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विचार
शनिवार, 10 नवंबर 2018
प्रदूषण से लड़ना किसकी जिम्मेदारी
बुधवार, 17 अक्टूबर 2018
शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2018
राज्यों के चुनाव में फिर बीजेपी के लिये गेम चेंजर साबित हो सकते हैं मोदी
बुधवार, 10 अक्टूबर 2018
बुंदेलखंड का आध्यात्मिक और पर्यटन का केंद्र है दतिया
इसलिए यहां पीले वस्त्र में अनुष्ठान करते हैं राज सत्ता की चाहत रखने वाले और दुश्मनों से रक्षा की गुहार लगाने अक्सर भक्त यहां हाजिरी लगाते हैं। मंदिर में पूजा पाठ के लिए काफी स्पेस है। सबसे बड़ी बात शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के साथ शिव के भी विभिन्न मंदिर है। सम्भवतः यह शिव पार्वती दंपति के प्रेम का प्रतीक है। शक्ति के जल्द क्रोधित होने वाली स्वरूप धूमावती मां का मंदिर भी है मगर ज्यादातर यह बंद ही रहता है यह 7.30 baje शाम को आरती के समय ही खुलता है।
यहां भक्तो के लिए रहने और नाश्ते आदि की भी व्यवस्था है मगर अब यह सुविधा सिर्फ नियमित भक्तों को मिलती है बहुत कम शुल्क पर । पहले सभी को यह सुविधा उपलब्ध थी मगर आने वाले लोगों के कर्मचारियों से दुर्व्यवहार की वजह से यह सुविधा अन्य के लिये बंद कर दी गयी। हालांकि यहां रुकने के लिए अन्य होटल आदि मिल जाएंगे।

दतिया में बहुत कुछ है देखने लायक: सिद्धपीठ के अलावा भी दतिया में देखने लायक बहुत कुछ है। राजा वीर सिंह का 16 विन शती में बनवाया गया सात खंडा महल। यह महल 7 तल वाला है किंवदंती यह है कि इसमें 7 तल अंदर ग्राउंड भी हैं मगर पुरातत्व बिभाग वाले सुरक्षा कारणों से इसे बंद रखते हैं दीवाली पर सफाई के लिए ही मजदूर निचले हिस्से में जा पाते हैं वो भी 1 तल। बाकी दिनों में महल के ऊपरी हिस्से में लोगों को आने जाने दिया जाता है। महल के दो तरफ तालाब है जिससे नहाकर महल की ओर आने वाली हवा से भीषण गर्मी में भी आपको यहां गर्मी महसूस नहीं होगी। साथ ही इससे पूरे शहर का नज़ारा देखा जा सकता है। और तालाब इस शहर को खूबसूरत बनाते हैं। वीर सिंह के वंशजो का किलानुमा घर भी है मगर वो आमलोगों के लिए शायद बंद है वहां राजा के परिजन रहते हैं।
https://datia.nic.in पैलेस भी यहीं है इसे राजा शत्रुजीत बुंदेला ने बनवाया था। महाभारत कालीन वनखण्डेश्वर मंदिर भी यहीं है। आसपास भी बहुत कुछ:दतिया से 12 किलोमीटर दूर सोनागिरी जैन धर्म का तीर्थ स्थल है। दतिया से 17 किलोमीटर दूर पराग ेेतीहसिक काल का उन्नाव बालाजी मंदिर है। 55 किलोमीटर दूर घने जंगल में रतनगढ़ माता का मंदिर है। दिल्ली की तरफ से आने पर 69 किलोमीटर पहले ग्वालियर है, जहां किला, सिंधिया पैलेस, झांसी की रानी पार्क, तानसेन की मजार, तिघरा डैम आदि दर्शनीय स्थल हैं। दतिया से 34 किलोमीटर दूर झांसी और 52 किलोमीटर दूर ओरछा है यहां भी काफी दर्शनीय स्थल हैं कुल मिलाकर समय हो तो यहां और आसपास इतने दर्शनीय स्थल हैं अलग अलग तरीके की सोच वालों को जो दीवाना बना दे। कैसे पहुंचे:दतिया दिल्ली मुम्बई रेल रुट पर है। यह दिल्ली से 325 किलोमीटर दूर तो भोपाल से 320 किलोमीटर दूर है। इस रूट पर ट्रेन तकरीबन समय पर चलती हैं। एक अच्छी ट्रेन ताज एक्सप्रेस है सिटिंग ac aur non ac भी है, मगर सीट बस से आरामदायक है। और भी कई अच्छी ट्रेन है। बस की भी सुविधाएं भी हैं।
सोमवार, 8 अक्टूबर 2018
History of india
इ सी सोच के साथ पिछले साल मुझे व्हाट्सएप पर किसी साथी से अतीत की घटनाओं के कुछ फोटो मिले थे, आजकल सोशल मीडिया पर तमाम सवाल उठते रहते हैं मैनी इनका परीक्षण नहीं किया मगर पहली नज़र में सही लगीं। इसलिए एक साल से संभाल कर अब इन्हें गूगल पर सुरक्षित कर देने की मंशा से ब्लॉग पर डाल दे रहा हूँ, ताकि जब जरूरत पड़े पाया जा सके।
शुक्रवार, 28 सितंबर 2018
राफेल विमान विवाद : कितनी हकीक़त कितना अफसाना
देश के अभिजात्य के पलकों के साये में पले बढ़े राहुल गांधी 2004 में अमेठी से चुनाव जीतने के बाद महज 15 साल में देश की सबसे पुरानी पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंच गए। ऐसी किस्मत कांग्रेस के किसी दूसरे कार्यकर्ता की कब होगी पता नहीं पर राहुल पहली बार किसी जिम्मेदारी को उठाने के लिये शायद मजबूर किये गए हैं। इससे पहले तक एक अनिच्छुक राजकुमार के रूप में उनके पास बेशुमार ताकते थीं मगर जिम्मेदारी कुछ भी नहीं। अब मीठा मीठा गप्प कड़वा कड़वा थू से काम नहीं चलेगा, अब पार्टी के सफलता का श्रेय राहुल को दिया जाएगा तो असफलता भी स्वीकार करनी होगी।
राहुल के पार्टी अध्यक्ष दिसंबर 2017 बनने के बाद अब बड़े राज्यों में मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनाव प्रक्रिया चल रही है। इससे पहले पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में फरवरी में हुए चुनाव में उनकी पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। मगर इन चुनावों के परिणाम से उनका वास्तविक मूल्यांकन जरूर होगा। फिलहाल उनकी अगुवाई में कांग्रेस ने एंटनी समिति की उस सिफारिश पर अमल करना शुरू किया है जिसमें समिति ने 2014 के चुनावों में हार की प्रमुख वजह मुस्लिम समुदाय की ओर पार्टी के अधिक झुकाव की चर्चा को वजह बताई गई थी। इससे अब कांग्रेस अध्यक्ष मंदिर मंदिर घूम रहे हैं, इससे पहले यह क्षेत्र मुख्य रूप से बीजेपी नेताओं का समझा जाता था। इससे पहले तक पार्टी महज इफ्तार पार्टी ही मानते देखी जाती थी। मगर संकेत की इस राजनीति से उनकी पार्टी और मतदाता को क्या मिलेगा और यह सिर्फ चुनावी हार का दबाव है तो आमलोग इसे कितना स्वीकार करेंगे यह समय ही बताएगा। और यह भी की जिस वजह से एक समुदाय विशेष इस पार्टी से नजदीकी महसूस करता था अब उसका कांग्रेस से कैसा रिश्ता रहेगा।
फिलहाल राहुल नीत कांग्रेस में सत्ता की अकुलाहट नजर आ रही है। इसको लेकर कांग्रेस तमाम उन रास्तों पर बढ़ रही है जिसके लिए वह बीजेपी की आलोचना करती थी। अब धर्म और जाति का खुलेआम प्रदर्शन शर्म का बायस नहीं बन रही है। मध्य प्रदेश शिवभक्त राहुल और राहुल की जाति ब्राह्मण जैसे पोस्टर से पट रहा है, हालांकि देश का बौद्धिक गिरोह चुप्पी साधे है। हालांकि देश की एक राष्ट्रीय पार्टी की ओर से इस तरह का व्यवहार समझ से परे है फिर सपा, बसपा, डीएमके में क्या फर्क होगा।
राफेल सौदा: फिलहाल राहुल देश के लिये फ्रांस से खरीदे जाने वाले राफेल विमान को लेकर खासे आक्रामक हैं। वो इसमें अनियमितता का आरोप लगा रहे हैं। हालांकि फ्रांस की सरकार और देश की केंद्र सरकार ने इसको खारिज किया है। उनकी एक आपत्ति खरीद के तहत विमान की बिक्री से मिलने वाली रकम के एक हिस्से का मेक इन इंडिया के तहत भारत की किसी कंपनी के साथ मिलकर निवेश करने के मामले का है। इसके लिए फ्रांसीसी देसा ने रिलायंस को पार्टनर चुना है। राहुल इसी को लेकर घेर रहे हैं हालांकि इसमें देसा-रिलायंस की हिस्सेदारी 51-49 की रहेगी। अगर ऐसा है तो यह कंपनी रिलायंस लीड नहीं करेगी मोटे तौर पर।
फिलहाल दूसरा विवाद कीमत को लेकर है इसकी आधिकारिक कीमत अभी सामने नहीं आयी है और यही विवाद की भी वजह बन रही है। सब का अलग कैलकुलेशन है कांग्रेस कह रही है यह हमारी ओर से किये करार से महंगा है तो एनडीए सरकार उनके करार के विमानों में कुछ और छेजेलचीजें जुड़वाने के लिहाज से सस्ता बता रही है। बहरहाल जब तक कैग की रिपोर्ट नहीं आ जाती तब तक हर खिलाड़ी को अपने तरह से खेलने से कोई रोक नहीं सकता। बता दें कि यूपीए 2 के कार्यकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को हार में उनके कुशासन के साथ टू जी, कामनवेल्थ, आदर्श सोसायटी और रक्षा कंपनी के भ्रष्टाचार आदि को वजह बताया जाता है। अब फिर चुनाव है तो कुछ उसी तरह की चौसर सजाने की कोशिश हो रही है।
फिलहाल राफेल की खरीद प्रक्रिया की शुरुआत में चलते हैं अगस्त में इंडिया टूडे में एक रपट छपी है इसमें वरिष्ठ पत्रकार लिखते हैं कि मोदी सरकार के 36 विमानों की खरीद और यूपीए की 126 विमानों की खरीद की चर्चा की तुलना नहीं कि जा सकती। क्योंकि समझौते पर वास्तविक दस्तखत nda ने किए हैं, upa ने समझौता किया ही नहीं था। हालांकि दोनों ने ने ही सही लागत का ब्योरा जाहिर नहीं किया है।
इसी रिपोर्ट में रक्षा विश्लेषक नितिन गोखले की किताब सिक्यॉरिंग इंडिया द मोदी वे के हवाले से उल्लेख है कि 2011 में रक्षा मंत्रालय ने 2011 में इस खरीद के लिये 163403 करोड़ रुपये यानी करीब 23 अरब यूरो का बेंच मार्क तय किया था। इस आंकड़े के मुताबिक प्रति विमान लागत 1296 करोड़ बैठती। पर विमानों की अधिग्रहण की लागत जैसा कि किताब में जिक्र है 126mmrca के लिए अनुबंधित कुल लागत से अलग थी, जिसके लिये रक्षा मंत्रालय ने 69454 करोड़ का बेंच मार्क तय किया था। इसमें ऑफसेट लोडिंग की लागत शामिल नहीं थी जिसकी अनुमानित लागत 2530 करोड़ से 5060 करोड़ के बीच रखी गई है। इससे ऐसा लगता है कि विमानों की कीमत 1296 करोड़ से भी ज्यादा बैठती। यह हाल टैब था जब कीमत के पेंच और अन्य मामलों को लेकर समझौता नहीं हो पा रहा था।
वहीं रपट में ही बताया गया है कि 2016 में 36 राफेल के तुरंत बाद रक्षा मंत्रालय ने एक ऑफ द रिकॉर्ड ब्रीफ़िंग में संकेत दिया था कि 36 राफेल के लिए 7.8 अरब यूरो का करार हुआ है। इसमें 5 अरब जहाजों के लिए और 2.85अरब इसमें लगने वाले हथियारों और भारत की विशिष्ट जरूरतों के मुताबिक कुछ विशिष्ट संवर्धन के एवज में दिए जाने थे। इन लड़ाकू विमानों को 70 करोड़ यूरो की लागत से हवा से हवा में मार करने वाली मेंटॉर मिसाइल और हवा से सतह पर मार करने वाली स्कैल्प क्रूज मिसाइलों से लैस करने की बात भी जोड़ी गई। इसका उद्देश्य कम संख्या में मिलने वाले राफेल विमानों का अधिकतम उपयोग करके अपनी सामरिक जरूरतों की पूर्ति करना था। अगर ऐसा है तो अब का सौदा यूपीए की चर्चा से महंगा तो नहीं है। इधर रिपोर्ट में बताया गया है कि 12 मार्च को रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने बताया कि मोटे तौर पर एक राफेल की कीमत 670 करोड़ पड़ेगी। जिसमें संबंधित उपकरणों, हथियार आदि के खर्चे शामिल नहीं हैं।
अगर यही मामला है तो इस तरह मोठे तौर पर यूपीए के 1296 करोड़ और एनडीए के 670 करोड़ में कौन सस्ता है ज्यादा समझने में दिक्कत नहीं है फिर विवाद की वजह tit for tat जैसे को तैसा का लगता है। जैसा 2 जी घोटाले में फिलहाल तमाम अरोपी बरी हो गए मगर यूपीए की छवि को धक्का लगा और लोग सत्ता से बाहर होने को इसे बड़ी वजह मान रहे हैं।
मगर फिर दोनों दलों में फर्क क्या, वो मामला तो कैग की रिपोर्ट के बाद बवाल की वजह बना था मगर इसके लिए तो कैग की रिपोर्ट की भी जरूरत नहीं समझी जा रही है। ये तो असहिष्णुता है कांग्रेस जिसका आरोप बीजेपी नेताओं पर लगाती है। सबसे चिंता जनक है राजनीति रक्षा के मामले में हो रही है और उनकी चिंता नहीं कि जा रही है जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए बिना कुछ सोचे जान की बाजी लगा दी और कहा हम रहे न रहें यह देश रहे, और न ही ब्राह्मण और शिवभक्त का पोस्टर लगवाने वाले कांग्रेस अध्यक्ष उस ब्राह्मण चाणक्य की कही बात को याद कर रहे हैं जिसने कहा चंद्रगुप्त देश के लिये तुम राजा बने हो और जरूरत पड़ी तो तुम्हे सत्ता छोड़नी पड़ेगी(चाणक्य नाम की बुक से)। और यहाँ सिर्फ सत्ता के लिए क्या हो रहा है।
इधर सत्ता की अकुलाहट इतनी बढ़ रही है कि 20 जुलाई को मानसून सत्र में लोकसभा में कांग्रेस अध्यक्ष के बयान से देश को शर्मशार होना पड़ा। दरअसल गांधी ने आरोप लगाया कि राफेल में सरकारी गोपनीयता के मामले में रक्षा मंत्री ने प्रधानमंत्री के कहने पर झूठ बोला था। इसमें उन्होंने कहा था कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उन्हें बताया था कि फ्रांस के साथ ऐसा कोई गोपनीयता समझौता नहीं हुआ था। कुछ घंटे बाद ही फ्रांस की सरकार ने राहुल की बात का खंडन कर दिया और गोपनीयता के मामले पर जोर दिया। इस मामले में वायु सेना अध्यक्ष को राफेल का पक्ष लेने पर राजनीतिक मामलों से दूर रहने की सलाह भी कांग्रेस की ओर से धमकाने जैसा ही था जो उचित नहीं है।
इधर राहुल की ओर से रिलायंस को देसा का पार्टनर बनाने के दबाव के आरोप से भी देसा और फ़्रांस की सरकार ने पल्ला झाड़ लिया है। इस तरह तो दूसरों की छवि पर बिना उचित सबूत दिए प्रहार से राहुल की छवि भी कितनी अच्छी बनेगी यह सवाल है। अभी कुछ दिनों पहले ट्रोलर्स की ओर से विदेश मंत्री को भला बुरा कहे जाने पर कुछ वेबसाइट के लेखों में कहा गया था ये भाजपा के पाले हु ट्रोलर्स हैं और भस्मासुर बन गए । इस नज़र से देखें तो राहुल की कवायद राजनीति के और पतन व झूठ के व्यापार के एक और नींव रखती नज़र आ रही है।
गुरुवार, 19 जुलाई 2018
#talktoamuslim: मुस्लिम समाज को खुद से भी बात करने की जरूरत
इन दिनों सोशल मीडिया पर हैश टैग टॉक टू अ मुस्लिम ने एक नई बहस छेड़ दी है। इसके पक्ष में भी और विपक्ष में भी तमाम लोग अपनी राय रख रहे हैं। इससे एक संदेश निकल रहा है कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को देश के दूसरे लोग नहीं समझते, खैर इस पर वाद प्रतिवाद जारी है। और इसमें कुछ हो या न हो देश की छवि धूमिल करने की कोशिश करने वालों का मकसद कामयाब तो होता ही है। साथ ही हैशटैग शुरू करने वाली सेलेब्रिटी कुछ दिन चर्चा में भी रहेगी।
यह वैसा ही है जैसा पिछले दिनों रॉयटर्स फाउंडेशन नामक एक निजी संगठन ने भारत को स्त्रियों के लिए सबसे असुरक्षित देश महज चंद लोगों से बातचीत के आधार पर घोषित किया था। यह कैसा मजाक था कि ऐसे देश खास तौर पर सीरिया जैसे जहां आतंकी महिलाओं को बंधक बनाकर दुष्कर्म करते हैं और उन्हें बेचकर जन्नत का टिकट कटाते हैं उस पर निगाह नहीं डाली गई और भी हमारे पड़ोस में भी तमाम देश हैं जहां के कारनामे दुनिया भर में सुर्खियां बटोरते हैं उनके बारे में भी नहीं सोचा। खैर भारत में भी अपराध काफी हो रहे हैं जो हमारे लिये शर्म का वायस हैं मैं उनका बचाव नहीं कर रहा हूं मगर सर्वाधिक पर आपत्ति तो है।
खैर बात करते हैं हैशटैग वाले विषय पर तो मुझे लगता है आज का जो दौर है जिसमें मुस्लिम धार्मिक कट्टरता, क्रूरता और हिंसा बढ़ती जा रही है, उसमें मुस्लिम समाज को खुद से भी बात करनी चाहिए कि क्या वजह है जिन भी देशों हिंसा हो रही है वो इसी समुदाय के बाशिंदों की ज्यादा आबादी वाला है और प्रशासन भी इन्ही का है सीरिया की बात करें, अफगानिस्तान की बात करें या नाइजीरिया की बात करें या किसी और की। अफगानिस्तान में तो बाकायदा शरई शाषन लागू करने की जंग ही है। पैगम्बर ने किसी की हत्या के लिये तो नहीं कहा है जहां तक मैं जानता हूँ। ऐसे में मुस्लिम समाज इसे रोकने के लिए क्या कर रहा है। कुल मिलाकर बुनियादी गड़बड़ी कुछ तो है जिसे मुस्लिम समाज को ही सोचना होगा।
कुछ लोग कहेंगे हिंसा हिन्दू समुदाय के लोग भी करते हैं मगर भारत में भी नक्सलवाद है और इसकी आतंकवाद से तुलना नहीं कर सकते, इसमें आम जनता इस कदर प्रभावित नहीं होती।इस समुदाय के अमन पसंद लोगों को सोचना चाहिए कि जो भी हिंसा करने वाले हैं ज्यादातर इसी समुदाय से क्यों हैं ओसामा से फजलुल्लाह तक। यहां तक भारत जैसे देश से भी आतंकी निकला तो उसका नाम दाउद, अबू सलेम निकला । इसके अलावा भी भारत के तमाम दबंगों के नाम इस तरह के होंगे, अभी बागपत जेल में एक मुन्ना बजरंगी नाम का बदमाश मारा गया उसके भी मुस्लिम समुदाय के एक व्यक्ति के लिए काम करने की खबरें छप चुकी हैं।
मैं ये नहीं कहता कि दूसरे समुदायों में अपराधी नहीं हैं कट्टर नहीं हैं औऱ उन्हें किसी तरह छूट मिलनी चाहिए मगर सामूहिक हिंसा की ऐसी प्रवृत्ति दूसरे समुदाय से आने वाले व्यक्ति में कम देखने को मिलती है। इन सब में सबसे खतरनाक है इसको सामाजिक स्वीकृति इस पर मुस्लिम समाज में चर्चा सुनाई नहीं देती। br /> अभी कुछ समय पहले बॉलीवुड की एक फ़िल्म आई थी रईस, इसकी पंच लाइन थी बनिये का दिमाग और मियां भाई की डेयरिंग और नायक हिंसक गतिविधियों में शामिल होता है। जब किसी नकारात्मक विषय पर फ़िल्म बनने लगे और उस पर आपत्ति भी न हो तो समझ लेना चाहिए कि उस समाज में नकारात्मक बातों को किस हद तक स्वीकृति मिल चुकी है, इस तरह की डेयर उपलब्धि नहीं मानी जा सकती। मुस्लिम समाज में दीन को लेकर हर कुछ महीने में कॉन्फ्रेंस होते मिल जाएंगे मगर सामाजिक मसलों पर चर्चा आप शायद ही सुने जबकि धर्म समाज के लिये ही है।पिछले साल सम्भल में इस तरह की कुछ पंचायतें अपवाद ही हैं और इस समाज का कोई अगुआ भी नहीं बोलता। इसलिए दूसरे समाज के लोग और नेता भी चुप ही रहते हैं। बल्कि समाज को अच्छे सामाजिक पहल वाले मसलों पर चुप्प रहने नेताओं को अपना हितैषी तो नहीं मानना चाहिए। अपराधी भी बचने में जोखिम उठा लेते हैं तो क्या उन्हें साहसी कहा जाएगा।
