ब्रह्मास्त्र देश दुनिया के घटनाक्रम, भारत की राजनीति, भारत की संस्कृति और सभ्यता, समाज की वर्तमान स्थिति पर अभिव्यक्ति का माध्यम है.
विचार
बुधवार, 4 मार्च 2020
सोमवार, 30 सितंबर 2019
किसान
गर्मी की दोपहरी में
दूर कहीं धूप में
जहां आग है बरस रही
एक आकृति हिलती- डुलती है
पकड़े हलों की मूठ हाथ में
जल रहा है पेट की आग से
उसका खून ही पसीना बन टपक रहा
तन पर चीथड़े हैं उस पर भी
सूर्य की तपन का क्रोध
धरती भी उसी को जलाकर प्रतिशोध ले रही
तपती लू को झेलते
इस आस में भर पेट रोटी मिलेगी
अगले साल किसी पेड़ की छाह में
इस विशाल नभ के नीचे
इस हत भाग्य को
सपनीली दीवारों पर
मिलती यही अलौकिक छत है।
सर्दी में
जाड़ों में जब हम घरों में बैठे होते हैं
हीटर, आग के पास बैठे कांप रहे होते हैं
पानी को बर्फ समझ छूते हैं
हाड़ कंपा देने वाली ठंड में
किसान कुछ चीथड़े पहने
खेतों में सिंचाई की क्यारियां बनाते
पानी में ही खड़ा रहता है ठिठुरते कंपकंपाते
घर से दूर कहीं सेंवार में
इस समय भी साथ देते हैं उसका
वही मरते मिटते सुनहरे सपने
दिन हो या रात में
बरसात में
जब हम वर्षा की फुहारों का इंतज़ार करते हैं
किसान भी इंतज़ार करता है आशा भरी बूंदों की
पर वर्षा की बूंदें खपरैलों छप्परों से टपकती
वजूद को झकझोर छोड़ जाती है रीता
बादलों के गर्जन और बिजली की तड़प
बढ़ाती है किसान की आस और विश्वास को
लहलहाती फसलों से आह्लादित
फसलों के पकने का इंतज़ार करता है
तैयार फसल से निकला अनाज
तमाम कर्जों और सूदों को चुकाने के बाद
कुछ दिनों की खुशियां दे पाती हैं
भूख मिटाने वाला भूखा सोता है
जीवनदाता भूखों मरता है
अगले वर्ष फिर शुरू होता है
वही अंतर्द्वंद्व और अंतर्विरोध।
गुरुवार, 19 सितंबर 2019
किसान का दुख
२००७ से पहले इलाहाबाद में लिखी मेरी कविता जिसमें किसान की सोच को मैंने आज के हालात में समझने की कोशिश की थी, जो अब भी कमोबेश वहीं हैं।

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देखो-देखो फूटी विकास की चिंगारी
हो गई मेरी छप्पर राख।
मुझमें से ही किसी से विकास का गुणगान कराया
देने लगे मुझे "राख का प्रसाद"।।
कौन दिखलाये रास्ता, कौन दे हमें सहारा।
आंखों से छलके आंसू,दिल से निकली आह
एक आंखों की हद में सूखी, दूसरी लौट आई मेरे पास।।
एक मन जलाए, दूजी तन जलाए।
मेरी छटपटाहट कौन समझे, कौन समझाए।।
मेरे आंसुओं की है क्या कीमत।
जब मेरी पीड़ा कुछ को सुख दे अनमोल।।
फिर कोई क्यों पसीजे, दुनिया चलती अपनी राह ।
है मुझको क्या अधिकार, कथा कहूँ अपनी दुनिया की
जो हुई मेरे देखते तबाह।।
जमीन पुरखों की थी चली गई। दर-दर रोटी को भटकूँगा। क्या मुझको मिलेगा काम।। न जाने कब इस टीस संग मुझको मिल पाए आनंद "विश्राम"।
रविवार, 15 सितंबर 2019
बाजार के भरोसे हिंदी
१४ सितंबर यानी राजभाषा दिवस पर शनिवार को देश भर में एक तरह से कर्मकांड हुए। सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों में कविता, कहानी के कार्यक्रम और गोष्ठी होंगी और पखवाड़ा पूरा होने के बाद साल भर तक के लिए छुट्टी, बीच में एक आध आपस में पत्र लिखकर कर्तव्य की इतिश्री। ये ऐसा ही है जैसा हर साल हम पितृ पक्ष में पितरों का बिना किसी समझ, सोच और भावना के पिंडदान और तर्पण कर देते हैं नतीजा वही ढाक के तीन पात होना ही था, इसीलिये हिंदी भाषी राज्यों में भी पूर्ण रूप से ७२ साल बाद भी हिंदी में कामकाज शुरू नहीं हो पाया है और कामकाज पर अंग्रेजी का दबदबा है, जहां अगर गैर हिंदी भाषी राज्य या अफसर या विदेशी प्रतिनिधि से ही बातचीत के लिए दूसरी भाषा की जरूरत है। दरअसल एक दौर में अपने अभिजात्य के प्रदर्शन और बहुसंख्यक से खुद को अलग दिखाने के लिए अफसर और बड़े लोगों में फारसी बातचीत की रिवायत थी, बाद में यह जगह अंग्रेजी ने ले ली। आज के अफसर भी इस सोच से अभी उबर नहीं पाए हैं।
अब तो हिंदी का नाम लेते ही बवाल होना आम है। हाल में हिंदी को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के बयान,हिंदी ही पूरे देश को एकजुट रख सकती है के बयान पर बवाल इसकी बानगी है जिसमें पश्चिम बंगाल तेलंगाना और तमिलाडु में विपक्ष के नेताओं और कुछ स्वनामधन्य पत्रकारों ने भी हंगामा किया है जिन्हे अनावश्यक ही देश की विविधता को लेकर डर सताता रहता है। जबकि दक्षिण के विद्वानों समेत तमाम लोग ऐसी बात सालों पहले कह चुके हैं। ये जमीन इसलिए इन्हे मिल पाई है क्योंकि सरकारी स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने की जिम्मदारी जिस पर थी वो इसे नहीं कर पाए और अफसर इस तोहमत से तोहमत से बच नहीं सकते। आइए देखते हैं कुछ विद्वानों के विचार –
भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिए हिन्दी सबकी साझा भाषा है।
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार
मैं मानती हूं कि हिन्दी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा।
- लीलावती मुंशी
हिन्दी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है।
- शंकरराव कप्पीकेरी
राष्ट्रभाषा हिन्दी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।
- अनंत गोपाल शेवड़े
दक्षिण की हिन्दी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है।
- के.सी. सारंगमठ
हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है।
- वी. कृष्णस्वामी अय्यर
हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है।
- माखनलाल चतुर्वेदी
हिन्दी भाषा के लिए मेरा प्रेम सब हिन्दी प्रेमी जानते हैं। हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है।
- महात्मा गाँधी
हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है।
- डॉ. राजेंद्रप्रसाद
हिन्दी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है।
- बाबूराम सक्सेना
भारत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए बने संगठनों का परिणाम आधारित आंकलन करें तो नतीजा इसके उलट शायद ही आये। इसलिए हिंदी की हाय तौबा के बीच हमें इस राजभाषा दिवस पर क्या खोया क्या पाया का मूल्यांकन करने और जिम्मेदारों के काम का आकलन करने की भी जरूरत है। मैं राजभाषा विभाग की वेबसाइट www. rajbhasha.in देख रहा था, जिसमें उन्होंने अपने काम का बखान किया है। यह विभाग १९७८से एक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करता है राजभाषा भारती प्रकाशित करता है, दावा किया गया है कि केंद्र सरकार के कार्यालयों में इसे हिंदी के प्रचार के लिए बांटा जाता है खैर मैंने तो तब जाना जब खोजते खोजते वेबसाइट पर पहुंचा। ये और बात है कि सरकारी दफ्तर में पत्रिका बांटने से कितना प्रचार हो सकेगा, गैर हिंदी भाषी आम लोगों के जुड़ाव के लिए क्या किया। आज के बाज़ार से ही सीख लेते हिंदी भाषा पर केबीसी टाईप सीरियल ही चलवा देते तो भी कुछ भला हो जाता। खैर ये हिंदी के प्रसार के लिए सरकारी प्रयास की बानगी भर है,दूसरे प्रयास भी मिलते जुलते ही हैं । इसलिए परिणाम भी हमारे सामने है।
खैर हर जगह अंधेरा ही नहीं है, उम्मीद अभी भी बाकी है। प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत की कविता का अंश सबसे खूबसूरत दिन अभी देखा नहीं मैंने और जॉन मिल्सान का कथन हर बादल में आशा की एक किरण होती है यही भरोसा दिलाते हैं। रफ्ता रफ्ता बढ़ रही Hindi इसको पुष्ट भी कर रही है। देश और दुनिया की बड़ी आबादी नौकरी रोजगार और सांस्कृतिक समागम के लिए हिंदी को सीख रही है। यही वजह है कि दक्षिण भारत और अन्य हिस्सों से आन्योत्तर भारत आने वाले लोग आसान हिंदी सीख ही रहे है, हिंदी का सार्वजनिक विरोध के बाद भी गैर हिंदी भाषी राज्यों खासकर तमाम निजी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, जनसंपर्क की एक बड़ी भाषा सीखने का उन्हें लाभ भी मिल रहा है हिंदी भी बढ़ रही है दुनिया के दूसरे देशों के लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं नतीजतन आज संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिंदी में अपना ट्विटर हैंडल भी शुरू किया है और इनकी ओर से हिंदी में न्यूज बुलेटिन भी शुरू किया गया है। हिंदी दिवस पर २०१९ में दैनिक भास्कर अखबार में छपी एक रिपोर्ट के मुतबिक़ बीते चार दशक में हिंदी बोलने वाले 19% बढ़े हैं। अकेले10 साल में हिंदी भाषी 10 करोड़ बढ़ गए। जबकि इसी दौरान अन्य 9 भाषाएं बोलने वालों की संख्या घटी है। यह बातें उम्मीद की किरण दिखाती हैं।
अफसोस की बात है कि उत्तर भारत में अभी बच्चों को एक और भाषा सिखाने की भले ही दक्षिण की ही सही दृष्टि शिक्षण संस्थानों में विकसित नहीं हो पाई है इससे रोजगार के अवसर भी विस्तृत होते देश का एकीकरण भी मजबूत होता पर सुकून यही है कि पांव पांव चलते बाज़ार संस्कृति और संख्या के भरोसे हिंदी बढ़ रही है। हिंदी सिनेमा का इसमें बड़ा योगदान है। आज दक्षिण भारत,पश्चिम भारत,पूर्वोत्तर और अमेरिका यूरोप के लोग तक इस उद्योग से जुड़ रहे हैं और इस बाज़ार से संवाद के लिए हिंदी सीख रहे हैं जो भविष्य को लेकर उम्मीद बांधती है। इसे इनके विचारों से समझा का सकता है।
हमारे देश में हिंदी हमारी फिल्मों के चलते ही बची हुई है। मैं न्यूयॉर्क में था। वहां एक अफगानी ने मुझसे हिंदी में बात की। वह इसलिए कि वह हमारी फिल्मों का बहुत बड़ा फैन रहा है। जर्मनी में एक व्यक्ति हिंदी गाना गाते हुए दिखा। हिंदी फिल्मों के कारण हिंदी स्प्रेड हो रही है।
- मानव कौल, अभिनेता
मैं जब इटली से इंडिया आई, तभी जरूरत महसूस हुई कि हिंदी सीख लेनी चाहिए। मेरे खयाल से बॉलीवुड में हिंदी भाषा आना बहुत ही आवश्यक है। मैं आज भी हिंदी के नए शब्दों को सीखती हूं। मुझे हिंदी भाषा समझने और लोगों को अपनी बात समझाने में 5-6 महीने का वक्त लग गया। हिंदी सीखने के लिए किताबें पढ़ने के साथ-साथ लिखना और पढ़ना अपनी टीचर अपर्णा से सीखा।
- जॉर्जिया एंड्रियानी, इटली में जन्मी और वहां पली-बढ़ी
शनिवार, 27 अप्रैल 2019
नारे : मौत के सौदागर से चौकीदार चोर है तक
आधे देश में मोदी के इर्द गिर्द लड़ा जा रहा है चुनाव
मंगलवार, 19 मार्च 2019
मोदी के जल रूट पर प्रियंका वाड्रा का सफर
गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019
विपक्षी गठबंधन : ज्यादा जोगी मठ उजाड़
