दुनिया का 2 तिहाई हिस्सा पानी का होने के बावजूद मानव के लिए पीने और कृषि के लिए पानी अपर्याप्त है. इसी कारण नदियों से समृद्ध भारत के विभिन्न इलाकों से समय समय पर जल संकट की तस्वीरें सामने आती रहती हैं, कई अन्य देशों में भी इस तरह की ही स्थितियाँ हैं. इसका कोई समाधान न निकलने पर यह संकट बढ़ने का ही अनुमान है. इसी कारण कहा जाता है कि भविष्य में जंगों की बड़ी वजह पानी हो सकता है. इसको लेकर तनाव के छिटपुट संकेत दक्षिण एशिया में दिखाई देने लगे हैं..
ऐसे हैं भारत चीन के हालात
नदियों से समृद्ध भारत तीन पड़ोसियों चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश से जल साझा करता है, जिसमें चीन और भारत में चीन तो भारत पाकिस्तान बांग्लादेश में भारत अपर राइपेरियन देश है. तिब्बत से आनेवाली ब्रह्मपुत्र और सतलज नदी को लेकर चीन और भारत के बीच कोई औपचारिक जल संधि नहीं है पर समय समय पर हाइड्रो लॉजिकल डेटा शेयर करने सम्बन्धी समझौते हुए हैं और ई एल एम स्थापित है, इससे मिले आंकड़ों से बाढ़ का अनुमान लगाया जाता है . अब चीन तिब्बत में ब्रह्मपुत्र यानी यारलांग सांगपो पर सक्रिय भूकंपी क्षेत्र में अरुणाचल के पास नदी के ग्रेट बैंड पर 60 गीगावट क्षमता वाली विशाल जल विद्युत परियोजना और बांध पर काम कर रहा है, इसपर 167.8 बिलियन डॉलर खर्च होने का अनुमान है. लेकिन चीन ने इसको लेकर भारत को भरोसे में लिया हो, यह बात सार्वजनिक नहीं है।
पूर्वी और पश्चिमी पड़ोसी असल चिंता का विषय
इससे भारत के सुरक्षा एक्सपार्ट चिंता में रहते हैं क्योंकि परियोजना पूरी होने के बाद चीन को ब्रह्मपुत्र के जल को नियंत्रित करने का अधिकार मिल जाएगा, साथ युद्ध जैसी स्थितियों में पानी को हथियार की तरह इस्तेमाल करने की शक्ति मिल जाएगी...गनीमत ये है कि भारत में ब्रह्मपुत्र में पानी का 60 से 70 फीसदी पानी सहायक नदियों और मानसूनी बारिश से आता है, इससे सामान्य स्थितियों में बड़ा संकट तो नहीं है लेकिन समस्या का समाधान निकालने की जरूरत जरूर है पर असल समस्या पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्र के पड़ोसी बने हैं, ये भारतीयों के हिस्से का पानी हड़पने के लिए जीतोड़ प्रयास कर रहे हैं और भारत में इसको लेकर उदासीनता साफ नजर आ रही है।
भारत की सिविल सोशायटी उदासीन
खास तौर पर सिविल सोसायटी के स्तर पर छोटी मोटी बातों पर तूफ़ान खड़ा करने वाला समूह इस मसले पर निष्क्रिय है जबकि पाकिस्तान और बांग्लादेश में इसको लेकर छटपटाहत दिखाई दे रही है, भारत पर दबाव के लिए नित कांफ्रेंस , वर्कशॉप आयोजित हो रहे हैं और बयानबाजियाँ, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति से हित साधने के प्रयास जारी हैं.
पश्चिम में भारत पाकिस्तान में 1960 में सिंधु जल संधि हुई थी, इसमें सदभावना के आधार पर भारत ने अपने हितों की अनदेखी कर एकतरफा तौर पर 80 फीसदी पानी पाकिस्तान को सौंप दिया था. इसके तहत पूर्वी नदियों रावी व्यास सतलज पर कुछ अपवादों को छोड़कर भारत को सम्पूर्ण अधिकार यानी मिलियन फ़ीट पानी और पश्चिमी नदियों सिंधु झेलम चिनाब यानी 135 मिलियन फिट पानी पर पाकिस्तान को अधिकार दिया गया हालांकि कुछ रन ऑफ़ द रिवर प्रोजेक्ट की भारत को छूट है .पूर्वी नदियों पर मिले सपूर्ण अधिकार के बावजूद इनका 2 मिलियन फ़ीट पानी बिना इस्तेमाल के पाकिस्तान चला जाता है.