खैर आते हैं टॉक टू मुस्लिम वाले विषय पर संभवत: ये दूसरे समुदाय से खौफ को एड्रेस करने की कोशिश हो सकती है तो मैं कहना चाहूंगा आदमी हिंसा से डरता है और हिंसा ज्यादा कहाँ है खुद सोचें। इस मसले पर इसी समाज को सोचना पड़ेगा। रही बात भारत की तो इस विषय पर अभियान छेड़ने की जरूरत बहुसंख्यक समुदाय के साथ ज्यादती है। क्योंकि देश की 20% आबादी को कोई दरकिनार कर सके संभव नहीं है। भारतीय मुस्लिमों से बात न किया जाना यह गॉसिप ही है , अभियान शुरू करने वाली गौहर खान जी खुद भी सोचें, उनके कितने हिन्दू परिचित होंगे। फिर गुमराह किसे कर रही हैं। कोई भी आंख बंद कर एक पल के लिए सोचे तो हर हिन्दू के दो चार मुस्लिम दोस्त जरूर होंगे या परिचय होगा या उनसे राब्ता होगा। संबंध भी ठीक होंगे।
जहां तक मेरे मुस्लिम समाज को खुद से बात करने के लिए कहने की बात है तो उसकी वजह है पिछडापन मगर क्या उसके लिये सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है मगर गहराई में देखेंगे तो काफी हद तक इसके लिये इस समाज की इलीट जिम्मेदार है जो खुद आगे बढ़ने के बाद समाज के वंचितों को फालतू की बातों में उलझाए हुए है। इनकी उन्नति के लिये कुछ किया भी नहीं, न विश्व विद्यालय खोले न अस्पताल। ऐसा भी नहीं कि इस समाज में सब गरीब ही हैं, मदन मोहन मालवीय ने तो चंदे से बीएचयू बनवा दिया। रामपुर में जरुर एक विश्वविद्यालय खोला गया मगर इसमें आसपास के गांवों की जमीन कब्जा ली गई और फायदा तत्कालीन मंत्री को पहुंचा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि विश्वविद्यालय का मकसद समाज था या व्यक्ति, खैर इसकी जांच चल रही है।
फिलहाल मुस्लिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा को लेकर दिलचस्पी अभी तक जग नहीं पाई है, जबकि हिन्दू समुदाय में दलितों की हालत कभी बहुत खराब थी। आज उनमें उल्लेखनीय प्रगति दिखाई देती है। आज गरीब दलित अगर रिक्शा चला रहा होगा तो भी अपने बच्चे को पढ़ाने की कोशिश करता मिलेगा। ये हाल तब है जब उनके साथ भेदभाव समाज में था कुछ हद तक कह सकते हैं कि हो रहा होगा। मुस्लिम समुदाय को तो अस्पृश्यता का दंश भी नहीं झेलना पड़ा। वो खुद शासक वर्ग से थे अंग्रेजों से पहले उनके शासन का लंबा इतिहास है। अंग्रेजों के दौर में भी इनमें से एक वर्ग काफी अच्छी स्थिति में था जैसा कि इतिहास से पता चलता है।
भारत में तो हिंदू मुसलमान एकमेक हैं उनकी भाषा और अदब तक तो एक जैसी है। लखनऊ में रहने वाला मुसलमान एक पन्ना अपनी स्थानीय उर्दू में लिखे और देखे की उसमें कितने शब्द अवधी के हैं उसे पता भी शायद न हो ऐसे में ही हिन्दू लिखे तो देखे कितने शब्द वो हिंदी के समझता है वो उर्दू फ़ारसी आदि के हैं। फिर टॉक टू मुस्लिम का सवाल ही सवालों में रहेगा। भारत के सभी समाजों की उन्नति की वजह सिर्फ सरकार नहीं है चाहे शिक्षा हो या अन्य मामला उस समाज के लोगों ने भी प्रयास किया है। ऐसे में मुस्लिम समाज को अपने अगुओ से सवाल करना चाहिए। एक समय हिंदुओं में सती प्रथा, विधवा समस्या जातिपाँति, छुआछूत की बीमारी थी। इसके खिलाफ समाज से आवाज उठी, स्वतंत्र भारत में कानून बने लेकिन ऊपरी विरोध भी हुआ होगा, मगर बहुसंख्यक का समर्थन मिला। इसका काफी असर भी हुआ है। इधर मुस्लिम समाज क्या तैयार होगा इसके लिए, लगता नहीं। राजीव गांधी के कार्यकाल में तलाक़शुदा महिला नूर बानो को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मुस्लिम समाज के दबाव में सरकार ने पलट दिया। ऐसे में लगता है कि समाज खिड़कियां खोलने को तैयार है, यह फैसला मुस्लिम महिलाओं को शसक्त करता नतीजा मुस्लिम समाज ही शसक्त होता। जब सरकार तक जिस समाज सर डरती हो उस समाज की ओर से टॉक टू मुस्लिम हैशटेग से अभियान चलाना ज्यादती नहीं तो क्या है। मदरसों के आधुनिकीकरण की बात निकलते ही शक सुबहा सामने आ जाता है मसलन किसी भी नई बात का विरोध तभी तो राजनीतिक दलों को इस समाज को वोट बैंक समझने का मौका मिलता है कोई खुद को मुल्ला मुलायम कहलवाता है, कोई मैं मुसलमानों का हूँ मैं कांग्रेस हूं कहता है मगर इन सब का नतीजा क्या है। ऐसे में समाज को सबसे पहले खुद से सवाल करना होगा ऐसा क्यों है।
आज हिंदू विवाह अधिनियम पारित हुआ, और ज्यादतर हिंदू की मजाल नहीं होती विवाहिता से पंगा ले और किसी ने लिया तो भुगतता है। मगर आज तक भारत में निकाह, हलाल को लेकर कानून नहीं बन सका क्योंकि इसे तुरंत धर्म से जोड़ दिया जाता है, खूद सोचें कि ये धर्म का विषय है या समाज का और इस पर समाज से कोई आवाज नहीं उठती तो ऐसे बंद समाज से तो दूसरे लोग डरेंगे । मुझे लगता है यहां यही स्थिति है। मैं बीते साल मुरादाबाद में था। वहाँ अमरोहा के मंडी धनौरा तहसील के एक मौलवी के घर एक मुस्लिम परिवार रहता ।दंपति में मामूली बात पर विवाद हुआ और पति ने 3 तलाक कह दिया। जल्द ही पति को होश आ गया मगर मौलवी ने यह बात सुन ली थी। पति कहता रहा कि मैंने गुस्से में कहा मगर मौलवी साहब ने पंचायत बुला ली, वो तो खुद हलाला के लिये तैयार थे। अब बताइये ऐसी स्थिति पर सामाजिक चूप्पी क्या इशारे कर रहा है इसके खिलाफ कोई चर्चा कभी हुई, नहीं। यह खबर अखबार में प्रकाशित हुई है, अब कोई अख़बार पर सवाल न उठा दें क्योंकि संबंधित अखबार की पॉलिसी इस मामले में बेदाग है।
एक और किस्सा सुनाता हूँ मुरादाबाद मंडल का जिला है संभल। इसमें एक मोहल्ला है दीपा सराय व्यापारिक केंद्र है और मुस्लिम समुदाय के लोग बहुतायत में हैं। एक अपराधी को पकड़ना था, पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी वहां जाने के लिए। बहुत दबाव पड़ने पर कई थानों की फोर्स गई तो घर की महिलाओं ने धर्मग्रंथ की बेहुरमती का आरोप लगाकर पोलिस पार्टी को पीटा और उनको जान बचाकर भागना पड़ा। बाद में हंगामा हुआ फोर्स के साथ एसडीएम पहुंचे तो बवाल देख भागे मगर अर्दली हत्थे चढ़ गया। खूब कूटा गया कई दिन भर्ती रहा , सबसे खराब बात थी कि इस भीड़ की अगुआई महिलाएं कर रहीं थी। नारे भी लगा रहीं थी की दीप सराय को कश्मीर बना देंगे। इन खबरों को स्थानीय प्रेस वाले भी छापने से डरते थे मगर दूसरे अखबारों की प्रतिस्पर्धा और नौकरी की वजह से किसी तरह हिम्मत जुटाते थे। इसलिये बहुसंख्यक से डर का सवाल खुद सवालों में है क्योंकि भीड़ हर जगह है और उसकी शक्ल नही होती।
मैं ये नहीं कहता कि गोहत्या के नाम पर किसी की हत्या ठीक है, मगर अल्पसंख्यक कम उन्मादी नहीं है और कोई समुदाय दुसरों की खराब बात को बताकर तरक्की नहीं कर सकता उसे तो खुद काम से कम अपने लोगों के लिए अच्छे सामाजिक कार्य करने चाहिए।
इस्लाम में तो जकात का महत्व खूब बताया गया है और प्रचार भी खूब है, जकात इकठ्ठा भी खूब होता होगा। हिंदुओं के ग्रंथों में भी आमदनी को संभवतः 5 भाग में बांट कर 1 भाग दान के लिये कहा गया है मगर खुद को हिंदू होने का दावा करने वालों को पता होगा ये मुझे नहीं पता। ऐसे में जकात की राशि का शिक्षा स्वास्थ्य आदि सामाजिक कार्यों पर खर्च किया जाय तो हालात में तब्दीली आ सकती है सबसे बड़ी बात सभी पक्ष जिसे अपने धर्म को समझना हो दूसरों से व्याख्या समझने से अच्छा मूल धर्म ग्रंथ की भाषा सीखे और खुद समझें वरना अधजल गगरी छलकत जाय और थोथा चना की तर्ज़ पर नीम हकीम खतरे जान। आपको जाना कहीं है और ये कहीं पहुंचा देंगे और ये अगर कार्य व्यवहार में आया तो दोनों बड़े समुदायों का एक दूसरे को लेकर जो सुबहा है वह भी खत्म हो जाएगा और हैशटैग टॉक टू मुस्लिम की जरूरत नहीं पड़ेगी।
यह वैसा ही है जैसा पिछले दिनों रॉयटर्स फाउंडेशन नामक एक निजी संगठन ने भारत को स्त्रियों के लिए सबसे असुरक्षित देश महज चंद लोगों से बातचीत के आधार पर घोषित किया था। यह कैसा मजाक था कि ऐसे देश खास तौर पर सीरिया जैसे जहां आतंकी महिलाओं को बंधक बनाकर दुष्कर्म करते हैं और उन्हें बेचकर जन्नत का टिकट कटाते हैं उस पर निगाह नहीं डाली गई और भी हमारे पड़ोस में भी तमाम देश हैं जहां के कारनामे दुनिया भर में सुर्खियां बटोरते हैं उनके बारे में भी नहीं सोचा। खैर भारत में भी अपराध काफी हो रहे हैं जो हमारे लिये शर्म का वायस हैं मैं उनका बचाव नहीं कर रहा हूं मगर सर्वाधिक पर आपत्ति तो है।
