उपहास का डर
मैं जब -तब,
ह्रदय के सागर से ,
भावों के मोती चुनकर
शब्दों की माला में पिरोता ,
और मन ही मन मुदित होता
जैसे पायी हो कोई निधि
क्या है यह तो नही समझता
लेकिन इस भय से की देख इसे
उपहास करेगा कोई भी
मेरी सृजनात्मकता का
कहाँ -कहाँ नही छिपाता फिरता .
1 टिप्पणियाँ:
abhivyakti se daro mat.
dikhane ka jamana hai.......dikhate fira karo.
http://www.grooghantaal.blogspot.com/
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