विचार

सोमवार, 16 जुलाई 2018

कुछ सवाल न्याय के आंगन से भी

भारतीय न्यायपालिका का गौरवशाली इतिहास रहा है, इसकी निष्पक्षता और निर्णय दुनिया की दूसरी अदालतों के लिए नज़ीर रही हैं। इसलिये दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में जहां करोड़ों तरह के स्वार्थ और आकांक्षाओं के बीच किसी संस्थान पर सवाल खड़ा कर दिया जाना आम है, न्यायपालिका विश्वशनीयता की कसौटी पर हमेशा खरी उतरी है, नतीजा जनविश्वास उसके साथ है। यही कारण है कि जब भी न्यायपालिका का दूसरी संस्थाओं से टकराव हुआ, संप्रभु जनता न्यायपालिका के साथ खड़ी दिखाई दी और उसे ताकत दी है। न्यायपालिका ने भी अपने संविधान के संरक्षक की भूमिका निभाई है।
 मगर, बीते कुछ सालों में न्यायपालिका से जुड़े कुछ ऐसे प्रकरण सामने आए जो इसके स्वर्णिम इतिहास को धूमिल कर रहे हैं। इस पर न्याय के पहरुओं को विचार करना चाहिए। इसमें पूर्व जस्टिस करनन विवाद ने हमारी काफी जग हसाई कराई। ऐसे मामले पर विचार की आज अनिवार्यता है साथ ही उनके आरोपों की जांच भी जरूरी है। खैर इस प्रकरण का पटाक्षेप अवमानना मामले में उनकी गिरफ्तारी से हुआ। लोगों ने सोचा होगा चलो राहत मिली लेकिन फिर कई जस्टिस की ओर से मीडिया में प्रेस कांफ्रेंस कर मुख्य न्यायाधीश पर कुछ विशेष मामले विशेष पीठ को भेजने के आरोप लगाए गए। इसने पूरी न्यायपालिका को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया, जिससे सवाल खड़े करने वाले भी नहीं बच सके। वजह तो इस मामले में राजनीतिक दलों का कूदना था मगर ये जमीन इनको माननीय जस्टिस लोगों ने ही उपलब्ध कराई थी। जनता को जो संदेश मिला साफ था राजनीति न्यायपालिका में प्रवेश कर गई है। क्योंकि जैसा दिखाया जा रहा था कि ये सवाल सिर्फ मुख्यन्यायधीश पर है प्रकान्तर से उन्हें भी आरोपी बना दिया गया जिन जज को तथाकथित विशेष मामले भेजे गए और आरोप लगाने वालों के क्रांति के संदेश को बहुसंख्यक ने शायद ही स्वीकार किया हो।अच्छा होता यह मामला मीडिया में लाने की बजाय आपस में बने मैकेनिज्म से सुल्टा लिया जाता। इन विवादों से कुछ और हुआ हो या न जनता के विश्वास को ठेस जरूर पहुंची है। यही कारण है इस विवाद पर संभ्रांत वर्ग भले ही चर्चा करे जनता में हलचल नहीं हुई।
 एक ऐसा ही मसाला और मुंह बाए खड़ा है जो आदर्श स्थिति से कोसो दूर जा रहा है। वह है उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश की सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति का, कोलेजियम बार बार इनके नाम पर ही अटकी है और केंद्र सरकार अपने कारण गिनाकर उनके नाम पर राजी नहीं है। इससे दूसरे रिक्त पदों पर भी प्रक्रिया अटकी पड़ी है, इस रसाकसी में पीड़ित कौन हो रहा है। क्या कोलेजियम या सरकार, नहीं आम लोग, जो न्याय की आस में उम्र गुजार रहे हैं और जज की कमी से उनके मुकदमो पर फैसला नहीं आ रहा है। न्याय में देरी न्याय नहीं के बराबर खुद कोर्ट ने कई बार दोहराया है फिर इसके जिम्मेदार कौन हैं सभी पक्ष खुद ही बैठकर तय कर लें। क्या इसके लिये जिद जिम्मेदार नहीं है। कोलेजियम किस वजह से सिर्फ उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश को लेकर अड़ा है यह शायद कोलेजियम ही जनता है मगर सरकार ने तो उनके प्रोन्नति पर राजी न होने के तर्क जूनियर होने, क्षेत्रीयता आदि के सार्वजनिक कर दिए हैं। ऐसे में सरकार का पलड़ा तो भारी नज़र आता है, फिर सरकार जनता की प्रत्यक्ष प्रतिनिधि है उसे दरकिनार करना हिंदुस्तान जैसे मुल्क में तो ठीक नहीं। जिद में तमाम दूसरे प्रतिभाशाली जज को अनजाने में ही कमतर आंका जा रहा है।ऐसे में सबसे अच्छा है कि सभी संबंधित पक्ष अपनी गौरवशाली विरासत में कुछ जोड़ें पूर्वजों के लिए अफ़सोस का वायस न बनें, कम से कम जो शपथ लिए हैं उसकी लाज रखें।