प्रबंधन पर सिर्फ भारत कर रहा खर्च
इसके अलावा इन नदियों के मैंनेजमेंट की जिम्मेदारी और खर्च को भी सिर्फ भारत को दी गई. खुद समस्याओं से जूझ रहे भारत ने पाकिस्तान को बांध बनाने, नहरों और बुनियादी ढाचों के लिए 83 करोड़ रुपये दिए.हालांकि इसके बाद भी आज तक पाकिस्तान की सदभावना दिखी नहीं. पाकिस्तान हमेशा भारत के प्रोजेक्ट किशनगंगा हो या रतले या अन्य को विवादित कर देरी कराता रहा जिससे उनकी लागत बढ़ती रही और विकास अवरुद्ध हुआ. इसके अलावा पाकिस्तान भारत में आतंकवाद बढाकर सदभावना की भूमि को लहूलुहान करता रहा. अब पहलगाम में क्रूर आतंकी हमले के बाद जागी भारत सरकार ने संधि को निलंबित किया तो पाकिस्तान बिलबिला रहा है, वहां की सरकार, सेना नियंत्रित मीडिया, सिविल सोसाइटी सब भारत को धमकियां दे रहे हैं.
पाकिस्तान गुमराह कर रहासाथ ही पाकिस्तान इस मुद्दे पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए जून में इस्लामाबाद में कॉन्फ्रेंस आयोजित की, हालांकि यह बहुत सफल नहीं रही और भारत को ओछी धमकियों तक सीमित रही. पाकिस्तान ने वशिंगटोन dc में दूतावास में भी द इंदस वाटर ट्रिटी साऊथ एशियन सिक्योरिटी क्रॉसरोड्स विषय पर डायलॉग आयोजित किया. साथ ही इस मसले को कोर्ट ऑफ़ अरबिंतारेशन में भी उठाने की कोशिश की, जिसके फैसले को भारत ने ख़ारिज कर दिया. भारत कभी सुनवाई में शामिल नहीं हुआ और पैनल के गठन को गैर कानूनी बताया है.
इधर परिस्थितियां बदल गई हैं जलवायु परिवर्तन से बेसिन में पानी की कमी और भारत की बढ़ती जरूरतों के मुताबिक हालत बदलने पर न्यायपूर्ण समझौते की जरूरत होगी, लेकिन भारतीय समुदाय शतुरमुर्ग की तरह गर्दन रेट में डालकर निश्चिंत है, वो अपने हक़ के पानी जो जम्मू कश्मीर पंजाब हरियाणा राजस्थान की दिशा बदल सकती है पाने के लिए आवाज नहीं बुलंद कर पा रही है, ताकि सरकारी प्रतिष्ठान जानता के मेंडेट के अनुसार काम के लिए प्रतिबद्ध हो.
पूर्वी पड़ोसी भी उठाना चाह रहा फायदा
वहीं पूर्वी क्षेत्र में भी वही हाल है बांग्लादेश के प्रतिनिधि भी दिसंबर में समाप्त हो रही 30 साल पुरानी जल संधि को कपतपूर्ण तरीके से अपने पक्ष में रिन्यू कराने के लिए कूटनीतिक दबाव बनाए हुए हैं. इसके लिए कभी वो चीन को बीच में लाने का प्रयास करते हैं, कभी भारत से सम्बन्ध ख़राब होने की धमकी देते हैं, कभी बांग्लादेश की सिविल सोशयती को चार्ज करते हैं, मीडिया में लेख लिखे जाते हैं और अन्य गतिविधि करते हैं.
भारतीयों के हितों से समझौता करने से बचना होगा
साथ ही इसमें शर्तों में बदलाव के साथ गारंटी कलाज शामिल कराना चाहते हैं जबकि यह संधि भी पहले ही बांग्लादेश की तरफ झुकी हुई है. इसके तहत नदी में 70 हज़ार क्यूसेक या उससे कम प्रवाह होने पर आधा आधा पानी बाँटने, 70हज़ार से 75 हज़ार क्यूसेक पानी रहने पर बांग्लादेश को 35 हज़ार क्यूसेक और 75 हज़ार क्यूसेक से अधिक पानी रहने पर भारत को 40 हज़ार क्यूसेक पानी का नियम है. लेकिन अब पश्चिम बंगाल कोलकाता पोर्ट की नौवाहन क्षमता के लिए ज्यादा पानी चाहता है तो बिहार सूखे और गाद को देखते हुए समीक्षा चाहता है वहीं बांग्लादेश के विशेषज्ञ संधि के व्यवसायिक दृष्टिकोण की जगह परिषथितिक दृष्टिकोण को शामिल कर अधिक पानी चाहता है.
चुकानी पड़ सकती है सद्भावना की बड़ी कीमत
ऐसे में भारतीय समुदाय की निष्क्रियता एक और सद्भावना प्रयास के तहत मुसीबत मोल ले सकती है, इससे बचने के लिए सिविल सोशयती को मजबूती से अपना पक्ष रखना होगा ताकि सरकार किसी भी समझौते से पहले भारतियों के पक्ष की अनदेखी करने की हिम्मत न करें. राष्ट्रीय जल आयोग के आंकड़ों पर भी चर्चा की जरूरत है, जो अभी दिखाई नहीं दे रही है और चिंता की बात है .


कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें