विचार

सोमवार, 23 मार्च 2020

कोरोना से बचाव के लिए अभूतपूर्व जनता कर्फ्यू दिल्ली नोएडा बंद

कोरोना का प्रसार बढ़ता जा रहा है, दिल्ली नोएडा के हालात भी ठीक नहीं हैं। रोज कोई न कोई मामला सामने आ रहा है। इसको लेकर सरकार, स्वास्थ्यकर्मी, निगमकर्मी समेत तमाम अमला जद्दोजहद कर रहा है, पुलिस और मीडिया भी अपने हिसाब से जिम्मेदारी निभा रही है पर जनता का एक तबका गंभीर नजर नहीं आ रहा था। इसको जागरूक करने के लिए वायरस पर नियंत्रण के लिए 22 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी ने जनता कर्फ्यू का आह्वान किया था यानी जनता के लिए खुद पर अनुशासन यानी लोगों को घरों में रहना था और भीड़ नहीं जुटानी थी, इसको अभूतपूर्व जन समर्थन मिला इतना तो भारत जैसे देश में पुलिस यानी कानूनी कर्फ्यू का पालन मुश्किल है यह हाल पूरे देश में था पर मैं दिल्ली नोएडा की बात करूंगा।

    जब मैं पोस्ट लिख रहा हूं, तब तक देश में कोरोना के 359 मामले दर्ज हो चुके हैं। इसके कारण 7 लोग जान गंवा चुके हैं और 15 लाख से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग हो चुकी है, यह आंकड़े सभी को इससे सजग रहने के लिए प्रेरित करने को पर्याप्त वज़ह हैं। चलिए फिर आते हैं 22 मार्च पर।

     मयूर विहार फेज 3 दिल्ली : आम तौर पर चहल पहल वाले मोहल्ले में सन्नाटा था। लोग घरों में ही थे, दुकानें बंद थीं। सड़कें इंसानों से खाली, कोलाहल बिल्कुल नहीं था। सड़कों पर पशु कोरोना से बेखबर पड़े थे जैसे आज उनका राज हो। दिल्ली में दोपहर में वाहनों के शोर के कारण आपस कि आवाज सुन ना मुश्किल होता है पर आज पक्षियों का कलरव भी आसानी से सुनाई से रहा था। कोयल की कूक और कई ऐसे पक्षियों की आवाज जिन्हें मैं नहीं पहचाता उसे भी सुनना आज मुमकिन हो गया था। इससे पहले एक फेरी वाले ने मोहल्ले के सन्नाटे को चीरा और 2-3 लोगों को कालीन जैसी कोई चीज बेच के गया।

  खैर, करीब 3 बजे दफ्तर के लिए घर से निकला तो इक्का दुक्का लोग ही सड़क पर दिखे, वो भी ऐसा लग रहा था घर में रहने की बेचैनी से बाहर निकले हों पर अपनी सरहद उन्होंने भी तय कर रखी थी। आज सड़क पर न ई रिक्शा था और न ऑटो माहौल भांपते अधिक समय नहीं लगा। किसी मदद की गुंजाइश भी नहीं थी और जाना था नोएडा सेक्टर 63 सी ब्लॉक तो सोचा चलते हैं फिर देखेंगे कि आगे क्या हासिल हॉट है कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा होगा।
 

   आगे चलते हैं तो आसमान इतना नीला अरसे बाद साफ देखा। इतना शांति मानो आसमान भी अपनी बुलंदी से आसमानों कि बस्ती में झांकने की कोशिश कर रहा था कि माजरा क्या है। जैसे पूछ रहा हो कि इतना सन्नाटा क्यों है भाई, आखिर हुआ क्या है। हवा भी साफ थी, दम नहीं घुट रहा था। आगे चला तो कबूतरों ने सड़क पर डेरा डाला था। उनकी    गुट र गूं साफ सुनाई दे रही थी, वर्ना तो सुबह भी उनकी आवाज सुनना मुश्किल होता है। कबूतर निडर भी थे बहुत नजदीक जाने पर ही उड़ रहे थे जैसे आज तो उनका ही राज हो।

   आगे चला तो रेड लाइट मिली पर आज यह उदास थी। आज इसे देखने वाले कम थे तो वह इतराती किस पर। इक्का दुक्का लोग बिना उसकी परवाह किए निकल रहे थे। आगे चला तो पेट्रोल पम्प बंद था, सामने की सोसायटी में कोई बालकनी में फोन से बात करते नजर आया तो कोई अपना काम काज निपटाते नजर आया। कुछ लोग मौके का फायदा भी उठाते मिले उन्होंने सड़क के डिवाइडर पर बनी रेलिंग पर ही कपड़े फैलाए तो कुछ बुजुर्ग सोसायटी के गेट से ही हालात का आंकलन करते मिले वैसे इसे जागरूकता भी कहना चाहिए। वैसे ऐसे दृश्य आगे भी कई जगह मिले।

      आगे नोएडा की हरिदर्शन चौकी पर कुछ पुलिसकर्मी भीतर थे आवाज सुनाई दी और कुछ हो सकता हो ड्यूटी पर हों पर दिखे नहीं वहीं निगम कर्मी टेंकर से पानी का छिड़काव करते दिखे। आगे १२-२२ के पास फुटपाथ पर बंदर चहलकदमी कर रहे थे। भले इंसान खौफ में थे पर ये बेखौफ । सेक्टर २२ होते ही पैदल आगे बढ़ा कुछ और लोग भी बिना वाहन पैदल ही चलने के लिए फंसे थे। कुछ कैब चालक हम लोगों को पैदल जाते हुए मुस्कुरा रहे थे आगे सेक्टर ५८ में फूल खिले हुए थे कोयल की कुहू कुहू सुनाई दे रही थी दूसरे पक्षियों कि आवाज भी साफ सुनाई दे रही थी म न किया लगे हाथ इं आवाज़ों को रेकॉर्ड कर लूं पर फोन ने दगा दे दिया। आज पक्षियों कि मधुर आवाज थी खूबसूरत फूल खिले थे पर न कोई देखने वाला था न सुनने वाला था।

 खैर आगे बढ़ा सेक्टर ७१ पहुंचते ऑफिस से फोन आ गया हालांकि मैंने बता दिया कि आ रहा हूं और फोन रख दिया। तब तक धूप के कारण में पसीने से तर था और बार बार इसे पोंछ रहा था पर उत्साह था तो आगे बढ़ता गया, बहुत दिन बाद पैदल चलने पर आनंद रहा था, मोरादाबाद बरेली याद आ रहे थे। सेक्टर ६६ होते ही आगे बढ़ा तो बिजलीघर से कुछ पहले बच्चे सड़क पर सायकिल चलाते और कोई हिंदी गाना शायद मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू मोबाइल पर मस्ती करते मिले, अंदाजा लगा सकते हैं ये हमारी सांस्कृतिक ताकत ही है कि हम किसी भी स्थिति में खुश रहने की अपनी तलब को छूटने नहीं देते। खैर आगे बढ़ा और कुछ चला तो मंजिल यानी दफ्तर सामने था, पर आज सब अलग सा लग रहा था।

   https://brahmaastra.blogspot.com/2020/03/korona.html?m=1
२२ मार्च को जनता कर्फ्यू के दौरान मयूर विहार फेज थ्री में सड़क पर सन्नाटा पसरा रहा।

जनता कर्फ्यू के दौरान दिल्ली के मयूर विहार फेज थ्री इलाके में सड़कें सूनी रहीं पर चहल पहल कम होने से पक्षी सड़कों के किनारे अठखेलियां करते मिले।