बुधवार, 13 जून 2018

भारतीय सेवा के कुछ पदों का विशेषज्ञों के लिए खोलना

भारतीय सूचना सेवा के अफसरों ने देश के लिये काफी काम किये हैं खास कर योजनाओं के क्रियान्वयन में। मगर इस सेवा के लोगों में शिथिलता आती जा रही है, खासकर नवाचार के संबंध में, कोई नया विचार अफसरों की ओर से आता नज़र नहीं आ रहा है जिससे बेहतर भविष्य की उम्मीद की जा सके। ज्यादातर घिसी पिटी परियोजनाएं ही सामने आ रही हैं जो थोड़े बहुत बदलाव से अरसे से चल रही हैं अब देश की जरूरत नवाचार और नवोन्मेष मांग रही है, खासतौर से विशेषज्ञता वाले क्षेत्र में।
  ऐसा लगता है कि तमाम योजनाओं में नवाचार की कमी की वजह अफसरों की सीमाएं हैं, अभी आईएएस बनने वाले अफसरों में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है जिनके पास तकनीकी विशेषज्ञता की कमी है और अब तमाम योजनाओं में तकनीक का इस्तेमाल होता है ऐसे में इसके लिए एक अलग चैनल तैयार करना पड़ा है जो अपने ईगो तालमेल की कमी आदि के कारण या तो नवाचार को सामने नहीं आने देता या फाइल में लटका देता है। इसके साथ निजी क्षेत्र में तम प्रतिभाएं ऐसी हैं जिनके पास नए विचार हैं, इनको सरकार को साथ जोड़ने की जरूरत है ताकि देश को उनका लाभ मिले।
इससे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने अच्छी पहल की है। सरकार ने केंद्रीय सेवा के संयुक्त सचिव स्तर के तकरीबन 10 पदों पर सीधी भर्ती की योजना बनाई है, इससे इस सेवा में खुलापन आएगा, विशेषज्ञ नियुक्त किये जा सकेंगे। भर्ती चूँकि संविदा पर होगी इसलिए नौकरी बचाने के लिए इन्हें आउटपुट भी देना होगा।हमारे यहां कार्य संस्कृति ऐसी बन गयी है कि नियमित स्टाफ कार्य करने की कोशिश भी नहीं करना चाहता नहीं तो लोगों दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ते। उदाहरण सामने है देश में सरकारी विभागों कंपनियों का हाल देख लीजिए वो ज्यादातर नुकसान में ही होंगी वही कर्मचारी निजी कंपनी के कर्मचारी के रूप में कार्य करने लगते हैं तो आउटपुट देने लगते हैं। ऐसा लगता है कि सोच बन गई है कि अधिकार चाहिए बेशुमार काम के लिये न ठहराओ जिम्मेदार।
बहरहाल कुछ विघ्नसंतोषी लोगों को इस पर भी सुबहा है। ये इसको भी आरक्षण से जोड़कर देख रहे हैं मगर प्रशासनिक सेवा पर सवाल तो है। कुछ लोग समझ रहे हैं कि इससे दिक्कत आएगी, मगर मेरा कहना है कि इन विशेषज्ञों के बॉस तो नियमित आईएएस ही रहेंगे हालांकि चैनल काफी ऊपर का होने से सरकार की निगरानी रहेगी और इनकी फाइल आईएएस बेवजह लटका नहीं पाएंगे। इसलिए मुझे तो यह कदम ठीक लगता है। अब भला डीआरडीओ और मेडिकल में कामकाज की जीम्मेदारी इस फील्ड से इतर के व्यक्ति को दे देंगे तो उसका क्या हाल होगा। इस हिसाब से सरकार के इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए। 
रही बात इससे आईएएस के नाराज होने की तो हो सकता है कि ये विचार भी किसी आईएएस का ही हो और यह भी की इसी नाराजगी और कुछ मामलों में अप्रभावी होने की ही वजह से तो सीधी भर्ती की जरूरत पड़ रही है।