खैर बात करते हैं हैशटैग वाले विषय पर तो मुझे लगता है आज का जो दौर है जिसमें मुस्लिम धार्मिक कट्टरता, क्रूरता और हिंसा बढ़ती जा रही है, उसमें मुस्लिम समाज को खुद से भी बात करनी चाहिए कि क्या वजह है जिन भी देशों हिंसा हो रही है वो इसी समुदाय के बाशिंदों की ज्यादा आबादी वाला है और प्रशासन भी इन्ही का है सीरिया की बात करें, अफगानिस्तान की बात करें या नाइजीरिया की बात करें या किसी और की। अफगानिस्तान में तो बाकायदा शरई शाषन लागू करने की जंग ही है। पैगम्बर ने किसी की हत्या के लिये तो नहीं कहा है जहां तक मैं जानता हूँ। ऐसे में मुस्लिम समाज इसे रोकने के लिए क्या कर रहा है। कुल मिलाकर बुनियादी गड़बड़ी कुछ तो है जिसे मुस्लिम समाज को ही सोचना होगा।
कुछ लोग कहेंगे हिंसा हिन्दू समुदाय के लोग भी करते हैं मगर भारत में भी नक्सलवाद है और इसकी आतंकवाद से तुलना नहीं कर सकते, इसमें आम जनता इस कदर प्रभावित नहीं होती।इस समुदाय के अमन पसंद लोगों को सोचना चाहिए कि जो भी हिंसा करने वाले हैं ज्यादातर इसी समुदाय से क्यों हैं ओसामा से फजलुल्लाह तक। यहां तक भारत जैसे देश से भी आतंकी निकला तो उसका नाम दाउद, अबू सलेम निकला । इसके अलावा भी भारत के तमाम दबंगों के नाम इस तरह के होंगे, अभी बागपत जेल में एक मुन्ना बजरंगी नाम का बदमाश मारा गया उसके भी मुस्लिम समुदाय के एक व्यक्ति के लिए काम करने की खबरें छप चुकी हैं।
मैं ये नहीं कहता कि दूसरे समुदायों में अपराधी नहीं हैं कट्टर नहीं हैं औऱ उन्हें किसी तरह छूट मिलनी चाहिए मगर सामूहिक हिंसा की ऐसी प्रवृत्ति दूसरे समुदाय से आने वाले व्यक्ति में कम देखने को मिलती है। इन सब में सबसे खतरनाक है इसको सामाजिक स्वीकृति इस पर मुस्लिम समाज में चर्चा सुनाई नहीं देती। br /> अभी कुछ समय पहले बॉलीवुड की एक फ़िल्म आई थी रईस, इसकी पंच लाइन थी बनिये का दिमाग और मियां भाई की डेयरिंग और नायक हिंसक गतिविधियों में शामिल होता है। जब किसी नकारात्मक विषय पर फ़िल्म बनने लगे और उस पर आपत्ति भी न हो तो समझ लेना चाहिए कि उस समाज में नकारात्मक बातों को किस हद तक स्वीकृति मिल चुकी है, इस तरह की डेयर उपलब्धि नहीं मानी जा सकती। मुस्लिम समाज में दीन को लेकर हर कुछ महीने में कॉन्फ्रेंस होते मिल जाएंगे मगर सामाजिक मसलों पर चर्चा आप शायद ही सुने जबकि धर्म समाज के लिये ही है।पिछले साल सम्भल में इस तरह की कुछ पंचायतें अपवाद ही हैं और इस समाज का कोई अगुआ भी नहीं बोलता। इसलिए दूसरे समाज के लोग और नेता भी चुप ही रहते हैं। बल्कि समाज को अच्छे सामाजिक पहल वाले मसलों पर चुप्प रहने नेताओं को अपना हितैषी तो नहीं मानना चाहिए। अपराधी भी बचने में जोखिम उठा लेते हैं तो क्या उन्हें साहसी कहा जाएगा।
खैर आते हैं टॉक टू मुस्लिम वाले विषय पर संभवत: ये दूसरे समुदाय से खौफ को एड्रेस करने की कोशिश हो सकती है तो मैं कहना चाहूंगा आदमी हिंसा से डरता है और हिंसा ज्यादा कहाँ है खुद सोचें। इस मसले पर इसी समाज को सोचना पड़ेगा। रही बात भारत की तो इस विषय पर अभियान छेड़ने की जरूरत बहुसंख्यक समुदाय के साथ ज्यादती है। क्योंकि देश की 20% आबादी को कोई दरकिनार कर सके संभव नहीं है। भारतीय मुस्लिमों से बात न किया जाना यह गॉसिप ही है , अभियान शुरू करने वाली गौहर खान जी खुद भी सोचें, उनके कितने हिन्दू परिचित होंगे। फिर गुमराह किसे कर रही हैं। कोई भी आंख बंद कर एक पल के लिए सोचे तो हर हिन्दू के दो चार मुस्लिम दोस्त जरूर होंगे या परिचय होगा या उनसे राब्ता होगा। संबंध भी ठीक होंगे।
जहां तक मेरे मुस्लिम समाज को खुद से बात करने के लिए कहने की बात है तो उसकी वजह है पिछडापन मगर क्या उसके लिये सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है मगर गहराई में देखेंगे तो काफी हद तक इसके लिये इस समाज की इलीट जिम्मेदार है जो खुद आगे बढ़ने के बाद समाज के वंचितों को फालतू की बातों में उलझाए हुए है। इनकी उन्नति के लिये कुछ किया भी नहीं, न विश्व विद्यालय खोले न अस्पताल। ऐसा भी नहीं कि इस समाज में सब गरीब ही हैं, मदन मोहन मालवीय ने तो चंदे से बीएचयू बनवा दिया। रामपुर में जरुर एक विश्वविद्यालय खोला गया मगर इसमें आसपास के गांवों की जमीन कब्जा ली गई और फायदा तत्कालीन मंत्री को पहुंचा। अंदाजा लगाया जा सकता है कि विश्वविद्यालय का मकसद समाज था या व्यक्ति, खैर इसकी जांच चल रही है।
फिलहाल मुस्लिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा को लेकर दिलचस्पी अभी तक जग नहीं पाई है, जबकि हिन्दू समुदाय में दलितों की हालत कभी बहुत खराब थी। आज उनमें उल्लेखनीय प्रगति दिखाई देती है। आज गरीब दलित अगर रिक्शा चला रहा होगा तो भी अपने बच्चे को पढ़ाने की कोशिश करता मिलेगा। ये हाल तब है जब उनके साथ भेदभाव समाज में था कुछ हद तक कह सकते हैं कि हो रहा होगा। मुस्लिम समुदाय को तो अस्पृश्यता का दंश भी नहीं झेलना पड़ा। वो खुद शासक वर्ग से थे अंग्रेजों से पहले उनके शासन का लंबा इतिहास है। अंग्रेजों के दौर में भी इनमें से एक वर्ग काफी अच्छी स्थिति में था जैसा कि इतिहास से पता चलता है।
भारत में तो हिंदू मुसलमान एकमेक हैं उनकी भाषा और अदब तक तो एक जैसी है। लखनऊ में रहने वाला मुसलमान एक पन्ना अपनी स्थानीय उर्दू में लिखे और देखे की उसमें कितने शब्द अवधी के हैं उसे पता भी शायद न हो ऐसे में ही हिन्दू लिखे तो देखे कितने शब्द वो हिंदी के समझता है वो उर्दू फ़ारसी आदि के हैं। फिर टॉक टू मुस्लिम का सवाल ही सवालों में रहेगा। भारत के सभी समाजों की उन्नति की वजह सिर्फ सरकार नहीं है चाहे शिक्षा हो या अन्य मामला उस समाज के लोगों ने भी प्रयास किया है। ऐसे में मुस्लिम समाज को अपने अगुओ से सवाल करना चाहिए। एक समय हिंदुओं में सती प्रथा, विधवा समस्या जातिपाँति, छुआछूत की बीमारी थी। इसके खिलाफ समाज से आवाज उठी, स्वतंत्र भारत में कानून बने लेकिन ऊपरी विरोध भी हुआ होगा, मगर बहुसंख्यक का समर्थन मिला। इसका काफी असर भी हुआ है। इधर मुस्लिम समाज क्या तैयार होगा इसके लिए, लगता नहीं। राजीव गांधी के कार्यकाल में तलाक़शुदा महिला नूर बानो को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मुस्लिम समाज के दबाव में सरकार ने पलट दिया। ऐसे में लगता है कि समाज खिड़कियां खोलने को तैयार है, यह फैसला मुस्लिम महिलाओं को शसक्त करता नतीजा मुस्लिम समाज ही शसक्त होता। जब सरकार तक जिस समाज सर डरती हो उस समाज की ओर से टॉक टू मुस्लिम हैशटेग से अभियान चलाना ज्यादती नहीं तो क्या है। मदरसों के आधुनिकीकरण की बात निकलते ही शक सुबहा सामने आ जाता है मसलन किसी भी नई बात का विरोध तभी तो राजनीतिक दलों को इस समाज को वोट बैंक समझने का मौका मिलता है कोई खुद को मुल्ला मुलायम कहलवाता है, कोई मैं मुसलमानों का हूँ मैं कांग्रेस हूं कहता है मगर इन सब का नतीजा क्या है। ऐसे में समाज को सबसे पहले खुद से सवाल करना होगा ऐसा क्यों है।
आज हिंदू विवाह अधिनियम पारित हुआ, और ज्यादतर हिंदू की मजाल नहीं होती विवाहिता से पंगा ले और किसी ने लिया तो भुगतता है। मगर आज तक भारत में निकाह, हलाल को लेकर कानून नहीं बन सका क्योंकि इसे तुरंत धर्म से जोड़ दिया जाता है, खूद सोचें कि ये धर्म का विषय है या समाज का और इस पर समाज से कोई आवाज नहीं उठती तो ऐसे बंद समाज से तो दूसरे लोग डरेंगे । मुझे लगता है यहां यही स्थिति है। मैं बीते साल मुरादाबाद में था। वहाँ अमरोहा के मंडी धनौरा तहसील के एक मौलवी के घर एक मुस्लिम परिवार रहता ।दंपति में मामूली बात पर विवाद हुआ और पति ने 3 तलाक कह दिया। जल्द ही पति को होश आ गया मगर मौलवी ने यह बात सुन ली थी। पति कहता रहा कि मैंने गुस्से में कहा मगर मौलवी साहब ने पंचायत बुला ली, वो तो खुद हलाला के लिये तैयार थे। अब बताइये ऐसी स्थिति पर सामाजिक चूप्पी क्या इशारे कर रहा है इसके खिलाफ कोई चर्चा कभी हुई, नहीं। यह खबर अखबार में प्रकाशित हुई है, अब कोई अख़बार पर सवाल न उठा दें क्योंकि संबंधित अखबार की पॉलिसी इस मामले में बेदाग है।