Mayur vihar fase 3 Delhi area at the moment of janta curfue

Kondali  road mayur vihar fase 3 area in Delhi at the moment of janta curfue

 


बुधवार, 18 मार्च 2020

Corona covid 19 के पीछे का खेल

एक वायरस यानी विषा नु ने इन दिनों पूरी दुनिया में हाय तौबा मचा रखी है लोगों का घरों से बाहर aana-जाना कम हो रहा है। अखबार टीवी रेडियो हर जगह corona का ही शोर है। घरों से बाहर निकलते ही बहुत से लोग डरे डरे से लग रहे हैं मुंह पर मास्क लगाए हैं। सेनेटाइजर, जांच किट समेत तमाम ऐसी चीजों की खपत बढ़ गई है जिन्हे भारत जैसे देश में कम पूछा जाता था। कंपनियां वर्क फ्रॉम होम की तैयारी में जुटी है, स्कूल कालेज पूरे मार्च के लिए बंद कर दिए गए हैं,सार्वजनिक कार्यक्रम रद्द हो गए हैं व्यापारिक गतिविधियां ठाप सी हैं। निजी दफ्तर में अचानक गेट पर कर्मचारी खड़े कर दिए गए हैं बिना टेंप्रेचर चेक कराए प्रवेश नहीं कर सकते। हर जगह को सेनेताईज करने का प्रयास किया जा रहा है। बच्चे बच्चे की जुबान पर है।  कुल मिलाकर युद्ध जैसा माहौल है।

    य ह हाल तब है जब यह corona अब तक सामने आए वायरस में सबसे कम ख़तरनाक बताया जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय की वेबसाइट के मुताबिक भारत में 18 मार्च तक सिर्फ 13 0 भारतीय नागरिकों में corona की  पुष्टि हुई है और 24 विदेशियों में और  इससे भारत में सिर्फ 3 लोगों की इससे मौत हुई है, जबकि जांच लाखों लोगों की हो चुकी है, हवाई अड्डों पर ही साढ़े 13 लाख लोगों की जांच हो चुकी है अन्य जिलों शहरों गांवों में भी जांच की जा रही है। उत्तर प्रदेश के गौतमुद्धनगर नगर जिले जिसमें नोएडा शहर भी पड़ता है स्वास्थ्य विभाग की 3000 टीम बनाई गई है जो घर घर जाकर जांच करेंगे।

    इधर इसमें भी आशंका है कि जो लोग corona se mare bhi hain ये पहले से भी किसी बीमारी से ग्रस्त रहे हों, या इनकी प्रतिरोधक क्षमता किसी कारण कम रही हो। इस पर इत ना बड़ा बखेड़ा किसी बड़े खेल की ओर इशारा कर रहा है, मीडिया इसमें कठपुतली बनी हुई है। मैं ये नहीं कहता कि बीमारी से सजग रहने की जरूरत नहीं है और सर्दी जुकाम भी कष्ट तो पहुंचाती है पर अत्यधिक अटेंशन से देश में पैनिक स्थिति बन गई हैं और दवा बाज़ार के खिलाड़ियों को मौका मिल गई है। हालात इसके पीछे बड़े खेल की ओर शक की सुई घुमा रहे है।

    दरअसल एक दिक्कत यह है कि इस novel covid 19 यानी korona से पीड़ित को भी आम बीमारियों में सर्दी, खांसी जैसे लक्षण दिखते हैं पर कोरोण पीड़ित में फर्क यह है कि उसे बुखार अनिवार्य रूप से रहता है। इधर सामान्य बुखार कि स्थिति में भी लोग डर जा रहे है, राहत की बात यह है कि यह हवा के जरिए नहीं फैलता, मानव शरीर के बलगम के संपर्क में आने या ऐसी वस्तु जहां यह है उसको छूने से ही यह फैलता है जबकि इससे ख़तरनाक टीबी है पर पैनिक कोराना को लेकर बनी।

 2018 में एक वेबसाइट ने who ki report ke havale se ek khabar prakashit ki thi isame bataya that ki  दुनिया में टीबी के कारण होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा मौत भारत में होती है। डब्ल्यूएचओ ने वर्ल्ड टीबी डे के मौके पर वर्ष 2016 में यह रिपोर्ट जारी की थी जिसके बाद जनवरी 2018 में इस रिपोर्ट को रिन्यू कर दिया गया । दुनिया में मौत के 10 कारणों में टीबी से होने वाली मौत सबसे ज्यादा है।वर्ष 2016 में पूरे विश्व में 10.4 मिलियन लोग टीबी के शिकार हुए, जिनमें से 1.7 मिलियन की मौत हो गई पर हंगामा कोराना को लेकर संभवतः टीबी की दवा फ्री होने और पुरानी डिसिस होने से यह आकर्षक नहीं रही, या इसमें मुनाफा क म दिख रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय की 2019 में आई रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में देश में टीबी के करीब 21 लाख केस थे। वहीं 14 फरवरी 2019 को एक प्रतिष्ठित अखबार की वेबसाइट ने एक जनवरी से 10 फरवरी के बीच 9367 स्वाइन फ्लू के मरीज पंजीकृत होने और इससे312 की मौत की बात प्रकाशित की है। इसी तरह दूसरी बीमारियां भी हैं पर कवरेज कोरो ना  अधिक पा रहा जिससे पैनिक की स्थिति बन गई है।

     छह मार्च को livehindustan.com पर एक रिपोर्ट बताती है यह वायरस बूढ़ो और बीमारों के लिए ही थोड़ा ख़तरनाक है। बीते दिनों मैंने एक राष्ट्रीय दैनिक में इससे ख़तरनाक चार पांच वायरस के बारे में पढ़ा था फिर इससे घबराने की क्या जरूरत। हालांकि किसने इसे फैलाया इसको लेकर दो देश आरोप प्रत्यारोप में पड़े हैं । इससे तो यह लगता है कि इसके पीछे बाज़ार कि ताकते हैं।

 अच्छी बात यह है कि सरकार ने चीन में इसके मामले सामने आने के बाद ही एहतियाती कदम उठा लिए थे। विदेश से आने वाले लोगों की स्क्रीनिंग शुरू कर दी गई थी। इसका नतीजा भी सामने लोग ठीक होकर अपने घर जा रहे हैं। अभी तक सिर्फ हवाई अड्डों पर तेरह लाख 54 हजार से अधिक लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है। जिला स्तर पर भी इलाज की व्यवस्था है, 14 पीड़ित लोगों को अस्पतालों से छुट्टी भी दी जा चुकी है। जिला प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर हेल्प लाइन जारी की गई है जहां मदद मिल रही है। हालांकि इसमें भारतीय संस्कृति भी सहयोग कर रही है लोग बात कर रहे है एहतियात बरत रहे हैं पर मस्त भी हैं।
      मैं पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड के पूर्व प्रमुख नजम सेठी जो इन दिनों ब्रिटेन में हैं उनका यूट्यूब वीडियो देख रहा था। वो ब्रिटेन के बारे में बता रहे थे कि यहां पैनिक करियेट करने से बचा जा रहा है। गंभीर लोगों का ही इलाज किया जा रहा है बाकी केस रजिस्टर करने के बाद कहा जा रहा है आपस में खूब मिलो एक सीमा के बाद शरीर खुद की इसके खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेगा। इस तरह एहतियात बरतें पर डरें नहीं।

 हम  इससे पहले प्लेग आदि बीमारियों से लाद चुके हैं पर इतना डर नहीं देखा पर इसके कारोबार में कुछ लोगों का तो फायदा हो ही रहा है,मास्क   जांच किट सेनेटाइजर, साबुन और संक्रमण मुक्त करने की दवाओं की बिक्री बढ़ी हुई है। मास्क तो कई गुना अधिक कीमत पर बिक रहे हैं। इसी दौरान एन सी आर में नकली सेनेटाइजर बनाने में भी लोग पकड़े गए हैं।

 17 मार्च 2020 के हरिभूमि अखबार के संपादकीय पृष्ठ पर कोराना के डर का सच शीर्षक से प्रकाशित एक लेख में भी वायरस को प्रचारित करने के पीछे किसी खेल के होने की आशंका से इंकार नहीं किया है। इसमें कहा गया है कि कोराना वायरस जितना ख़तरनाक नहीं है उससे अधिक साबित हो रेशा है। इसे सफल बनाने के लिए मीडिया और मुट्ठी भर चिकित्सकों का सहारा लिया जा रहा है। 


इसमें कहा गया है कि वायरस की कोई मुकम्मल दवा नहीं होती। इसमें कहा गया है कि 1983 में आविष्कृत जिस पीसी आर टेस्ट के बल पर korona को डिटेक्ट करने की बात कही जा रही है उसके आविष्कारक कैरी मुलिस ने माना था कि इससे किसी पार्टिकुलर बैक्टीरिया या वायरस को 100% डिटेक्ट नहीं किया जा सकता। इसमें यह भी बताया गया है कि ब्रह्मांड में करीब 3.5 लाख वायरस हैं जिनमें से अभी 200 का ही नाम रखा जा सके हैं। और चिकित्सा विज्ञान कहता है कि ये वायरस हमारे शरीर में आते जाते रहते हैं पर हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने पर ही असर डालते हैं । ऐसे में कोराना को लेकर हंगामा क्यों बरपा है समझ से परे है।

सोमवार, 30 सितंबर 2019

किसान



गर्मी की दोपहरी में

  दूर कहीं धूप में
  जहां आग है बरस रही
  एक आकृति हिलती- डुलती है
  पकड़े हलों की मूठ हाथ में

   जल रहा है पेट की आग से
   उसका खून ही पसीना बन टपक रहा
  तन पर चीथड़े हैं उस पर भी
  सूर्य की तपन का क्रोध
  धरती भी उसी को जलाकर प्रतिशोध ले रही

  तपती लू को झेलते
  इस आस में भर पेट रोटी मिलेगी
  अगले साल किसी पेड़ की छाह में
  इस विशाल नभ के नीचे
  इस हत भाग्य को
  सपनीली दीवारों पर
  मिलती यही अलौकिक छत है।

सर्दी में

   जाड़ों में जब हम घरों में बैठे होते हैं
   हीटर, आग के पास बैठे कांप रहे होते हैं
   पानी को बर्फ समझ छूते हैं
   हाड़ कंपा देने वाली ठंड में

   किसान कुछ चीथड़े पहने
   खेतों में सिंचाई की क्यारियां बनाते
   पानी में ही खड़ा रहता है ठिठुरते कंपकंपाते
   घर से दूर कहीं सेंवार में

   इस समय भी साथ देते हैं उसका
   वही मरते मिटते सुनहरे सपने
   दिन हो या रात में

बरसात में

    जब हम वर्षा की फुहारों का इंतज़ार करते हैं
   किसान भी इंतज़ार करता है आशा भरी बूंदों की
  पर वर्षा की बूंदें खपरैलों छप्परों से टपकती
  वजूद को झकझोर छोड़ जाती है रीता

   बादलों के गर्जन और बिजली की तड़प
  बढ़ाती है किसान की आस और विश्वास को
  लहलहाती फसलों से आह्लादित
  फसलों के पकने का इंतज़ार करता है


  तैयार फसल से निकला अनाज
  तमाम कर्जों और सूदों को चुकाने के बाद
  कुछ दिनों की खुशियां दे पाती हैं
  भूख मिटाने वाला भूखा सोता है
  जीवनदाता भूखों मरता है
  अगले वर्ष फिर शुरू होता है
  वही अंतर्द्वंद्व और अंतर्विरोध।





गुरुवार, 19 सितंबर 2019

किसान का दुख


२००७ से पहले इलाहाबाद में लिखी मेरी कविता जिसमें किसान की सोच को मैंने आज के हालात में समझने की कोशिश की थी, जो अब भी कमोबेश वहीं हैं।
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     देखो-देखो फूटी विकास की चिंगारी 
    हो गई मेरी छप्पर राख।
    मुझमें से ही किसी से विकास का गुणगान कराया 
  देने लगे मुझे "राख का प्रसाद"।।

 कौन दिखलाये रास्ता, कौन दे हमें सहारा।
 आंखों से छलके आंसू,दिल से निकली आह
एक आंखों की हद में सूखी, दूसरी लौट आई मेरे पास।।
 
   एक मन जलाए, दूजी तन जलाए।
  मेरी छटपटाहट कौन समझे, कौन समझाए।।
  मेरे आंसुओं की है क्या कीमत।
  जब मेरी पीड़ा कुछ को सुख दे अनमोल।।


 फिर कोई क्यों पसीजे, दुनिया चलती अपनी राह ।
है मुझको क्या अधिकार, कथा कहूँ अपनी दुनिया की
जो हुई मेरे देखते तबाह।।


  जमीन पुरखों की थी चली गई। दर-दर रोटी को भटकूँगा। क्या मुझको मिलेगा काम।। न जाने कब इस टीस संग मुझको मिल पाए आनंद "विश्राम"।

रविवार, 15 सितंबर 2019

बाजार के भरोसे हिंदी

   
१४ सितंबर यानी राजभाषा दिवस पर शनिवार को देश भर में एक तरह से कर्मकांड हुए। सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों में कविता, कहानी के कार्यक्रम और गोष्ठी होंगी और पखवाड़ा पूरा होने के बाद साल भर तक के लिए छुट्टी, बीच में एक आध आपस में पत्र लिखकर कर्तव्य की इतिश्री। ये ऐसा ही है जैसा हर साल हम पितृ पक्ष में पितरों का बिना किसी समझ, सोच और भावना के पिंडदान और तर्पण कर देते हैं नतीजा वही ढाक के तीन पात होना ही था, इसीलिये हिंदी भाषी राज्यों में भी पूर्ण रूप से ७२ साल बाद भी हिंदी में कामकाज शुरू नहीं हो पाया है और कामकाज पर अंग्रेजी का दबदबा है, जहां अगर गैर हिंदी भाषी राज्य या अफसर या विदेशी प्रतिनिधि से ही बातचीत के लिए दूसरी भाषा की जरूरत है। दरअसल एक दौर में अपने अभिजात्य के प्रदर्शन और बहुसंख्यक से खुद को अलग दिखाने के लिए अफसर और बड़े लोगों में फारसी बातचीत की रिवायत थी, बाद में यह जगह अंग्रेजी ने ले ली। आज के अफसर भी इस सोच से अभी उबर नहीं पाए हैं। 
     अब तो हिंदी का नाम लेते ही बवाल होना आम है। हाल में हिंदी को लेकर गृहमंत्री अमित शाह के बयान,हिंदी ही पूरे देश को एकजुट रख सकती है के बयान पर बवाल इसकी बानगी है जिसमें पश्चिम बंगाल तेलंगाना और तमिलाडु में विपक्ष के नेताओं और कुछ स्वनामधन्य पत्रकारों ने भी हंगामा किया है जिन्हे अनावश्यक ही देश की विविधता को लेकर डर सताता रहता है। जबकि दक्षिण के विद्वानों समेत तमाम लोग ऐसी बात सालों पहले कह चुके हैं। ये जमीन इसलिए इन्हे मिल पाई है क्योंकि सरकारी स्तर पर हिंदी को प्रतिष्ठित करने की जिम्मदारी जिस पर थी वो इसे नहीं कर पाए और अफसर इस तोहमत से तोहमत से बच नहीं सकते। आइए देखते हैं कुछ विद्वानों के विचार –