हस्तिनापुर(तकरीबन वर्तमान दिल्ली) के लिये समर की तैयारियां तेज हो गईं हैं। दोनों ही पक्ष , सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने तीर कमान दुरुस्त करने में जुटा है। दोस्त भी जुटाए जा रहे हैं। इस पर दोनों पक्षों से अलग तमाम लोग नज़र भी रख रहे हैं। इस बीच मुझे एक बार फिर लगता है कि जीत तो उसी की होगी जिस तरफ कृष्ण(जनता) होंगे। भले ही उनकी अक्षौहिणी सेना(तमाम राजनीतिक दलों को समझ सकते हैं) किसी दूसरी तरफ से लड़े, एक बार फिर यह मानने में कोई दो राय नहीं होगी कि किसी भी प्रकार से घटनाक्रम ऐसा घटित होगा कि कृष्ण सही और उचित की ओर से लड़ेंगे यानी जीत तो सच की होनी चाहिए। खैर इस दृष्टांत के जरिये मैं आने वाले लोकसभा चुनाव को समझने का प्रयास कर रहा हूँ। इससे पहले हमारे यहां मशहूर दो कहावतों पर नज़रसनी चाहता हूँ। एक ज्यादा जोगी मठ उजाड़ और दूसरा नौ कनौजिया नब्बे चूल्हा मोटामोटी अर्थ यह समझिए कि इतने अधिक विभिन्नता वाले लोगों में मतैक्य की गुंजाइश कम समझिए। अब चलते हैं आज के राजनीतिक परिदृश्य पर। कोलकाता से हैदराबाद तक में कम से कम चार गठबंधन मोर्चे पर हैं जगह-जगह जोरआजमाइश हो रही है।
सोमवार, 4 फ़रवरी 2019
पश्चिम बंगाल: मोर्चा भले ही पोलिस आयुक्त के आसपास है लड़ाई का मैदान लोकसभा चुनाव है
देश में व्यक्तित्व की विचित्रता वाले नेताओं के उभार से लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं, ये नेता ऐसे हैं कि कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते के अहंकार भाव से ग्रस्त हैं। इसकी शुरुआत यूपीए २ में अपनी ही सरकार के अध्यादेश को मीडिया के सामने फाड़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहसिंह को शर्मिंदा करने वाले वर्तमान पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने की। तब से यह रोग बढ़ता ही जा रहा है।
दिल्ली से कोलकाता तक ऐसे मंजर आम है। इससे अराजकता का माहौल बन रहा है और देश के संघीय ढांचे को नुक़सान पहुंच रहा है। अफसोसनाक बात है सियासी मजबूरियों के कारण इसके लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। एक सवाल है कि क्या केंद्र सरकार के विरोध में होने भर से देश की पूरी व्यवस्था को ध्वस्त करने की आजादी दे दी जानी चाहिए। ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शारदा चिट फंड मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम को रविवार को कोलकाता में हिरासत में ले लिया गया। केंद्रीय जांच एजेंसी की यह टीम कभी इसी मामले की जांच कर रही sit के अफसर और वर्तमान कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची थी। इस दौरान सीबीआई की टीम को घंटों थाने में बैठाया जाना राज्य सरकार और पुलिस की सोच पर सवाल उठाता है। बाद में टीम को छोड़ दिया गया और मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गईं और आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों को परेशान किया जा रहा है।
सवाल यह है कि कोलकाता पुलिस आयुक्त क्या राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं और पूछताछ से पहले किसी मुख्यमंत्री को किसी अफसर को क्यों क्लीनचिट देना चाहिए था या इसके लिए कोर्ट का रास्ता नहीं था पर जो रास्ता अपनाया गया अभूतपूर्व था और अब इसने सुबहे को जरूर जन्म दे दिया। सबको पता है कि पुलिस और प्रशासन का मुखिया सरकार का पसंदीदा अफसर ही होता है ऐसे में मुख्यमंत्री का राजीव कुमार के पक्ष में उतरना और जिस घोटाले में बनर्जी सरकार से जुड़े मंत्री और लोग आरोपित हों उस जांच टीम के मुखिया को अहम जिम्मेदारी दिया जाना सवाल तो उठाएगा। इससे राजीव कुमार की व्यक्तिगत छवि को भी धक्का पहुंचेगा। शारदा घोटाले की जांच सीबीआई supreme Court ki निगरानी में कर रही है ऐसे में केंद्रीय एजेंसी को पूछताछ से रोककर क्या माननीय न्यायालय का सम्मान किया गया या संघीय ढांचे की फिक्र की गई या यह बातें विभिन्न दलों के लिए बस जुमले हैं।