एक और किस्सा सुनाता हूँ मुरादाबाद मंडल का जिला है संभल। इसमें एक मोहल्ला है दीपा सराय व्यापारिक केंद्र है और मुस्लिम समुदाय के लोग बहुतायत में हैं। एक अपराधी को पकड़ना था, पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी वहां जाने के लिए। बहुत दबाव पड़ने पर कई थानों की फोर्स गई तो घर की महिलाओं ने धर्मग्रंथ की बेहुरमती का आरोप लगाकर पोलिस पार्टी को पीटा और उनको जान बचाकर भागना पड़ा। बाद में हंगामा हुआ फोर्स के साथ एसडीएम पहुंचे तो बवाल देख भागे मगर अर्दली हत्थे चढ़ गया। खूब कूटा गया कई दिन भर्ती रहा , सबसे खराब बात थी कि इस भीड़ की अगुआई महिलाएं कर रहीं थी। नारे भी लगा रहीं थी की दीप सराय को कश्मीर बना देंगे। इन खबरों को स्थानीय प्रेस वाले भी छापने से डरते थे मगर दूसरे अखबारों की प्रतिस्पर्धा और नौकरी की वजह से किसी तरह हिम्मत जुटाते थे। इसलिये बहुसंख्यक से डर का सवाल खुद सवालों में है क्योंकि भीड़ हर जगह है और उसकी शक्ल नही होती।
मैं ये नहीं कहता कि गोहत्या के नाम पर किसी की हत्या ठीक है, मगर अल्पसंख्यक कम उन्मादी नहीं है और कोई समुदाय दुसरों की खराब बात को बताकर तरक्की नहीं कर सकता उसे तो खुद काम से कम अपने लोगों के लिए अच्छे सामाजिक कार्य करने चाहिए।
इस्लाम में तो जकात का महत्व खूब बताया गया है और प्रचार भी खूब है, जकात इकठ्ठा भी खूब होता होगा। हिंदुओं के ग्रंथों में भी आमदनी को संभवतः 5 भाग में बांट कर 1 भाग दान के लिये कहा गया है मगर खुद को हिंदू होने का दावा करने वालों को पता होगा ये मुझे नहीं पता। ऐसे में जकात की राशि का शिक्षा स्वास्थ्य आदि सामाजिक कार्यों पर खर्च किया जाय तो हालात में तब्दीली आ सकती है सबसे बड़ी बात सभी पक्ष जिसे अपने धर्म को समझना हो दूसरों से व्याख्या समझने से अच्छा मूल धर्म ग्रंथ की भाषा सीखे और खुद समझें वरना अधजल गगरी छलकत जाय और थोथा चना की तर्ज़ पर नीम हकीम खतरे जान। आपको जाना कहीं है और ये कहीं पहुंचा देंगे और ये अगर कार्य व्यवहार में आया तो दोनों बड़े समुदायों का एक दूसरे को लेकर जो सुबहा है वह भी खत्म हो जाएगा और हैशटैग टॉक टू मुस्लिम की जरूरत नहीं पड़ेगी।
सोमवार, 16 जुलाई 2018
कुछ सवाल न्याय के आंगन से भी
भारतीय न्यायपालिका का गौरवशाली इतिहास रहा है, इसकी निष्पक्षता और निर्णय दुनिया की दूसरी अदालतों के लिए नज़ीर रही हैं। इसलिये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहां करोड़ों तरह के स्वार्थ और आकांक्षाओं के बीच किसी संस्थान पर सवाल खड़ा कर दिया जाना आम है, न्यायपालिका विश्वशनीयता की कसौटी पर हमेशा खरी उतरी है, नतीजा जनविश्वास उसके साथ है। यही कारण है कि जब भी न्यायपालिका का दूसरी संस्थाओं से टकराव हुआ, संप्रभु जनता न्यायपालिका के साथ खड़ी दिखाई दी और उसे ताकत दी है। न्यायपालिका ने भी अपने संविधान के संरक्षक की भूमिका निभाई है।
मगर, बीते कुछ सालों में न्यायपालिका से जुड़े कुछ ऐसे प्रकरण सामने आए जो इसके स्वर्णिम इतिहास को धूमिल कर रहे हैं। इस पर न्याय के पहरुओं को विचार करना चाहिए। इसमें पूर्व जस्टिस करनन विवाद ने हमारी काफी जग हसाई कराई। ऐसे मामले पर विचार की आज अनिवार्यता है साथ ही उनके आरोपों की जांच भी जरूरी है। खैर इस प्रकरण का पटाक्षेप अवमानना मामले में उनकी गिरफ्तारी से हुआ। लोगों ने सोचा होगा चलो राहत मिली लेकिन फिर कई जस्टिस की ओर से मीडिया में प्रेस कांफ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश पर कुछ विशेष मामले विशेष पीठ को भेजने के आरोप लगाए गए। इसने पूरी न्यायपालिका को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया, जिससे सवाल खड़े करने वाले भी नहीं बच सके। वजह तो इस मामले में राजनीतिक दलों का कूदना था मगर ये जमीन इनको माननीय जस्टिस लोगों ने ही उपलब्ध कराई थी। जनता को जो संदेश मिला साफ था राजनीति न्यायपालिका में प्रवेश कर गई है। क्योंकि जैसा दिखाया जा रहा था कि ये सवाल सिर्फ मुख्यन्यायधीश पर है प्रकान्तर से उन्हें भी आरोपी बना दिया गया जिन जज को तथाकथित विशेष मामले भेजे गए और आरोप लगाने वालों के क्रांति के संदेश को बहुसंख्यक ने शायद ही स्वीकार किया हो।अच्छा होता यह मामला मीडिया में लाने की बजाय आपस में बने मैकेनिज्म से सुल्टा लिया जाता। इन विवादों से कुछ और हुआ हो या न जनता के विश्वास को ठेस जरूर पहुंची है। यही कारण है इस विवाद पर संभ्रांत वर्ग भले ही चर्चा करे जनता में हलचल नहीं हुई।
एक ऐसा ही मसाला और मुंह बाए खड़ा है जो आदर्श स्थिति से कोसो दूर जा रहा है। वह है उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति का, कोलेजियम बार बार इनके नाम पर ही अटकी है और केंद्र सरकार अपने कारण गिनाकर उनके नाम पर राजी नहीं है। इससे दूसरे रिक्त पदों पर भी प्रक्रिया अटकी पड़ी है, इस रसाकसी में पीड़ित कौन हो रहा है। क्या कोलेजियम या सरकार, नहीं आम लोग, जो न्याय की आस में उम्र गुजार रहे हैं और जज की कमी से उनके मुकदमो पर फैसला नहीं आ रहा है। न्याय में देरी न्याय नहीं के बराबर खुद कोर्ट ने कई बार दोहराया है फिर इसके जिम्मेदार कौन हैं सभी पक्ष खुद ही बैठकर तय कर लें। क्या इसके लिये जिद जिम्मेदार नहीं है। कोलेजियम किस वजह से सिर्फ उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश को लेकर अड़ा है यह शायद कोलेजियम ही जनता है मगर सरकार ने तो उनके प्रोन्नति पर राजी न होने के तर्क जूनियर होने, क्षेत्रीयता आदि के सार्वजनिक कर दिए हैं। ऐसे में सरकार का पलड़ा तो भारी नज़र आता है, फिर सरकार जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है उसे दरकिनार करना हिंदुस्तान जैसे मुल्क में तो ठीक नहीं। जिद में तमाम दूसरे प्रतिभाशाली जज को अनजाने में ही कमतर आंका जा रहा है।ऐसे में सबसे अच्छा है कि सभी संबंधित पक्ष अपनी गौरवशाली विरासत में कुछ जोड़ें पूर्वजों के लिए अफ़सोस का वायस न बनें, कम से कम जो शपथ लिए हैं उसकी लाज रखें।
मगर, बीते कुछ सालों में न्यायपालिका से जुड़े कुछ ऐसे प्रकरण सामने आए जो इसके स्वर्णिम इतिहास को धूमिल कर रहे हैं। इस पर न्याय के पहरुओं को विचार करना चाहिए। इसमें पूर्व जस्टिस करनन विवाद ने हमारी काफी जग हसाई कराई। ऐसे मामले पर विचार की आज अनिवार्यता है साथ ही उनके आरोपों की जांच भी जरूरी है। खैर इस प्रकरण का पटाक्षेप अवमानना मामले में उनकी गिरफ्तारी से हुआ। लोगों ने सोचा होगा चलो राहत मिली लेकिन फिर कई जस्टिस की ओर से मीडिया में प्रेस कांफ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश पर कुछ विशेष मामले विशेष पीठ को भेजने के आरोप लगाए गए। इसने पूरी न्यायपालिका को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया, जिससे सवाल खड़े करने वाले भी नहीं बच सके। वजह तो इस मामले में राजनीतिक दलों का कूदना था मगर ये जमीन इनको माननीय जस्टिस लोगों ने ही उपलब्ध कराई थी। जनता को जो संदेश मिला साफ था राजनीति न्यायपालिका में प्रवेश कर गई है। क्योंकि जैसा दिखाया जा रहा था कि ये सवाल सिर्फ मुख्यन्यायधीश पर है प्रकान्तर से उन्हें भी आरोपी बना दिया गया जिन जज को तथाकथित विशेष मामले भेजे गए और आरोप लगाने वालों के क्रांति के संदेश को बहुसंख्यक ने शायद ही स्वीकार किया हो।अच्छा होता यह मामला मीडिया में लाने की बजाय आपस में बने मैकेनिज्म से सुल्टा लिया जाता। इन विवादों से कुछ और हुआ हो या न जनता के विश्वास को ठेस जरूर पहुंची है। यही कारण है इस विवाद पर संभ्रांत वर्ग भले ही चर्चा करे जनता में हलचल नहीं हुई।