भाषा के उत्थान में एक भाषा का होना आवश्यक है। इसलिए हिन्दी सबकी साझा भाषा है। 
- पं. कृ. रंगनाथ पिल्लयार

मैं मानती हूं कि हिन्दी प्रचार से राष्ट्र का ऐक्य जितना बढ़ सकता है वैसा बहुत कम चीजों से बढ़ सकेगा। 
- लीलावती मुंशी

हिन्दी का पौधा दक्षिणवालों ने त्याग से सींचा है। 
- शंकरराव कप्पीकेरी

राष्ट्रभाषा हिन्दी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है। 
- अनंत गोपाल शेवड़े 

दक्षिण की हिन्दी विरोधी नीति वास्तव में दक्षिण की नहीं, बल्कि कुछ अंग्रेजी भक्तों की नीति है। 
- के.सी. सारंगमठ

हिन्दी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। 
- वी. कृष्णस्वामी अय्यर

हिन्दी हमारे देश और भाषा की प्रभावशाली विरासत है। 
- माखनलाल चतुर्वेदी

हिन्दी भाषा के लिए मेरा प्रेम सब हिन्दी प्रेमी जानते हैं। हिन्दी भाषा का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है। राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की शीघ्र उन्नति के लिए आवश्यक है। अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है। 
- महात्मा गाँधी

हिन्दी भाषा और हिन्दी साहित्य को सर्वांगसुंदर बनाना हमारा कर्त्तव्य है। 
- डॉ. राजेंद्रप्रसाद

हिन्दी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्रनिर्माण का प्रश्न है। 
- बाबूराम सक्सेना

     भारत में हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए बने संगठनों का परिणाम आधारित आंकलन करें तो नतीजा इसके उलट शायद ही आये। इसलिए हिंदी की हाय तौबा के बीच हमें इस राजभाषा दिवस पर क्या खोया क्या पाया का मूल्यांकन करने और जिम्मेदारों के काम का आकलन करने की भी जरूरत है। मैं राजभाषा विभाग की वेबसाइट www. rajbhasha.in देख रहा था, जिसमें उन्होंने अपने काम का बखान किया है। यह विभाग १९७८से एक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित करता है राजभाषा भारती प्रकाशित करता है, दावा किया गया है कि केंद्र सरकार के कार्यालयों में इसे हिंदी के प्रचार के लिए बांटा जाता है खैर मैंने तो तब जाना जब खोजते खोजते वेबसाइट पर पहुंचा। ये और बात है कि सरकारी दफ्तर में पत्रिका बांटने से कितना प्रचार हो सकेगा, गैर हिंदी भाषी आम लोगों के जुड़ाव के लिए क्या किया। आज के बाज़ार से ही सीख लेते हिंदी भाषा पर केबीसी टाईप सीरियल ही चलवा देते तो भी कुछ भला हो जाता। खैर ये हिंदी के प्रसार के लिए सरकारी प्रयास की बानगी भर है,दूसरे प्रयास भी मिलते जुलते ही हैं । इसलिए परिणाम भी हमारे सामने है।
     खैर हर जगह अंधेरा ही नहीं है, उम्मीद अभी भी बाकी है। प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत की कविता का अंश सबसे खूबसूरत दिन अभी देखा नहीं मैंने और जॉन मिल्सान का कथन हर बादल में आशा की एक किरण होती है यही भरोसा दिलाते हैं। रफ्ता रफ्ता बढ़ रही Hindi इसको पुष्ट भी कर रही है। देश और दुनिया की बड़ी आबादी नौकरी रोजगार और सांस्कृतिक समागम के लिए हिंदी को सीख रही है। यही वजह है कि दक्षिण भारत और अन्य हिस्सों से आन्योत्तर भारत आने वाले लोग आसान हिंदी सीख ही रहे है, हिंदी का सार्वजनिक विरोध के बाद भी गैर हिंदी भाषी राज्यों खासकर तमाम निजी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जा रही है, जनसंपर्क की एक बड़ी भाषा सीखने का उन्हें लाभ भी मिल रहा है हिंदी भी बढ़ रही है दुनिया के दूसरे देशों के लोग भी ऐसा ही कर रहे हैं नतीजतन आज संयुक्त राष्ट्र संघ ने हिंदी में अपना ट्विटर हैंडल भी शुरू किया है और इनकी ओर से हिंदी में न्यूज बुलेटिन भी शुरू किया गया है। हिंदी दिवस पर २०१९ में दैनिक भास्कर अखबार में छपी एक रिपोर्ट के मुतबिक़ बीते चार दशक में हिंदी बोलने वाले 19% बढ़े हैं। अकेले10 साल में हिंदी भाषी 10 करोड़ बढ़ गए। जबकि इसी दौरान अन्य 9 भाषाएं बोलने वालों की संख्या घटी है। यह बातें उम्मीद की किरण दिखाती हैं।
    अफसोस की बात है कि उत्तर भारत में अभी बच्चों को एक और भाषा सिखाने की भले ही दक्षिण की ही सही दृष्टि शिक्षण संस्थानों में विकसित नहीं हो पाई है इससे रोजगार के अवसर भी विस्तृत होते देश का एकीकरण भी मजबूत होता पर सुकून यही है कि पांव पांव चलते बाज़ार संस्कृति और संख्या के भरोसे हिंदी बढ़ रही है। हिंदी सिनेमा का इसमें बड़ा योगदान है। आज दक्षिण भारत,पश्चिम भारत,पूर्वोत्तर और अमेरिका यूरोप के लोग तक इस उद्योग से जुड़ रहे हैं और इस बाज़ार से संवाद के लिए हिंदी सीख रहे हैं जो भविष्य को लेकर उम्मीद बांधती है। इसे इनके विचारों से समझा का सकता है।

हमारे देश में हिंदी हमारी फिल्मों के चलते ही बची हुई है। मैं न्यूयॉर्क में था। वहां एक अफगानी ने मुझसे हिंदी में बात की। वह इसलिए कि वह हमारी फिल्मों का बहुत बड़ा फैन रहा है। जर्मनी में एक व्यक्ति हिंदी गाना गाते हुए दिखा। हिंदी फिल्मों के कारण हिंदी स्प्रेड हो रही है।
- मानव कौल, अभिनेता

मैं जब इटली से इंडिया आई, तभी जरूरत महसूस हुई कि हिंदी सीख लेनी चाहिए। मेरे खयाल से बॉलीवुड में हिंदी भाषा आना बहुत ही आवश्यक है। मैं आज भी हिंदी के नए शब्दों को सीखती हूं। मुझे हिंदी भाषा समझने और लोगों को अपनी बात समझाने में 5-6 महीने का वक्त लग गया। हिंदी सीखने के लिए किताबें पढ़ने के साथ-साथ लिखना और पढ़ना अपनी टीचर अपर्णा से सीखा।
- जॉर्जिया एंड्रियानी, इटली में जन्मी और वहां पली-बढ़ी