या सवाल उठता है कि इससे सीबीआई और पोलिस को सांस्थानिक रूप से कोई मजबूती मिली या उसकी छवि और व्यवस्था को ही नुकसान पहुंचा और क्या सिर्फ केंद्रीय सरकार के विरोध के कारण ही सभी संस्थाओं को दांव पर लगा देने की छूट है जबकि सबको पता है कि इन संस्थाओं के जरिये ही शांसन व्यवस्था कायम होती है। दरअसल लड़ाई में मोहरा कोई भी बने इसकी बिसात आगामी लोकसभा चुनाव है और दांव पर है प्रधानमंत्री की कुर्सी। पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश समेत हिंदी पट्टी के राज्यों ने वर्तमान सरकार के प्रतिनिधियों पर खूब प्यार लुटाया था पर दक्षिण पश्चिम बंगाल आदि में अपेक्षित सफलता नही मिल सकी थी। हिंदी पट्टी में सर्वाधिक उभार के बाद ही भाजपा ने समझ लिया था कि अगले लोकसभा चुनाव में उसे शायद उतनी सफलता न मिले, इसलिए यहां होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए उसने दूसरे राज्यों में प्रयास शुरू कर दिया था। इसमें उसे सबसे ज्यादा उम्मीद 42 सीट वाले पश्चिम बंगाल और 21 सीट वाले उड़ीशा से है जहाँ पिछले चुनाव में भाजपा को ओडिशा में 1 सीट और बंगाल में 2 सीट ही जीत पाई है।
इधर दोनों ही राज्यों में भाजपा मजबूत विपक्ष बनकर उभरी है और यहां पहले से स्थापित पार्टीयों को पीछे धकेल कर नंबर 2 की पोजिशन ले ली है और पार्टी के पास करिश्माई चेहरा नरेंद्र मोदी का होने से डरे दल इसे रोकने के लिए ये सारी कवायद करते नज़र आ रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में टीएमसी ने सभी 19 जिलों की 2467 पंचायत सीटों पर कब्जा जमाया और बीजेपी 386 सीट जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि टीएमसी से पहले कई दशक तक शांसन करने वाली माकपा को 94 सीट ही नसीब हुई। इससे पहले हुए नगरीय निकाय चुनाव में सभी 7 पर कब्जा जमाया था और 148 में से 140 वार्ड में जीत दर्ज की थी पर अधिकतर पर बीजेपी दूसरे स्थान पर थी। इससे राज्य में तृणमूल के लिए खतरे की घंटी बज गई है क्योंकि राज्य में उसकी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी बन चुकी है और दुसरे राज्यों मेंक्षेत्रीय दलों की तरह हाशिये पर जाने से बचने के लिए तृणमूल को उसे रोकना होगा। ऐसे में यह सारी कवायद खुद को प्रधानमंत्री मोदी के सामने मजबूत दिखाने की कवायद का हिस्सा नज़र आ रहा है क्योंकि यूपीए2 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कमजोर होने और मोदी के फैसले लेने में मजबूत होने की छवि का भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने में अहम योगदान रहा था। इ
विपक्षी दलों की ओर से प्लान बी पर भी काम किया जा रहा है जिसमें न भाजपानीत एनडीए की सरकार बने न कांग्रेसनीत यूपीए की, बल्कि इनसे अलग बाकी दलों की गठबंधन सरकार बने ऐसे में पूर्व में हुए इन्द्र कुमार गुजराल और hd देवगौड़ा वाले प्रयोग के मुताबिक कइयो को अपने लिए संभावना दिखती है। ऐसे में अंदरखाने सब अपने समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं। बंगाल में ममता खुद को मोदी से टक्कर लेते दिखना चाहती हैं तो महाराष्ट में पवार और उत्तर प्रदेश में माया की हसरत किसी से छिपी नहीं है। वहीं दक्षिण में केसीआर और चंद्र बाबू नायडू अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। दिल्ली के केजरीवाल तो मोदी के खिलाफ चुनाव तक लड़ चुके हैं। इसमे जांच एजेंसियों से लेकर चुनाव आयोग तक को निशाना बनाये जाने से कोई झिझक नही रहा है। इसमें किसी को चिंता नहीं है कि संस्थानों पर से आम जनता का विश्वास उठ गया तो इनकी लगाई आग बुझाए न बुझेगी। फिर कुर्सी पर कोई भी क्यों न हो।
शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019
सदन में मोदी मोदी और राहुल जागो - राहुल जागो के लगे नारे
गुरुवार, 24 जनवरी 2019
प्रियंका वाड्रा की एंट्री : क्या कांग्रेस ने हार मान ली या कोई रणनीति
अभी तक प्रियंका वाड्रा गांधी राजनीति में नहीं थी तो उन पर कम राजनीतिक हमले होते थे। कभी कभार कोई मामला सामने आया होगा पर अब बिपक्षी शायद ही छूट दें वो भी तब जब पति रॉबर्ट उनकी कमजोर कड़ी हों। उन्हें हरियाणा और राजस्थान में उन जमीन घोटालों का जवाब तलाशना होगा कि कैसे महज लाख की कंपनिया यूपीए के कार्यकाल में कुछ साल में ही करोंङों की हो गई।
वहीं बीकानेर जमीन घोटाले की जांच में राबर्ट वाड्रा को राजस्थान हाईकोर्ट ने ईडी के सामने पेश होने का आदेश दिया है। अब 12 फरवरी को राबर्ट वाड्रा और उनकी मां समेत स्काईलाइट हास्पीटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड के सभी साझीदारों को ईडी में पूछताछ के लिए हाजिर होना पड़ेगा। राहत की बात सिर्फ इतनी है कि ईडी वाड्रा को गिरफ्तार नहीं कर सकता है। इडी को शक है कि वाड्रा कि मुखौटा कंपनी के जरिये इसमे विस्थापितों के लिए निर्धारित जमीन को खुर्द बुर्द की गई।
इसके अलावा भी राजस्थान और हरियाणा के कई अन्य जमीन घोटाला और आर्थिक अपराध के मामले में अक्सर इनका नाम भी मीडिया की जीनत बनती रही हैं, उनका भी जवाब तलाशना होगा। कैसे औने पौने दाम पर सरकारी जमीन इन तक पहुंची और करोड़ों की हो गई। कैसे बिल्डर इन पर मेहरबान रहे क्यों सरकारी प्रोजेक्ट इन्हीं की जमीनों के आसपास पास हुए। ऐसे बेशुमार सवालों के जवाब वाड्रा को ढूंढने होंगे। तब कांग्रेस बचाव में यह दलील नहीं दे पाएगी कि प्रियंका राजनीति में नहीं हैं।
शनिवार, 19 जनवरी 2019
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कितने हिंदू
रविवार, 13 जनवरी 2019
प्रयाग में माघ महीने में गंगा किनारे रहकर इन्द्रियों को वश में कर स्नान - ध्यान कर ईश्वर की आराधना करना ही कल्पवास है
संयम का अभ्यास और पवित्रता को पाने की कोशिश कल्पवास की बुनियादी शर्त है। यह पौष माह के ११ वें दिन से माघ माह के १२ वें दिन तक लगता है। धैर्य और भक्ति के लिए जाना जाता है। इस अवधि में एक दिन में एक बार ही भोजन किया जाता है।
भारत कोष के मुताबिक हजारों साल पहले जब प्रयाग शहर बसा भी नहीं था गंगा और यमुना के किनारे आसपास जंगल था। यहां ऋषि मुनि तपस्या करते थे उन्होंने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। इस दौरान यहां आने वालों को शिक्षा दीक्षा दी जाती थी। इस दौरान उन्हें पर्णं कुटी में रहना पड़ता था। अब पत्ते की कुटी की जगह तंबुओं ने के ली है। कल्पवास के दौरान गृहस्थों के तीन कार्य होते थे। तप, होम और दान। कल्पवासियों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से शुरू होती है और डर रात तक भजन प्रवचन आदि जैसे कार्यों के साथ समाप्त होती है।