एक ऐसा ही मसाला और मुंह बाए खड़ा है जो आदर्श स्थिति से कोसो दूर जा रहा है। वह है उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति का, कोलेजियम बार बार इनके नाम पर ही अटकी है और केंद्र सरकार अपने कारण गिनाकर उनके नाम पर राजी नहीं है। इससे दूसरे रिक्त पदों पर भी प्रक्रिया अटकी पड़ी है, इस रसाकसी में पीड़ित कौन हो रहा है। क्या कोलेजियम या सरकार, नहीं आम लोग, जो न्याय की आस में उम्र गुजार रहे हैं और जज की कमी से उनके मुकदमो पर फैसला नहीं आ रहा है। न्याय में देरी न्याय नहीं के बराबर खुद कोर्ट ने कई बार दोहराया है फिर इसके जिम्मेदार कौन हैं सभी पक्ष खुद ही बैठकर तय कर लें। क्या इसके लिये जिद जिम्मेदार नहीं है। कोलेजियम किस वजह से सिर्फ उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश को लेकर अड़ा है यह शायद कोलेजियम ही जनता है मगर सरकार ने तो उनके प्रोन्नति पर राजी न होने के तर्क जूनियर होने, क्षेत्रीयता आदि के सार्वजनिक कर दिए हैं। ऐसे में सरकार का पलड़ा तो भारी नज़र आता है, फिर सरकार जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है उसे दरकिनार करना हिंदुस्तान जैसे मुल्क में तो ठीक नहीं। जिद में तमाम दूसरे प्रतिभाशाली जज को अनजाने में ही कमतर आंका जा रहा है।ऐसे में सबसे अच्छा है कि सभी संबंधित पक्ष अपनी गौरवशाली विरासत में कुछ जोड़ें पूर्वजों के लिए अफ़सोस का वायस न बनें, कम से कम जो शपथ लिए हैं उसकी लाज रखें।
बुधवार, 13 जून 2018
भारतीय सेवा के कुछ पदों का विशेषज्ञों के लिए खोलना
भारतीय सूचना सेवा के अफसरों ने देश के लिये काफी काम किये हैं खास कर योजनाओं के क्रियान्वयन में। मगर इस सेवा के लोगों में शिथिलता आती जा रही है, खासकर नवाचार के संबंध में, कोई नया विचार अफसरों की ओर से आता नज़र नहीं आ रहा है जिससे बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सके। ज्यादातर घिसी पिटी परियोजनाएं ही सामने आ रही हैं जो थोड़े बहुत बदलाव से अरसे से चल रही हैं अब देश की जरूरत नवाचार और नवोन्मेष मांग रही है, खासतौर से विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में।
ऐसा लगता है कि तमाम योजनाओं में नवाचार की कमी की वजह अफसरों की सीमाएं हैं, अभी आईएएस बनने वाले अफसरों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है और अब तमाम योजनाओं में तकनीक का इस्तेमाल होता है ऐसे में इसके लिए एक अलग चैनल तैयार करना पड़ा है जो अपने ईगो तालमेल की कमी आदि के कारण या तो नवाचार को सामने नहीं आने देता या फाइल में लटका देता है। इसके साथ निजी क्षेत्र में तम प्रतिभाएं ऐसी हैं जिनके पास नए विचार हैं, इनको सरकार को साथ जोड़ने की जरूरत है ताकि देश को उनका लाभ मिले।
इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अच्छी पहल की है। सरकार ने केंद्रीय सेवा के संयुक्त सचिव स्तर के तकरीबन 10 पदों पर सीधी भर्ती की योजना बनाई है, इससे इस सेवा में खुलापन आएगा, विशेषज्ञ नियुक्त किये जा सकेंगे। भर्ती चूँकि संविदा पर होगी इसलिए नौकरी बचाने के लिए इन्हें आउटपुट भी देना होगा।हमारे यहां कार्य संस्कृति ऐसी बन गयी है कि नियमित स्टाफ कार्य करने की कोशिश भी नहीं करना चाहता नहीं तो लोगों दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ते। उदाहरण सामने है देश में सरकारी विभागों कंपनियों का हाल देख लीजिए वो ज्यादातर नुकसान में ही होंगी वही कर्मचारी निजी कंपनी के कर्मचारी के रूप में कार्य करने लगते हैं तो आउटपुट देने लगते हैं। ऐसा लगता है कि सोच बन गई है कि अधिकार चाहिए बेशुमार काम के लिये न ठहराओ जिम्मेदार।
बहरहाल कुछ विघ्नसंतोषी लोगों को इस पर भी सुबहा है। ये इसको भी आरक्षण से जोड़कर देख रहे हैं मगर प्रशासनिक सेवा पर सवाल तो है। कुछ लोग समझ रहे हैं कि इससे दिक्कत आएगी, मगर मेरा कहना है कि इन विशेषज्ञों के बॉस तो नियमित आईएएस ही रहेंगे हालांकि चैनल काफी ऊपर का होने से सरकार की निगरानी रहेगी और इनकी फाइल आईएएस बेवजह लटका नहीं पाएंगे। इसलिए मुझे तो यह कदम ठीक लगता है। अब भला डीआरडीओ और मेडिकल में कामकाज की जीम्मेदारी इस फील्ड से इतर के व्यक्ति को दे देंगे तो उसका क्या हाल होगा। इस हिसाब से सरकार के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए।
रही बात इससे आईएएस के नाराज होने की तो हो सकता है कि ये विचार भी किसी आईएएस का ही हो और यह भी की इसी नाराजगी और कुछ मामलों में अप्रभावी होने की ही वजह से तो सीधी भर्ती की जरूरत पड़ रही है।
गुरुवार, 31 मई 2018
भारतीय राजनीति में बेवजह के विवाद
लग रहा है विवाद करना भारतीय राजनताओं का शगल बन गया है। ताजा विवाद पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर कार्यालय में होने वाले कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संबोधित करने का न्योता स्वीकार करने का है। इसको लेकर कांग्रेस के सांसद संदीप दीक्षित ने सवाल उठाए हैं और आलोचना की है। उनका कहना है कि ये उनकी पार्टी की विचारधारा के करीब नहीं है इसलिये पूर्व राष्ट्रपति को वहां नहीं जाना चाहिए। क्या ये देश के उन राष्ट्रपति महोदय की सोच का विस्तार नहीं है जिन्होंने खुद को प्रधानमंत्री का सफाई कामगार तक बता दिया था। कांग्रेस ने स्पष्ट तो कुछ नहीं कहा मगर दीक्षित के बयान को खारिज भी नहीं किया।
ये एक तरह से पूर्व राष्ट्रपति के अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने की कोशिश भी है। यह हाल तब है जब देश में जब तब अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोया जाने लगता है और हस्ताक्षर अभियान चलाए जाने लगते हैं और हस्ताक्षर करने वालों में ये कुछ लोग कॉमन होते हैं।
ये हाल तब है जब हम पाकिस्तान से बात करने के लिये तैयार रहते हैं जबकि वो हमें कितने जख्म देता है। पिछले दिनों पूर्व कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर के घर पाकिस्तान के शायद पूर्व अफसर के साथ गुफ़्तगू ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। अभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व चीफ दुर्रानी और रा के पूर्व चीफ दुलत की किताब के विमोचन में कांग्रेस नेता पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक शामिल हुए थे। जो चीज हम अपने लिए चाहते हैं वो दूसरों को क्यों नहीं मिलना चाहिए। अलगाववादियों से भी बात करने के लिये होते हैं फिर आरएसएस से जुड़े लोगों से बात न करना एक तरह की असहिष्णुता ही है।
एक बात और कि अगर आरएसएस के किसी भी विचार से आपको इख़्तिलाफ़ है तो उससे बात कर ही प्रभावित कर सकते हैं। फिर जब देश के करोड़ों लोग जिस संगठन से प्रभावित हों या जुड़ें हों उससे
मंगलवार, 29 मई 2018
चुनाव में हार का डर औऱ ईवीएम पर हायतौबा
देश में हर चुनाव में सबसे ज्यादा निशाना ईवीएम आजकल बनाई जा रही है। आमतौर पर चुनाव के बाद अपनी हार की वजह छिपाने के लिए हमारे यहां उसको बलि का बकरा बनाया जाता है। और कई बार पहले से ही इस बात की गुंजाइश रखी जाती है कि जनता द्वारा दरकिनार किये जाने पर ईवीएम को दोषी क़रार दिया जाय।हालाँकि कोई राजनीतिक दल या इस मेधावी देश का एक भी मेधावी इस पर अपने खयाली पुलाव को सिद्ध नहीं कर सका है।।जबकि पिछले चुनाव में ऐसी ही आवाज उठने पर चुनाव आयोग ने गड़बड़ी सिद्ध करने की चुनौती भी दी तंगी।
28 मई 2018 को देश भर में हुए उपचुनावों में खासकर कैराना उप चुनाव जहाँ विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की इज़्ज़त दांव पर लगी है। इस चुनाव में मतदान से पहले ईवीएम में जुड़ने वाली एक और मशीन जिसे वीवीपैट कहा जाता है जो मतदाता को इलेक्ट्रॉनिक रशीद देती है कि मतदाता ने किसे वोट दिया में कुछ खराबी पाई गईं।संभवतः मशीन चली नहीं इससे मतदान में कुछ देरी हुई मगर राजनीतिक दल ऐसे प्रचारित कर रहे हैं जैसे ईवीएम खराब थी।जबकि वीवीपैट को कुछ देर में बदल दिया गया होगा।
वहीं राजनीतिक दलों खासकर विपक्ष को बैलेट पेपर पर बहुत भरोसा जग रहा है और विपक्ष ऐसा प्रचारित करता है कि जनता को ईवीएम पर भरोसा नहीं है। हालांकि बैलेट पेपर से मतदान लोकतंत्र के लिए ज्यादा अहितकर है। खासतौर से जब हम सुधार का एकचरण पर कर चुके हैं तो दरकिनार कर दिए गए लोगों की चालबाजियों के चक्कर में हमें अपनी चुनाव प्रारणी में अतार्किक छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।
हालांकि जनता को ईवीएम की खासियत जरूर बतानी चाहिए ताकि वो किसी चालबाजी में न फंसे। फिलहाल बैलेट पेपर से चुनाव में कुछ दिक्कतें हैं। पहला की इससे मतदान में बड़ी संख्या में वोट अमान्य हो जाते हैं क्योंकि अशिक्षित लोग सही से मोहर नहीं लगा पाते।स्याही इधर से उधर लगने या फैल जाने पर ये दिक्कत आएगी।