शनिवार, 27 अप्रैल 2019

नारे : मौत के सौदागर से चौकीदार चोर है तक


कोई आंदोलन हो चुनाव , अपने समर्थकों को प्रोत्साहित करने उन्हें एकजूट रखने और प्रतिद्वंद्वयो को पस्त करने व उनके समर्थकों को अपने पक्ष में लाने में अहम भूमिका होती है। आधुनिक दौर की बात करें तो कई नारों का दांव पलट गयया। ऐसा ही चर्चित नारा था मौत का सौदागर गोधरा कांड की छाया में गुजरात में हुए साम्प्रदायिक दंगों के चलते तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ने उस समय के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ये कहा था, जिसे उन्होंने गुजराती गर्व पर हमला की बात समझा कर बड़ी जीत हासिल की। यह क्षमता ही नरेंद्र मोदी को आज के राजनीतिज्ञों से आगे लाकर खड़ा कर देती है। इसके लिए उन्होंने विश्वसनीयता अर्जित की है। एक वक्त राजग की ओर से दिया गया इंडिया शाइनिंदग का नारा भी लोगों की समझ में नहीं आया था और नैरा देने वाले दल को हार का सामना करना पड़ा। इस लोकसभा चुनाव में भी एक नारे की परीक्षा होनी है 【चौकीदार चोर है】। कांग्रेस की ओर से प्रधानमंत्री पर हमले के लिए खास तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। इसकी काट के लिए बीजेपी की ओर से मैं भी चौकीदार हूँ नारे से जवाब दिया जा रहा है इसमें एक पेशे की कांग्रेस की ओर से तौहीन किये जाने के तौर पर दिखाया जा रहा है। इसमे कोशिश है कि चौकीदारी करने वाले लोंगो को अपने पक्ष में उनके गर्व को भुनाना है। इससे पहले चौकीदार चोर का नारा मोदी के चौकीदार बताकर ईमानदारई दिखाने की कोशिश थी, जिसका एक सिरा पिछली यूपीए सरकार तक जाता है जो भ्रष्टाचार को लेकर बदनाम हो गई थी, इसी की काट के लिए कांग्रेस की ओर से नारा दिया गया था। अब देखना है कि किसकी बात लोगो को समझ मे आती है। इस पर संभव है शोध हो कौन सा नैरा असफल हुआ और क्यों।

आधे देश में मोदी के इर्द गिर्द लड़ा जा रहा है चुनाव


देश नई लोकसभा का गठन करने की ओर धीरे धीरे आगे बढ़ रहा है। तीन चरण का मतदान हो चुका है चौथे चरण में लोग २९ अप्रैल को अपने सांसद के लिए वोट करेंगे पर माफ कीजिएगा इस चुनाव में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। देखने में यह आ रहा है पूर चुनाव एक व्यक्ति के इर्द गिर्द लड़ा जा रहा है मोदी। पूर्व से पश्चिम और उत्तर के राज्यो में यही हाल है। या तो लोग मोदी के पक्ष में हैं या विरोध में। मैं इसे राजनीतिक ध्रुवीकरण कहूँगा, जब से होश संभाला है पहले कभी नहीं देखा। 2014 में भी इतना जबरदस्त बिभाजन समाज में नहीं था। हालांकि इसमें भी उम्मीद कि किरण यह है कि इसमें भी जाति और धर्म की दीवारें दरकी हैं यहां तक कि घरों में भी और पीढ़ीगत बिभाजन सामने आया है हाल यह है एक ही परिवार के वोट अगर दो तरह से मोदी के पक्ष और विरोध में पड़ जाय तो आश्चर्य नही होना चाहिए । पश्चिम यूपी में ऐसा नज़र आया है कि एक ही परिवार में बुजुर्गों ने गठबंधन का साथ दिया पर बच्चों ने गुरिल्ला पद्धति से कमल खिला दिया। बिभिन्न जातीय और धार्मिक समूहों ने भी ऐसा किया कुल मिलाकर जाति के नाम पर वोटिंग का रोग भी कमजोर हुआ है। भविष्य में हो सकता है संचार के विद्वान या कोई और इस पर शोध करे कि भारत जैसे विविधता वाले देश में ये कैसे संभव हुआ पर फिलहाल ऐसा है और दोनों तरह के लोगों की तादाद अच्छी खासी है और मुकाबला दिलचस्प। इसको एक रेखीय अध्यक्षात्मक प्रणाली अपनाने जैसा है। एक रेखीय इसलिये कह रहा हूँ कि भारत में संसदीय शासन प्रणाली है जहां हैम सांसद चुनते है और वो प्रधानमंत्री और अध्यक्षात्मक प्रणाली में लोग सीधे प्रधानमंत्री राष्ट्रपति चुनते हैं बाकी चीजें ये चुनते हैं । भारत मे अनौपचारिक रूप से लोग के प्रधानमंत्री चुनने का पैटर्न दिखा रहे हैं मोदी के पक्ष वाले, विरोधियों में चूंकि ऐसा नहीं है मोदी विरोधी दल और सांसद प्रत्याशी भी देख रहे हैं इसलिए मैंने एक रेखीय कहा।हाल यह है कि मोदी के पक्ष वालों को जो भाजपा को वोट देकर आये हैं या देनेवाले हैं अपने उम्मीदवार का नाम न बताएं तो ताज्जुब नही होना चाहिए। कुल मिलाकर यहां पार्टी और संगठन भी गौण नज़र आ रहे हैं। इसे लहर नहीं कहें तो और क्या कहें। हालांकि मोदी को शिकस्त देने के इच्छुक लोग भी उतने ही एकजुट हैं। इस तरह कुर्सी का फैसला अब संख्या पर निर्भर करेगी और दूसरे हितग्राही समूहों पर हालांकि इनकी भी संख्या एक, दस पचास सौ नही हजारो और लाखों में हैं जिनके अपने अपने हित है और उसी के हिसाब की सरकार लाने की कोशिश करेंगे। इसमें उस वर्ग को नुकसान हो सकता है जो मतदान के दिन आंकलन में जुट रहे और बूथ पर मतदान से दूर रहे। ये हाल मीडिया जैसे पेशे में भी मिल जाएंगे कुछ तो इतने विरोधी हैं कि केंद्र सरकार कोई भी काम कर दे वो मोदी की कोई। नकोई कमी निकाल लेंगे कुछ इतने बड़े समर्थक बन गए हैं कि वो कल्पना नहीं कर सकते कि मोदी या उनके नेतृत्व वाली सरकार कुछ ग़लत कर सकती है चुनाव में ये दोनों ही पक्ष मुखर हैं और उन्होंने फिक्स कर लिया है अब दल प्रचार भी न करें तो ये वोट ऐसे ही पड़ने हैं। अब इसमें सबसे बड़ी फजीहत सर्वे वालों कि है अगर किस्मत sahi nahi रही और सैम्पल लेते वक्त निरपेक्ष वोटर नही मिले तो सारा आंकलन गड़बड़ा देंगे। २०१४ में एक तरह की सत्ता विरोधी लहर थी और एक प्रदेश के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बनने के लिए उसके दिखाए सपनों पर लोग प्रधानमंत्री बनाने को तैयार थे पर मीडिया इसके लिए तैयार न था कोई भी मीडिया भाजपा नीत एंडी ए की सर्वे में पूर्ण बहुमत देने को तैयार न था हालांकि नतीजे के बाद मोदी लहर कहीं गई। अब बात करें इधर कुछ दिनों के हाल की तो राजनीतिक दलों ने जैसे मोदी के पक्ष और विरोध को स्वीकृति दे दी है। अख़बार का कोई भी पन्ना उठा लीजिए किसी विरोधी दल का नेता ये नही कहता दिखाई देता की हमारी ये नीति है जो अच्छी आपके लिए हितकारी है इसलिए चुनो या उनकी ये नीति खराब है इसलिए मत चुनो। मोदी के विरोध वाले उनकी पार्टी से ज्यादा नाम मोदी का लेते हैं और मोदी को हटाने के लिए वोट मांग रहे हैं और पक्ष वाले मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए। परसों एक चाय की दुकान पर नोएडा में एक अधेड़ को देखा बड़बोले से लगे तो कुरेद दिया। चुनाव का क्या हाल है तो भरे बैठे थे कहने लगे इस उम्र में काम करना पड़ रहा है मोदी के कारण उसे वोट नहीं दूंगा। ये कपड़े लट्टे से निम्न आय वर्ग के लगते थे। वैसे एक टैक्सी चालक से टकरा गया अकेले मैं ही था तो पूछ बैठा कहाँ रहते हो तो बताया नोएडा। अगला सवाल किया चुनाव का क्या रहा तो उन्होंने बताया कि मोदी को वोट दिया जबकि उनके यहां से भाजपा प्रत्याशी डॉक्टर महेश गिरी थे और मंत्री भी थे। अगले दिन पिथौरागढ़ के टैक्सी चालक से मिला वो दिल्ली में ही काम करते हैं काफी परेशान भी थे फिर भी चुनाव का पूछ बैठा तो उन्होंने अपने वोट के साथ प्रदेश की 5 सीट मोदी को देने का दावा कर दिया। इसी तरह शुक्रवार को ई रिक्शा एक जगह जा रहा था तो चालक को छेड़ दिया वो दिल्ली में रहते हैं। बस उसने मोदी के पक्ष में राय जाहिर कर दी मैंने और कुरेदा तो उन्होंने मोदी की अच्छी बात बताने के लिए काम से कम एक घंटे की मांग रख दी। हालांकि स्टेट चुनाव में आप को वोट देने की भी बात कही। मैंने कहा मैं तो आज समय दे सकता हूँ कुछ चीज़ें उन्होंने बताई भी पर हमारे चर्चा से एक अधेड़ बिफर पड़े वो शायद कर्मचारी थे। वो मोदी से नाराजगी जताने लगे और आप की बात रखी,मेट्रो तक वो मुझे मुतमईन करने की कोशिश करते दिखे और मोदी से नाराजगी का इज़हार। इतना जबरदस्त मोदी के प्रति गंभीर गुस्सा सामान्य बातचीत में विरोधी पक्ष के नेता को लेकर मैंने देखा नहीं था अब तक। कुल मिलाकर दक्षिण को छोड़ दें तो हर सीट पर मोदी ही लड़ रहे हैं चाहे पक्ष हो या विपक्ष।

