प्रयाग में गंगा नदी के किनारे मकर संक्रांति से मेला लगता है। यहां देश के कोने कोने से हिंदू श्रद्धालु आते हैं और डेढ़ महीने यहीं रहकर गंगा स्नान और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। कुंभ में आयोजन बड़ा हो जाता है।। चूंकि माइथोलॉजी पुनर्जन्म की धारणा पर चलती है और अच्छे फल या जीवन के लिए पुण्य करने पर जोर देती है, जिसके लिए अच्छे सामाजिक और धार्मिक कार्य करने होते हैं जिससे पुण्य अर्जित हो। जिसका लाभ अभी और अगला जन्म लेने पर मिलता है। इसके लिए सामान्य हिंदू से लेकर तमाम धर्मगुरु तक एक सतह पर बराबरी के साथ एक ही प्रक्रिया में भाग लेते हैं, चूंकि गंगा को हिंदू माइथोलॉजी में पाप नाशिनी और सभी नदियों में श्रेष्ठ माना जाता है और प्रयाग (माइथोलॉजी के मुताबिक संसार की रचना का कार्य करने वाले देवता ब्रह्मा ने इंसान के कल्याण के लिए यहां प्रकृष्ट्याग यज्ञ किया था जिसका असर इसके बाद भी रहना था इस वजह से शहर का नाम प्रयाग पड़ा)गंगा नदी किनारे पड़ता है इसीलिए यहां लगने वाले मेले का महत्व बढ़ जाता है। इसके अलावा कुंभ मेला लगने की वजह बताने वाली प्रचलित कहानियों के विषय में मैंने एक पोस्ट में जिक्र किया है। फिलहाल यहां इन डेढ़ महीनों में लोग पुण्य अर्जित करते हैं। इसके लिए यहां दिन भर धार्मिक कार्य, भजन कीर्तन, अनुष्ठान, सत्संग, प्रवचन, राम और कृष्ण की लीला,भंडारे चलते रहते हैं जहां कोई भी प्रसाद ग्रहण कर सकता है। मतलब साफ है कि डेढ़ महीने कम से कम इस क्षेत्र में भूखे पेट किसी को सोने की मजबूरी नहीं है। तमाम लोग रक्तदान शिविर, दान और अपने मत का प्रचार भी करते हैं मतलब सबकी बुनियाद में परमार्थ है। इस मेले में हिंदू धर्म के विभिन्न मतों शैव, शाक्त और तमाम अन्य शामिल होते हैं इसके लिए गंगा किनारे दोनों ओर तंबुओं का अस्थाई शहर बसता है जिसके लिए हर बुनियादी जरूरत सड़क बिजली पानी बैंक पोस्ट ऑफिस पुलिस सरकारी राशन की दुकान आदि कुल मिलाकर जितनी व्यवस्थाएं शहरों में मुहैया कराती है सब यहां होती है। इसके लिए साल भर काम चलता रहता है। सरकार खुद की योजना के प्रचार प्रसार के लिए प्रदर्शनी भी लगाती है। व्यापारिक प्रदर्शनी और दुकान भी लगती है। झूले और मनोरंजन के इंतजाम भी होते हैं।
https://kumbh.gov.in/hi/attractionshttps://brahmaastra.blogspot.com/2019/01/blog-post_12.html?m=1https://brahmaastra.blogspot.com/2019/01/blog-post_6.html?m=1https://brahmaastra.blogspot.com/2018/12/blog-post_26.html?m=1 मेले की बड़ा होने से इसके प्रबंधन पर अध्ययन करने विदेशी भी आते हैं। इस बार इसे और भव्य बनाया जा रहा है। इस बार मेला अरैल घाट से शुरू होकर लोगों से मिली जानकारी परा कोके मुताबिक फाफामऊ के पास तक पहुंच गया है अंदाजन यह गंगा के विशाल पाट में तकरीबन 20 किलोमीटर क्षेत्र में फ़ैल गया है। आइए तस्वीरों में देखते हैं कुंभ की तैयारी: यह फोटो मेरे एक मित्र ने सोशल वेसाइट पर अपलोड की थी जिसे उसके किसी मित्र से मिली थी, अच्छी वस्तु का प्रसार हो इसलिए मैं ने सोचा इसे यहां भी साझा करनी चाहिए। आइए तस्वीरों में निहारते हैं प्रयाग कुंभ का सौन्दर्य।