वहीं इससे वोट में कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ेगी क्योंकि कई बार अष्पष्ट स्याही लगने पर मतगणना कर्मी तय करेगा कि वोट सही है या नहीं अपने विवेक से और देश में डंडे के जोर से ही निष्पक्षता आती है जैसा चुनाव आयोग की कार्यवाही का डर।साथ ही हमारे यहां अशिक्षित लोगों का प्रतिशत काफी है।
वहीं बैलेट पेपर से मतदान और मतगणना में समय ज्यादा लगेगा और ज्यादा समय मतगणना में ज्यादा गड़बड़ी के मौके देगा।फिर बैलेट पेपर के दौर में तमाम बूथों पर बूथ कैप्चरिंग , चुनाव को प्रभावित करने के लिए बैलेट बॉक्स में पानी डालकर दोबारा चुनाव कराने के हथकंडे अपनाने के ये आरोप ईवीएम पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों के तमाम स्थानीय नेताओं पर लगते रहे हैं। और आपमेंसे कई इसके गवाह होंगे या इसके किस्से सुने होंगे।ऐसे में दरअसल ईवीएम पर सवाल इनकी नीयत पर सवाल है।
मगर चिंताजनक है कि कैराना चुनाव में सत्तारूढ़ दल के लोगों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं हालांकि उनकी ओर से कर्मचारियों पर सवाल उठाए गए हैं मगर खबरों में इस तरह से प्रकाशित किया गया है जैसे उन्होंने भी ईवीएम पर सवाल उठाए हैं जबकि विपक्षी दल भी वीवीपैट की बात कर रहे हैं जो एक अलग मशीनहै।
इसके अलावा मतदान से पहले हर बूथ पर सभी प्रत्याशी के एजेंट की मौजूदगी में मॉक पोलिंग होती है और एजेंट के ओके करने पर मतदान शुरू होता है। ऐसे में गड़बड़ी होने पर पता चल जाएगा। इसलिये स्वार्थ की ख़ातिर संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल ठीक नहीं।
28 मई 2018 को देश भर में हुए उपचुनावों में खासकर कैराना उप चुनाव जहाँ विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की इज़्ज़त दांव पर लगी है। इस चुनाव में मतदान से पहले ईवीएम में जुड़ने वाली एक और मशीन जिसे वीवीपैट कहा जाता है जो मतदाता को इलेक्ट्रॉनिक रशीद देती है कि मतदाता ने किसे वोट दिया में कुछ खराबी पाई गईं।संभवतः मशीन चली नहीं इससे मतदान में कुछ देरी हुई मगर राजनीतिक दल ऐसे प्रचारित कर रहे हैं जैसे ईवीएम खराब थी।जबकि वीवीपैट को कुछ देर में बदल दिया गया होगा।
वहीं राजनीतिक दलों खासकर विपक्ष को बैलेट पेपर पर बहुत भरोसा जग रहा है और विपक्ष ऐसा प्रचारित करता है कि जनता को ईवीएम पर भरोसा नहीं है। हालांकि बैलेट पेपर से मतदान लोकतंत्र के लिए ज्यादा अहितकर है। खासतौर से जब हम सुधार का एकचरण पर कर चुके हैं तो दरकिनार कर दिए गए लोगों की चालबाजियों के चक्कर में हमें अपनी चुनाव प्रारणी में अतार्किक छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।
हालांकि जनता को ईवीएम की खासियत जरूर बतानी चाहिए ताकि वो किसी चालबाजी में न फंसे। फिलहाल बैलेट पेपर से चुनाव में कुछ दिक्कतें हैं। पहला की इससे मतदान में बड़ी संख्या में वोट अमान्य हो जाते हैं क्योंकि अशिक्षित लोग सही से मोहर नहीं लगा पाते।स्याही इधर से उधर लगने या फैल जाने पर ये दिक्कत आएगी।
वहीं इससे वोट में कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ेगी क्योंकि कई बार अष्पष्ट स्याही लगने पर मतगणना कर्मी तय करेगा कि वोट सही है या नहीं अपने विवेक से और देश में डंडे के जोर से ही निष्पक्षता आती है जैसा चुनाव आयोग की कार्यवाही का डर।साथ ही हमारे यहां अशिक्षित लोगों का प्रतिशत काफी है।
वहीं बैलेट पेपर से मतदान और मतगणना में समय ज्यादा लगेगा और ज्यादा समय मतगणना में ज्यादा गड़बड़ी के मौके देगा।फिर बैलेट पेपर के दौर में तमाम बूथों पर बूथ कैप्चरिंग , चुनाव को प्रभावित करने के लिए बैलेट बॉक्स में पानी डालकर दोबारा चुनाव कराने के हथकंडे अपनाने के ये आरोप ईवीएम पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों के तमाम स्थानीय नेताओं पर लगते रहे हैं। और आपमेंसे कई इसके गवाह होंगे या इसके किस्से सुने होंगे।ऐसे में दरअसल ईवीएम पर सवाल इनकी नीयत पर सवाल है।
मगर चिंताजनक है कि कैराना चुनाव में सत्तारूढ़ दल के लोगों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं हालांकि उनकी ओर से कर्मचारियों पर सवाल उठाए गए हैं मगर खबरों में इस तरह से प्रकाशित किया गया है जैसे उन्होंने भी ईवीएम पर सवाल उठाए हैं जबकि विपक्षी दल भी वीवीपैट की बात कर रहे हैं जो एक अलग मशीनहै।
इसके अलावा मतदान से पहले हर बूथ पर सभी प्रत्याशी के एजेंट की मौजूदगी में मॉक पोलिंग होती है और एजेंट के ओके करने पर मतदान शुरू होता है। ऐसे में गड़बड़ी होने पर पता चल जाएगा। इसलिये स्वार्थ की ख़ातिर संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल ठीक नहीं।
रविवार, 27 मई 2018
कहाँ जा रहे हैं हम एक समाज के रूप में
भारत देश विकास के आधुनिक मानकों पर तेजी से बढ़ रहा है, मगर भागदौड़ के बीच हम कुछ खोते भी जा रहे हैं और वो है मूल्य। भारतीय संस्कृति की जो ताकत है वही हम खो रहे हैं। मैं ये सब फिलहाल बहुत ही मामूली परिप्रेक्ष्य में बात करूंगा।
आज से कुछ अरसे पहले हमारे यहां समाज का बड़ा असर था लोग दूसरों के सुख दुख से प्रभावित होते थे और अपने स्तर पर अच्छा और मदद की कोशिश करते थे नतीजतन तमाम धर्मशाला स्कूल आज भी दिखाई देंगे जो लाभ के मद्देनजर नहीं बनाए गए मगर आज ये स्थिति नहीं है।
आज स्वार्थपरता चरम पर है और सब अपने और लाभ के लिये हो रहा है। ज्यादातर लालची ढोंगी और पाखंडी हैं और यह धर्म जाति की सीमा को तोड़कर एक तरह से है। लोगों के पास इतने मुखौटे हैं कि किसी व्यक्ति का असली स्वरूप क्या है कहना मुशकिल है। हाल यह है कि कानून तोड़ना लोगों को रोमांच दिलाता है, हालांकि खुद पीड़ित होने पर यही लोग, कानून न्याय समाज की दुहाई भी देते हैं।
50 साठ साल पहले देश में इतने धनाढ्य लोग कम रहे होंगे मगर सामाजिक कार्य ज्यादा दिखाई देंगे अब करोड़पतियों की लंबी सूची है और हर कंपनी के लिए लाभ का एक हिस्सा सोसल रिस्पांसिबिलिटी के लिए खर्च का नियम है मगर कोई खर्च करता दिखाई नहीं देता और उल्टा गरीबों के हिस्से का धन लोन के रूप में चुराकर भागने का चलन बढ़ गया है।
फ़िलहाल मैं इसको जिस बात से जोड़ना चाहता हूं। वो यह है देश में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में गरीब तबके के लिए संभवतः 25 %सीट आरक्षित हैं मगर एक भी स्कूल गरीबों को दाखिला देने को तैयार नहीं दिखते। सख्ती पर गुरुग्राम जिले में इडब्लयूएस में किसी तरह दाखिला दिया मगर अभी भी सैकड़ो बच्चों को टरकाया जा रहा है। किसी को स्कूल के स्तर से कमतर बताया जा रहा है तो किसी पर और कुछ आपत्ति लगाई जा रही है।इधर शनिवार को cbse 12th के परीक्षा परिणाम जारी किए गए तो पुष्पा नाम की छात्रा ने 77% अंक पाये उसको ईडब्ल्यू एस में ही दाखिला मिला था और उसने कालेज का नाम रोशन किया। इससे स्तर की आपत्ति तो सवाल के घेरे में है।ऐसी और भी कहानियां होंगी।
एक और बात मैं एक वीडियो देख रहा था।इसमें सरकारी स्कूल की बच्चियां गीत के माध्यम से गर्भ में बालिका हत्या की समस्या को उठाती हैं और समाज को सोचने को मजबूर करती हैं। इससे पता चलता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं है जरूरत है उसे तराशने की और अपनी जिम्मेदारी निभाने की और इंसान बनने की।
आज से कुछ अरसे पहले हमारे यहां समाज का बड़ा असर था लोग दूसरों के सुख दुख से प्रभावित होते थे और अपने स्तर पर अच्छा और मदद की कोशिश करते थे नतीजतन तमाम धर्मशाला स्कूल आज भी दिखाई देंगे जो लाभ के मद्देनजर नहीं बनाए गए मगर आज ये स्थिति नहीं है।
आज स्वार्थपरता चरम पर है और सब अपने और लाभ के लिये हो रहा है। ज्यादातर लालची ढोंगी और पाखंडी हैं और यह धर्म जाति की सीमा को तोड़कर एक तरह से है। लोगों के पास इतने मुखौटे हैं कि किसी व्यक्ति का असली स्वरूप क्या है कहना मुशकिल है। हाल यह है कि कानून तोड़ना लोगों को रोमांच दिलाता है, हालांकि खुद पीड़ित होने पर यही लोग, कानून न्याय समाज की दुहाई भी देते हैं।
50 साठ साल पहले देश में इतने धनाढ्य लोग कम रहे होंगे मगर सामाजिक कार्य ज्यादा दिखाई देंगे अब करोड़पतियों की लंबी सूची है और हर कंपनी के लिए लाभ का एक हिस्सा सोसल रिस्पांसिबिलिटी के लिए खर्च का नियम है मगर कोई खर्च करता दिखाई नहीं देता और उल्टा गरीबों के हिस्से का धन लोन के रूप में चुराकर भागने का चलन बढ़ गया है।