मंगलवार, 19 मार्च 2019

मोदी के जल रूट पर प्रियंका वाड्रा का सफर


असम्भव की संभाव्यता का खेल है राजनीति। कम से कम भारत की राजनीति देखकर तो यही लगता है। जो जल रूट मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक है, उस रूट पर उनकी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वियों में से एक प्रियंका वाड्रा सफर कर रहीं हैं। वह भी मोदी से पहले, इस कड़ी में आज वह मिर्ज़ापुर जिले में पहुंच रही हैं यहां वह गंगा किनारे रहने वाले लोगों खास कर मल्लाह आदि जातियों को रिझाने की कोशिश करेंगी। मिर्ज़ापुर के लोगों को खुश होना चाहिए कि कम से कम वोट के लिए ही सही जनाब ए आलिया ने कदम तो रखा वो भी उन ही प्रतीकों को अपनाते हुए जिससे हमेशा दूरी बनाए रखना ही इन्हें उचित लगा। भला हो लोकसभा चुनाव 2014 का जिसने इस परिवार को लोकतंत्र और मिर्ज़ापुर की याद दिलाई पर यह देखना होगा कि इसका हासिल क्या होता है। अब देखना होगा कि जिस गंगा को केवट के माध्यम से पार कर राम अपनी मंजिल तक पहुंचे थे क्या प्रियंका भाई को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सफल हो पाएंगी। या खुद प्रियंका राम जैसी निश्छल हो सकती है या लोग उनके मन के भीतर झांक लेंगे। प्रियंका के इस सफर में कमलापति त्रिपाठी की विरासत को संभाल रहे उनकी चौथी पीढ़ी के नेता ललितेश त्रिपाठी और प्रतापगढ़ के रहने वाले राज्यसभा सदस्य योजनाकार हैं। वही मिर्ज़ापुर संसदीय सीट से कांग्रेस के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी हैं पर उनको टिकट देने का मकसद ब्राह्मण वोट को बस रिझाना है क्योंकि त्रिपाठी परिवार का बनारस विंध्याचल मंडल के ब्राह्मणों और अन्य समुदायों पर अच्छा खासा असर है। कांग्रेस के सबसे बुरे दिन में भी इस परिवार ने कांग्रेस की मौजूदगी यहां गाहे बा गहे बचाए रखा, उन्होंने हमेशा पार्टी का साथ दिया पार्टी का साथ मिला होता तो पूर्वांचल में कांग्रेस को एक अच्छा नेता मिल सकता था। इतने सालों में कांग्रेस की ओर से पार्टी में भी कोई प्रमुख जिम्मेदारी नहीं दी गई। क्या ब्राह्मण इसको भूल पाएंगे। अब चुनाव के समय एक टिकट, पार्टी के मन परिवर्तन का कोई सबूत नहीं है क्योंकि खुद कांग्रेस पार्टी के पास त्रिपाठी परिवार से अच्छा मिर्ज़ापुर में उम्मीदवार नहीं है, ऐसे में लालितेश को टिकट का छिपा एजेंडा ही है। वैसे लगता नहीं कि अगर जातीय गोलबंदी हुई तो ब्राह्मण किसी झांसे में आ जाएंगे और एक बार मायावती, बाद में बीजेपी को सत्ता के शिखर पर पहुंचाने में मदद कर ब्राह्मण अपनी ताकत समझ चुके हैं। किसी भी सीट पर जीत के लिए अ़फसोजनक रूप से जातीय गोलबंदी ही काम आएगी और कोई भी जाति अकेले किसी भी प्रत्याशी को लोकसभा नहीं पहुंचा पाएगी। ऐसे में जातीय गठबंधन की जरूरत होगी। इसके लिए कवायद शुरू हो गई है। सपा ने बसपा से गठबंधन किया है पर एक सवाल यह है कि ऊपर के नेतृत्व में हुआ गठबंधन आमलोगों का मनबंधन कर सकेगा क्योंकि अपेक्षाकृत दबंग समझे जाने वाले यादव समुदाय के लोगों का जातीय अस्मिता के शीर्ष पर उड़ान भर रहे लोगों में मेल कैसे होगा जबकि पिछली सपा सरकार के जाने का एक प्रमुख कारण यही माना जाता है। नेताओं की मजबूरी का गठबंधन पर क्या आम लोग भी मजबूर हैं यह तो समय ही बताएगा। वहीं कांग्रेस भी मुस्लिम, दलित ब्राह्मण आदि जातियों में से छोटी छोटी हिस्सेदारी पाने की कोशिश कर रही है। ऐसे में खेल किसका बिगड़ेगा यह तो 23 Mai ko पता चलेगा पर nda की बात करें तो उसका पलड़ा थोड़ा मजबूत नजर आता है, अपना दल की भागीदारी और मोदी सरकार के विकास कार्य और दूसरी पार्टियों से नाराज़गी की खुराक काम आयी और गर्मी में लोग वोट देने निकले तो तय मानिए सही जगह पर सही व्यक्ति का पलड़ा भारी रहेगा।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