भारत कोष के मुताबिक हजारों साल पहले जब प्रयाग शहर बसा भी नहीं था गंगा और यमुना के किनारे आसपास जंगल था। यहां ऋषि मुनि तपस्या करते थे उन्होंने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा। इस दौरान यहां आने वालों को शिक्षा दीक्षा दी जाती थी। इस दौरान उन्हें पर्णं कुटी में रहना पड़ता था। अब पत्ते की कुटी की जगह तंबुओं ने के ली है। कल्पवास के दौरान गृहस्थों के तीन कार्य होते थे। तप, होम और दान। कल्पवासियों की दिनचर्या सुबह गंगा-स्नान से शुरू होती है और डर रात तक भजन प्रवचन आदि जैसे कार्यों के साथ समाप्त होती है।

पद्म पुराण में कल्पवास को इस तरह परिभाषित किया गया है।
प्रयागे माघ पर्यन्त त्रिवेणी संगमे शुभे। निवासः पुण्यशीलानां कल्पवासो हि कश्यते॥
पुराण के मुताबिक तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर माघ मासभर निवास करने से (साधना कर कल्पवास करने)पुण्य फल प्राप्त होता है। संगम तट पर कल्पवास करने के संदर्भ में माना गया है कि कल्पवासी को इच्छित फल तो मिलता ही है, उसे जन्म जन्मांतर के बंधनों से मुक्ति मिल जाती है।
महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का जो फल मिलता है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है। जगह जगह यह वर्णन मिलता है कि भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस के वध की क्षमता कल्पवास से ही प्राप्त की थी। ब्रह्मा के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों को कल्पवास करने से आत्मदर्शन का लाभ हुआ।
कल्पवास की अवधि : कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि की है। बहुत से श्रद्धालु जीवनभर माघ मास गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं। विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है। इसकी महत्ता को देखते हुए पुराणों में तो यहां तक कहा गया है कि इसी कारण आकाश तथा स्वर्ग में जो देवता हैं, वे भूमि पर जन्म लेने की इच्छा रखते हैं। वे चाहते हैं कि दुर्लभ मनुष्य का जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में कल्पवास करें।
महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन्! प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना इंद्रियों को वश में करके स्नान- ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है।
कल्पवास का विधान : प्रयाग क्षेत्र में निवास से पहले दिन में एक बार भोजन का अभ्यास कर लेना चाहिए। प्रयाग के लिए चलने से पहले गणेश पूजा अनिवार्य है। मार्ग में भी व्यसनों से बचे रहें। त्रिवेणी तट पर पहुंच कर यह संकल्प लें कि कल्पवास की अवधि में बुरी संगत और गलत वााणी निकालने की बुराई का त्याग करेंगे, यहां कहा जाता है कि महीनेभर संयम का पालन करने से व्यक्ति की इच्छाशक्ति दृढ़ होती है और वह आगे का जीवन सदाचार से व्यतीत करता है।
कल्पवासी को चाहिए कि निम्नलिखित मंत्र पढ़कर अपने ऊपर गंगा जल छिड़के।
मंत्र : ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थांगतोऽपि वा। यः स्मरेत पुण्डरीकांक्ष से बाह्याभ्यंतरः शुचि । इस मंत्र से आचमन करें- ॐ केशवाय नमः ॐ माधवाय नमः ॐ नाराणाय नमः का जाप करें ।
हाथ में नारियल, पुष्प व द्रव्य लेकर यह मंत्र पढ़ें। इसके बाद आचमन करते हुए गणेश, गंगा, यमुना, सरस्वती, त्रिवेणी, माधव, वेणीमाधव और अक्षयवट की स्तुति करें।
मंगलवार, 8 जनवरी 2019
गरीब सवर्णों को दस फीसदी आरक्षण: मोदी ने खींच ली कांग्रेस के पैरों तले से जमीन
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