बुधवार, 26 दिसंबर 2018
दिव्य कुंभ : उम्मीद, आकांक्षा, हैरानी का कुंभ
मोदी ने इस रणनीति पर काम भी शुरू कर दिया है। मोदी अपने कामों की मार्केटिंग खूब करते हैं यह स्टाइल भारतीय राजनीति में नया है। इसके विरोधी भी खूब है तो इस अदा के समर्थक भी कम नहीं हैं। नतीजतन इसके आलोचकों को भी वही करना पड़ता है जिसकी आलोचना करते हैं हालिया कुछ समय से विपक्षी कांग्रेस पार्टी को अपने नेता राहुल गांधी की हिंदू धार्मिक स्थलों में पूजा करने की तस्वीर जारी करना एक बानगी है, जबकि ये नितांत व्यक्तिगत मामला है। मोदी सरकार के आने से पहले इफ्तार के फोटो के अलावा कांग्रेस पार्टी के नेताओं की ऐसी तस्वीर शायद ही दिखती रही हो। लोकसभा चुनाव २०१४ में हार के बाद कांग्रेस की ओर से गठित एंटनी समिति ने भी बहुसंख्यक की भावना की अनदेखी की ओर इशारा किया था लगता है कि कांग्रेस अनमने ही उसके सुझावों पर आगे बढ़ती नजर आ रही है। बहरहाल मोदी ने अपनी स्टाइल में काम शुरू कर दिया है। वैसे तो हर साल प्रयाग में एक माह रुककर आद्यात्मिक उन्नयन के लिए कल्पवास करने और परिवार माया से दूर ईश्वर की पूजा करने काम से कम संसाधनों में करने आते हैं। हर साल गंगा की रेती पर विशाल नगर बसता है और जाति पंथ के भेद रूपी मैल गंगा में ही विसर्जित कर देते हैं। पर छह साल पर लगने वाले अर्ध कुंभ और १२ साल के कुंभ की बात ही अलग है। इसलिए इस बार यहां १० करोड़ से अधिक लोगों के आने की उम्मीद और इंतजाम किए जा रहे हैं। इसके लिए कई काम पहली बार हो रहा है। यह केंद्र की मोदी और उसी पार्टी के योगी सरकार की छवि बदलने का भी मौका है इसलिए आस्था के साथ यह कुंभ उम्मीदों से भरा है। पहली बार कुंभ का लोगो जारी किया गया है। जिसे प्रधानमंत्री ने खुद जारी किया है। पहली बार प्रदेश सरकार की ओर से ५०० बसें चलाई जा रही है जो लोगों को अर्ध कुंभ में आने का निमंत्रण दे रही हैं।
विभिन्न स्टेशनों पर कुंभ यात्रियों को लाने के लिए बड़ी संख्या में ट्रेन खड़ी कर दी गई है जो यात्री बढ़ने पर चला दी जाएंगी। इतने बड़े मेले के प्रबंधन का अध्ययन करने के लिए वैसे तो हमेशा विदेशी स्कॉलर आते रहे हैं या अपनी रुचि पर मगर रइस बार दुनिया को भारत के आध्यात्मिक वैभव को दिखाने के लिए दुनिया भर के दूतावासों के लोगों को यहां आने के लिए बुलावा दिया जा रहा है। इस बार कुंभ मेला कई ऐसी घटनाओं का भी गवाह बन सकता है जिसकी उम्मीद शायद ही लोगों को हो। आम चुनाव महज कुछ माह दूर होने से इस बार हिंदू समुदाय के मतों के मद्देनजर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य कांग्रेस नेता और दूसरे दलों के प्रतिनिधियों का आना जाना लगा रहने की उम्मीद है। उम्मीद है कुंभ कुछ ऐसे सामाजिक संदेश भी देगा जो जातियों में बंटे और सामाजिक बुराइयों से घिरे समाज को आगे का कल्याणकारी रास्ता दिखाएगा। दुनिया के लिए भी मंगलकारी होगा। बहरहाल रेती पर नगर बसने से पहले यहां घाटों पर प्रवासी पक्षियों का बसेरा हो गया है जो प्रयाग के सौन्दर्य को इंदिनो बढ़ा रहा है। वैसे भी आयोजन की तैयारियों से लगता है कि कुभ से बढ़ी प्रयाग शहर की शोभा दुनिया को हैरान कर देगी और कुछ खराब घटनाओं के लोग साक्षी रहे होंगे तो विस्मृत हो जाएंगी। चित्रों से दिखाते हैं कैसे चल रही है कुंभ मेले की तैयारी।






रविवार, 16 दिसंबर 2018
एक गांधी जिसे भुला दिया गया

"
रविवार, 25 नवंबर 2018
नेताओं के बिगड़े बोल : राजनीतिक प्रदूषण पर कब बात शुरू होगी
सदस्यता लें
संदेश (Atom)