विपक्षी गठबंधन : ज्यादा जोगी मठ उजाड़


हस्तिनापुर(तकरीबन वर्तमान दिल्ली) के लिये समर की तैयारियां तेज हो गईं हैं। दोनों ही पक्ष , सत्ता पक्ष और विपक्ष अपने तीर कमान दुरुस्त करने में जुटा है। दोस्त भी जुटाए जा रहे हैं। इस पर दोनों पक्षों से अलग तमाम लोग नज़र भी रख रहे हैं। इस बीच मुझे एक बार फिर लगता है कि जीत तो उसी की होगी जिस तरफ कृष्ण(जनता) होंगे। भले ही उनकी अक्षौहिणी सेना(तमाम राजनीतिक दलों को समझ सकते हैं) किसी दूसरी तरफ से लड़े, एक बार फिर यह मानने में कोई दो राय नहीं होगी कि किसी भी प्रकार से घटनाक्रम ऐसा घटित होगा कि कृष्ण सही और उचित की ओर से लड़ेंगे यानी जीत तो सच की होनी चाहिए। खैर इस दृष्टांत के जरिये मैं आने वाले लोकसभा चुनाव को समझने का प्रयास कर रहा हूँ। इससे पहले हमारे यहां मशहूर दो कहावतों पर नज़रसनी चाहता हूँ। एक ज्यादा जोगी मठ उजाड़ और दूसरा नौ कनौजिया नब्बे चूल्हा मोटामोटी अर्थ यह समझिए कि इतने अधिक विभिन्नता वाले लोगों में मतैक्य की गुंजाइश कम समझिए। अब चलते हैं आज के राजनीतिक परिदृश्य पर। कोलकाता से हैदराबाद तक में कम से कम चार गठबंधन मोर्चे पर हैं जगह-जगह जोरआजमाइश हो रही है।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2019

पश्चिम बंगाल: मोर्चा भले ही पोलिस आयुक्त के आसपास है लड़ाई का मैदान लोकसभा चुनाव है


देश में व्यक्तित्व की विचित्रता वाले नेताओं के उभार से लोग दिग्भ्रमित हो रहे हैं, ये नेता ऐसे हैं कि कभी कुछ गलत कर ही नहीं सकते के अहंकार भाव से ग्रस्त हैं। इसकी शुरुआत यूपीए २ में अपनी ही सरकार के अध्यादेश को मीडिया के सामने फाड़कर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहसिंह को शर्मिंदा करने वाले वर्तमान पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने की। तब से यह रोग बढ़ता ही जा रहा है।
 दिल्ली से कोलकाता तक ऐसे मंजर आम है। इससे अराजकता का माहौल बन रहा है और देश के संघीय ढांचे को नुक़सान पहुंच रहा है। अफसोसनाक बात है सियासी मजबूरियों के कारण इसके लिए दूसरों को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। एक सवाल है कि क्या केंद्र सरकार के विरोध में होने भर से देश की पूरी व्यवस्था को ध्वस्त करने की आजादी दे दी जानी चाहिए। ताज़ा मामला पश्चिम बंगाल का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शारदा चिट फंड मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम को रविवार को कोलकाता में हिरासत में ले लिया गया। केंद्रीय जांच एजेंसी की यह टीम कभी इसी मामले की जांच कर रही sit के अफसर और वर्तमान कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार से पूछताछ करने पहुंची थी। इस दौरान सीबीआई की टीम को घंटों थाने में बैठाया जाना राज्य सरकार और पुलिस की सोच पर सवाल उठाता है। बाद में टीम को छोड़ दिया गया और मुख्यमंत्री धरने पर बैठ गईं और आरोप लगाया कि राजनीतिक विरोधियों को परेशान किया जा रहा है।
 सवाल यह है कि कोलकाता पुलिस आयुक्त क्या राजनीतिक पार्टी के सदस्य हैं और पूछताछ से पहले किसी मुख्यमंत्री को किसी अफसर को क्यों क्लीनचिट देना चाहिए था या इसके लिए कोर्ट का रास्ता नहीं था पर जो रास्ता अपनाया गया अभूतपूर्व था और अब इसने सुबहे को जरूर जन्म दे दिया। सबको पता है कि पुलिस और प्रशासन का मुखिया सरकार का पसंदीदा अफसर ही होता है ऐसे में मुख्यमंत्री का राजीव कुमार के पक्ष में उतरना और जिस घोटाले में बनर्जी सरकार से जुड़े मंत्री और लोग आरोपित हों उस जांच टीम के मुखिया को अहम जिम्मेदारी दिया जाना सवाल तो उठाएगा। इससे राजीव कुमार की व्यक्तिगत छवि को भी धक्का पहुंचेगा। शारदा घोटाले की जांच सीबीआई supreme Court ki निगरानी में कर रही है ऐसे में केंद्रीय एजेंसी को पूछताछ से रोककर क्या माननीय न्यायालय का सम्मान किया गया या संघीय ढांचे की फिक्र की गई या यह बातें विभिन्न दलों के लिए बस जुमले हैं।
या सवाल उठता है कि इससे सीबीआई और पोलिस को सांस्थानिक रूप से कोई मजबूती मिली या उसकी छवि और व्यवस्था को ही नुकसान पहुंचा और क्या सिर्फ केंद्रीय सरकार के विरोध के कारण ही सभी संस्थाओं को दांव पर लगा देने की छूट है जबकि सबको पता है कि इन संस्थाओं के जरिये ही शांसन व्यवस्था कायम होती है। दरअसल लड़ाई में मोहरा कोई भी बने इसकी बिसात आगामी लोकसभा चुनाव है और दांव पर है प्रधानमंत्री की कुर्सी। पिछले चुनाव में उत्तर प्रदेश समेत हिंदी पट्टी के राज्यों ने वर्तमान सरकार के प्रतिनिधियों पर खूब प्यार लुटाया था पर दक्षिण पश्चिम बंगाल आदि में अपेक्षित सफलता नही मिल सकी थी। हिंदी पट्टी में सर्वाधिक उभार के बाद ही भाजपा ने समझ लिया था कि अगले लोकसभा चुनाव में उसे शायद उतनी सफलता न मिले, इसलिए यहां होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए उसने दूसरे राज्यों में प्रयास शुरू कर दिया था। इसमें उसे सबसे ज्यादा उम्मीद 42 सीट वाले पश्चिम बंगाल और 21 सीट वाले उड़ीशा से है जहाँ पिछले चुनाव में भाजपा को ओडिशा में 1 सीट और बंगाल में 2 सीट ही जीत पाई है।
इधर दोनों ही राज्यों में भाजपा मजबूत विपक्ष बनकर उभरी है और यहां पहले से स्थापित पार्टीयों को पीछे धकेल कर नंबर 2 की पोजिशन ले ली है और पार्टी के पास करिश्माई चेहरा नरेंद्र मोदी का होने से डरे दल इसे रोकने के लिए ये सारी कवायद करते नज़र आ रहे हैं। पिछले दिनों पश्चिम बंगाल में हुए पंचायत चुनाव में टीएमसी ने सभी 19 जिलों की 2467 पंचायत सीटों पर कब्जा जमाया और बीजेपी 386 सीट जीतकर दूसरे स्थान पर रही जबकि टीएमसी से पहले कई दशक तक शांसन करने वाली माकपा को 94 सीट ही नसीब हुई। इससे पहले हुए नगरीय निकाय चुनाव में सभी 7 पर कब्जा जमाया था और 148 में से 140 वार्ड में जीत दर्ज की थी पर अधिकतर पर बीजेपी दूसरे स्थान पर थी। इससे राज्य में तृणमूल के लिए खतरे की घंटी बज गई है क्योंकि राज्य में उसकी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी बन चुकी है और दुसरे राज्यों मेंक्षेत्रीय दलों की तरह हाशिये पर जाने से बचने के लिए तृणमूल को उसे रोकना होगा। ऐसे में यह सारी कवायद खुद को प्रधानमंत्री मोदी के सामने मजबूत दिखाने की कवायद का हिस्सा नज़र आ रहा है क्योंकि यूपीए2 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कमजोर होने और मोदी के फैसले लेने में मजबूत होने की छवि का भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने में अहम योगदान रहा था। इ
विपक्षी दलों की ओर से प्लान बी पर भी काम किया जा रहा है जिसमें न भाजपानीत एनडीए की सरकार बने न कांग्रेसनीत यूपीए की, बल्कि इनसे अलग बाकी दलों की गठबंधन सरकार बने ऐसे में पूर्व में हुए इन्द्र कुमार गुजराल और hd देवगौड़ा वाले प्रयोग के मुताबिक कइयो को अपने लिए संभावना दिखती है। ऐसे में अंदरखाने सब अपने समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं। बंगाल में ममता खुद को मोदी से टक्कर लेते दिखना चाहती हैं तो महाराष्ट में पवार और उत्तर प्रदेश में माया की हसरत किसी से छिपी नहीं है। वहीं दक्षिण में केसीआर और चंद्र बाबू नायडू अपनी गोटियां बिछा रहे हैं। दिल्ली के केजरीवाल तो मोदी के खिलाफ चुनाव तक लड़ चुके हैं। इसमे जांच एजेंसियों से लेकर चुनाव आयोग तक को निशाना बनाये जाने से कोई झिझक नही रहा है। इसमें किसी को चिंता नहीं है कि संस्थानों पर से आम जनता का विश्वास उठ गया तो इनकी लगाई आग बुझाए न बुझेगी। फिर कुर्सी पर कोई भी क्यों न हो।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2019