फ़िलहाल मैं इसको जिस बात से जोड़ना चाहता हूं। वो यह है देश में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में गरीब तबके के लिए संभवतः 25 %सीट आरक्षित हैं मगर एक भी स्कूल गरीबों को दाखिला देने को तैयार नहीं दिखते। सख्ती पर गुरुग्राम जिले में इडब्लयूएस में किसी तरह दाखिला दिया मगर अभी भी सैकड़ो बच्चों को टरकाया जा रहा है। किसी को स्कूल के स्तर से कमतर बताया जा रहा है तो किसी पर और कुछ आपत्ति लगाई जा रही है।इधर शनिवार को cbse 12th के परीक्षा परिणाम जारी किए गए तो पुष्पा नाम की छात्रा ने 77% अंक पाये उसको ईडब्ल्यू एस में ही दाखिला मिला था और उसने कालेज का नाम रोशन किया। इससे स्तर की आपत्ति तो सवाल के घेरे में है।ऐसी और भी कहानियां होंगी।
एक और बात मैं एक वीडियो देख रहा था।इसमें सरकारी स्कूल की बच्चियां गीत के माध्यम से गर्भ में बालिका हत्या की समस्या को उठाती हैं और समाज को सोचने को मजबूर करती हैं। इससे पता चलता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं है जरूरत है उसे तराशने की और अपनी जिम्मेदारी निभाने की और इंसान बनने की।
शनिवार, 19 मई 2018
कर्नाटक का नाटक
कर्नाटक का सियासी ड्रामा अपने आखिरी दौर में है। इससे पहले चुनाव प्रचार और उसके पहले जो हुआ शर्मनाक था तो अब जो हो रहा है वह भी खतरनाक है। लोकतंत्र के चोर दरवाजों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि समय का फेर तो देखिए कुछ लोगों को उम्मीद नहीं रही होगी कि ऐसा भी समय आ सकता है कि उनके बनाये गलियारे का कोई और इस्तेमाल करेगा और उन्हें न्याय का राग अलापना पड़ेगा। फ़िलहाल आम लोग एक बार फिर सत्ता के लिये हर तरह की अनीति देखने के लिए विवश है।
फ़िलहाल चलते हैं 2018 के परिणाम पर आम जनता बीजेपी को 104, कांग्रेस को 78, निर्दलीयों को 2, जनता दल एस गठबंधन को 38 सीट दीं। मतलब जता दिया किसी से ज्यादा खुश नहीं है, मगर जैसे हर कर्म का फल भुगतना पड़ता है वैसे जनता के इस निर्णय का फल तो उसे भुगतना था मगर इतनी जल्दी होगा पता नहीं था। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियां इस क़दर उजागर होगा पता नहीं था। पहले जिसके खिलाफ जनादेश मांगा अब गठबंधन, फिर राज्यपाल के फैसले औऱ इतिहास का दोहराया जाना सब पर सवाल है।
फ़िलहाल चलते हैं 2018 के परिणाम पर आम जनता बीजेपी को 104, कांग्रेस को 78, निर्दलीयों को 2, जनता दल एस गठबंधन को 38 सीट दीं। मतलब जता दिया किसी से ज्यादा खुश नहीं है, मगर जैसे हर कर्म का फल भुगतना पड़ता है वैसे जनता के इस निर्णय का फल तो उसे भुगतना था मगर इतनी जल्दी होगा पता नहीं था। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियां इस क़दर उजागर होगा पता नहीं था। पहले जिसके खिलाफ जनादेश मांगा अब गठबंधन, फिर राज्यपाल के फैसले औऱ इतिहास का दोहराया जाना सब पर सवाल है।
मंगलवार, 24 अप्रैल 2018
दलित साधु को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा
आज की सुबह अखबार की एक खबर ने बरबस ही मेरी यादों की सुइयों को कुछ पीछे अतीत में पहुंचा दिया।ख़बर कहो या खिड़कियां खोले जाने का उपक्रम, जिसे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत: जिसका अर्थ सम्भवतः है कि विचारों की खिड़कियां हमेशा खोलकर रखें ताकि दुनिया के हर कोने से सदविचार आ सकें।
दरअसल, एक घोषणा हुई थी प्रयाग से, यहां अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने यमुना तट पर एक दलित साधु को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा की थी। वैसे तो साधु की कोई जाति नहीं होती, हमारे यहां यही आधार है मगर देश में फिलहाल जो माहौल है और कुछ लोग सत्ता के लिए इस हद तक गिर चुके हैं कि सामाजिक विभाजन का कोई मौका नहीं छड़ते इसलिए जोर देना पड़ रहा है कि सब देख लें उम्मीदें अभी बाकी हैं और सत्ता के स्वार्थ में जिस धर्म और संस्कृति को लांछित किया जाता है अबकी एकता सम्मान की आवाज वहीं से उठी है।
ये सब इसलिए याद आ रहा है कि अक्सर तमाम राजनीतिक लोग दलित साथियों को भड़काया जाता है कि उनकी समस्याओं की वजह उनका धर्म ही है। कुछ घटनाएं हो सकती हैं उस पर कार्रवाई भी होनी चाहिए, मगर इसके पीछे व्यक्ति विशेष की आपराधिक मानसिकता ही मानना चाहिए। अभी मुझे हाल की एक घटना याद आ रही है। दुनिया भर में न्याय का बुनियादी सिद्धान्त है कि 10 अपराधी छूट जाए मगर एक निरपराध सजा न पाए। इसलिये संभवतः कानून की आंखों पर पट्टी बंधी होती है ताकि वह सिर्फ सबूत की बिनाह पर फैसले दे।
इसी मकसद से सर्वोच्च न्यायालय ने एससी एसटी एक्ट के कार्यान्वयन के लिये जांच पर जोर दिया था ताकि अगर ग़लत आरोप लगाए जाएं तो निरपराध को सजा न मिले। मगर तमाम लोगों ने इसे ऐसे प्रचारित किया गया कि जैसे आरक्षण खत्म कर दिया गया और लोगों को भड़काकर देश को ठप कर दिया गया। अब भी इस तरह की कोशिश जारी है। इस माहौल में ऐसे कदम उन लोगों के लिये तमाचा हैं जो सत्ता के लिए सामाजिक विभाजन से बाज नहीं आते और देश हित को तिलांजलि दे देते हैं।
फिलहाल प्रयाग से जो फैसला हुआ है वो हमारे सामाजिक ताने बाने को मजबूत करेगा। उम्मीद करेंगे ऐसे और फैसले अलग अलग क्षेत्रों से आए ताकि ये मिसाल और खबर न हो बल्कि आम बात है। यही देश की एकता अखंडता और हमारी सांस्कृतिक विशेषताओं का अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक लाभ पहुंचना होगा।
दरअसल, एक घोषणा हुई थी प्रयाग से, यहां अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने यमुना तट पर एक दलित साधु को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा की थी। वैसे तो साधु की कोई जाति नहीं होती, हमारे यहां यही आधार है मगर देश में फिलहाल जो माहौल है और कुछ लोग सत्ता के लिए इस हद तक गिर चुके हैं कि सामाजिक विभाजन का कोई मौका नहीं छड़ते इसलिए जोर देना पड़ रहा है कि सब देख लें उम्मीदें अभी बाकी हैं और सत्ता के स्वार्थ में जिस धर्म और संस्कृति को लांछित किया जाता है अबकी एकता सम्मान की आवाज वहीं से उठी है।
ये सब इसलिए याद आ रहा है कि अक्सर तमाम राजनीतिक लोग दलित साथियों को भड़काया जाता है कि उनकी समस्याओं की वजह उनका धर्म ही है। कुछ घटनाएं हो सकती हैं उस पर कार्रवाई भी होनी चाहिए, मगर इसके पीछे व्यक्ति विशेष की आपराधिक मानसिकता ही मानना चाहिए। अभी मुझे हाल की एक घटना याद आ रही है। दुनिया भर में न्याय का बुनियादी सिद्धान्त है कि 10 अपराधी छूट जाए मगर एक निरपराध सजा न पाए। इसलिये संभवतः कानून की आंखों पर पट्टी बंधी होती है ताकि वह सिर्फ सबूत की बिनाह पर फैसले दे।
इसी मकसद से सर्वोच्च न्यायालय ने एससी एसटी एक्ट के कार्यान्वयन के लिये जांच पर जोर दिया था ताकि अगर ग़लत आरोप लगाए जाएं तो निरपराध को सजा न मिले। मगर तमाम लोगों ने इसे ऐसे प्रचारित किया गया कि जैसे आरक्षण खत्म कर दिया गया और लोगों को भड़काकर देश को ठप कर दिया गया। अब भी इस तरह की कोशिश जारी है। इस माहौल में ऐसे कदम उन लोगों के लिये तमाचा हैं जो सत्ता के लिए सामाजिक विभाजन से बाज नहीं आते और देश हित को तिलांजलि दे देते हैं।
फिलहाल प्रयाग से जो फैसला हुआ है वो हमारे सामाजिक ताने बाने को मजबूत करेगा। उम्मीद करेंगे ऐसे और फैसले अलग अलग क्षेत्रों से आए ताकि ये मिसाल और खबर न हो बल्कि आम बात है। यही देश की एकता अखंडता और हमारी सांस्कृतिक विशेषताओं का अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक लाभ पहुंचना होगा।
सोमवार, 16 अप्रैल 2018
विकास यज्ञ
चहुं ओर विकास के लिए
सरकार ने कथा सुनी
पूंजीपतियों ने किया मंत्र प्रवाह
और अरमान हमारे हवन बने
हम तो श्रो ता, द्
दर्शक रहे हमको मिला प्रसाद
दर्शक रहे हमको मिला प्रसाद
इस यज्ञ का धुंआ यहीं तक फैला
हम देख रहे अपनी ओर शांत आकाश
किसी ने बताया हवा के साथ
तुम्हारी ओर ही आएगा
होगी स्वर्ग कुसुमों की बरसात
बीते दिन पर दिन... अब तो आस भी छूटी
अब ऐसे ही फफक फफक कटेगी रात।।
हम देख रहे अपनी ओर शांत आकाश
किसी ने बताया हवा के साथ
तुम्हारी ओर ही आएगा
होगी स्वर्ग कुसुमों की बरसात
बीते दिन पर दिन... अब तो आस भी छूटी
अब ऐसे ही फफक फफक कटेगी रात।।
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