सदन में मोदी मोदी और राहुल जागो - राहुल जागो के लगे नारे


चुनावी साल में नई सरकार के गठन से पहले के लिए बहुप्रतीक्षित देश का अंतरिम बजट पेश हो गया। अभी कई दिन तक विद्वान इसकी मीमांसा करते रहेंगे। पर जैसा की समझा जा रहा था की बीमारी के इलाज के लिए कड़वी गोली देने पर भरोसा करने वाले "डॉक्टर" मोदी की टीम ने इस बार कड़वी गोली से परहेंज किया और खूब मीठी गोली खिलाई। इसी के साथ वोटों की खेती के लिए चुनावी जमीन पर भरपूर पैदावार वाले बीज भी बो दिया। इसी का नक्तीजा है कि भले ही पक्ष बजट का हमेशा समर्थन और विपक्ष विरोध करता रहेगा पर वोट देने वाले हर वर्ग के लिए बजट में कुछ। न कुछ है। इसी कारण वित्त मंत्री के बजट भाषण के दौरान लगातार एक मिनट से ज्यादा तालियां बजती रहीं। यही कारण है कि सदन में मोदी मोदी के नारे गूंजते रहे तो राहुल जागो राहुल जागो की गूंज भी सुनाई दी। इसी के साथ विपक्ष के नेताओं के चेहरों की हंसी भी गायब थी। कुल मिलाकर यह बजट सवर्ण आरक्षण, आयुष्मान भारत कई और योजनाओं की अगली कड़ी में चुनाव के लिए मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक साबित हो सकती है। राहुल जागो राहुल जागो का नारा सत्ता पक्ष का खुद पर भरोसा दिखाता है तो तब तक विपक्ष का विरोध न करना उनके हैरान होने की ओर इशारा करता है। अभी बजट की मीमांसा विद्वान और राजनीतिक दल अपने हिसाब से और अपने लाभ हानि के हिसाब से लोगों के सामने रखेंगे पर आम तौर पर बजट भाषण सुनकर और कुछ विशेषज्ञों को सुनकर राय बनाने वाले वर्ग की बांछे खिल गई है। अब तक विपक्ष जिन मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा था सरकार ने उन्हीं पर इलाज और मरहम की शायद कोशिश की है। बजट में दो एकड़ तक वाले किसानों के लिए सालाना ६००० तीन किश्तों में देने की बात कही गई है यह सहायता ऊंट के मुंह में जीरा है पर जैसा हमारे यहां कि संस्कृति बन गई है कि लोग महज कुछ रुपयों के प्रत्यक्ष फायदे को ही फायदा मानते हैं। उनको यह खुश करेगी। खास बात यह है शायद पहली बार ऐसा हो रहा है कि कोई योजना बैक डेट से लागू की जा रही है। इस योजना को संभवतः पिछले दिसंबर २०१८ से लागू की रही है। मतलब चुनाव से पहले एक किश्त नियमो में आने वाले किसानों के खाते में पहुंच जाएगी। इससे बड़ी संख्या में किसानों को लाभ होगा, दूसरी और योजनाओं का भी धीरे धीरे पता चलेगा। इधर दूसरी अन्य कल्याणकारी योजनाएं चलती रहेंगी। और बहुत सारी मई के बाद आने वाले पूर्ण बजट में और इससे पहले चुनावी घोषणा पत्र में सामने आएंगी। कुल मिलाकर वोटों की खेती की खूब कोशिश की गई है बशर्ते यूपी चुनाव के दौरान अखिलेश सरकार की लैपटॉप योजना सा हश्र एन हो। सरकार ने मध्यम वर्ग, मझोले व्यापारियों नौकरी पेशा लोगों को भी रिझाने की कोशिश की है, जो संख्या और वोट के हिसाब से काफी बड़ा हिस्सा है। इस तरह वोट का यह बड़ा कोकतेल बनाता है खास तौर से सरकारों के खिलाफ माहौल बनाने में इस वर्ग का बड़ा हाथ होता है क्योंकि बड़े सामाजिक वर्ग में इसकी पहुंच और इसका असर होता है। सरकार ने आयकर स्लैब बढ़ा दिया है अब ५ लाख तक आमदनी वाले व्यक्ति को कोई कर नहीं देना होगा। साथ कुछ निवेश कर साढ़े सात लाख तक की आमदनी वाले लोग भी आयकर देने से बच जाएंगे। इसके इससे ऊपर की आमदनी वाले स्लैब से छेड़छाड़ न कर बड़े लोगों की हतैशी होने के आरोप से भी बचने की कोशिश की गई है। साथ ही क्यों का त्यों रखकर उसे नाराज भी नहीं किया गया है। Gst council ki agli baithak men भी कमी का संकेत है। इसके अलावा राजकोषीय घाटा आदि कम करने के ऐलानों से उद्योग जगत भी हर्षित है । आम और मध्यम वर्ग के लोगों ने तो इसका स्वागत किया ही है। बजट के दौरान हर सेगमेंट के जिक्र के साथ इन विकास कार्यों से युवाओं को रोजगार मिलेगा और मिल रहा है बताकर वित्त मंत्री ने युवाओं में भरोसा जगाने की कोशिश की है। उन्होंने बजट भाषण में ५ से अधिक बार युवाओं को रोज़गार का जिक्र कर बताने की कोशिश की है कि युवा उसके केंद्र में हैं। साथ ही यह विपक्ष के आरोपों पर सफाई भी थी नजर आ रहा था कि सरकार इस मोर्चे पर दबाव में है। फिलहाल केंद्र सरकार ने अपनी बैटिंग कर डी है देखना है कि उसे कितने ran मिलते हैं पर समय के अभाव में बजट और चुनाव पर फिलहाल इतनी ही बातें और बाकी बातें बाद में।