गुरुवार, 31 मई 2018

भारतीय राजनीति में बेवजह के विवाद

लग रहा है विवाद करना भारतीय राजनताओं का शगल बन गया है। ताजा विवाद पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपुर कार्यालय में होने वाले कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संबोधित करने का न्योता स्वीकार करने का है। इसको लेकर कांग्रेस के सांसद संदीप दीक्षित ने सवाल उठाए हैं और आलोचना की है। उनका कहना है कि ये उनकी पार्टी की विचारधारा के करीब नहीं है इसलिये पूर्व राष्ट्रपति को वहां नहीं जाना चाहिए। क्या ये देश के उन राष्ट्रपति महोदय की सोच का विस्तार नहीं है जिन्होंने खुद को प्रधानमंत्री का सफाई कामगार तक बता दिया था। कांग्रेस ने स्पष्ट तो कुछ नहीं कहा मगर दीक्षित के बयान को खारिज भी नहीं किया।
ये एक तरह से पूर्व राष्ट्रपति के अभिव्यक्ति की आज़ादी पर अंकुश लगाने की कोशिश भी है। यह हाल तब है जब देश में जब तब अभिव्यक्ति की आज़ादी का रोना रोया जाने लगता है और हस्ताक्षर अभियान चलाए जाने लगते हैं और हस्ताक्षर करने वालों में ये कुछ लोग कॉमन होते हैं।
ये हाल तब है जब हम पाकिस्तान से बात करने के लिये तैयार रहते हैं जबकि वो हमें कितने जख्म देता है। पिछले दिनों पूर्व कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर के घर पाकिस्तान के शायद पूर्व अफसर के साथ गुफ़्तगू ने खूब सुर्खियां बटोरी थी। अभी पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व चीफ दुर्रानी और रा के पूर्व चीफ दुलत की किताब के विमोचन में कांग्रेस नेता पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक शामिल हुए थे। जो चीज हम अपने लिए चाहते हैं वो दूसरों को क्यों नहीं मिलना चाहिए। अलगाववादियों से भी बात करने के लिये होते हैं फिर आरएसएस से जुड़े लोगों से बात न करना एक तरह की असहिष्णुता ही है।
एक बात और कि अगर आरएसएस के किसी भी विचार से आपको इख़्तिलाफ़ है तो उससे बात कर ही प्रभावित कर सकते हैं। फिर जब देश के करोड़ों लोग जिस संगठन से प्रभावित हों या जुड़ें हों उससे

मंगलवार, 29 मई 2018

चुनाव में हार का डर औऱ ईवीएम पर हायतौबा

देश में हर चुनाव में सबसे ज्यादा निशाना ईवीएम आजकल बनाई जा रही है। आमतौर पर चुनाव के बाद अपनी हार की वजह छिपाने के लिए हमारे यहां उसको बलि का बकरा बनाया जाता है। और कई बार पहले से ही इस बात की गुंजाइश रखी जाती है कि जनता द्वारा दरकिनार किये जाने पर ईवीएम को दोषी क़रार दिया जाय।हालाँकि कोई राजनीतिक दल या इस मेधावी देश का एक भी मेधावी इस पर अपने खयाली पुलाव को सिद्ध नहीं कर सका है।।जबकि पिछले चुनाव में ऐसी ही आवाज उठने पर चुनाव आयोग ने गड़बड़ी सिद्ध करने की चुनौती भी दी तंगी।
28 मई 2018 को देश भर में हुए उपचुनावों में खासकर कैराना उप चुनाव जहाँ विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों की इज़्ज़त दांव पर लगी है। इस चुनाव में मतदान से पहले  ईवीएम में जुड़ने वाली एक और मशीन जिसे वीवीपैट कहा जाता है जो मतदाता  को इलेक्ट्रॉनिक रशीद देती है कि  मतदाता ने किसे वोट दिया में कुछ खराबी पाई गईं।संभवतः मशीन चली नहीं इससे मतदान में कुछ देरी हुई मगर राजनीतिक दल ऐसे प्रचारित कर रहे हैं जैसे ईवीएम खराब थी।जबकि वीवीपैट को कुछ देर में बदल दिया गया होगा।
वहीं राजनीतिक दलों खासकर विपक्ष को बैलेट पेपर पर बहुत भरोसा जग रहा है और विपक्ष ऐसा प्रचारित करता है कि जनता को ईवीएम पर भरोसा नहीं है। हालांकि बैलेट पेपर से मतदान लोकतंत्र के लिए ज्यादा अहितकर है। खासतौर से जब हम सुधार का एकचरण पर कर चुके हैं तो दरकिनार कर दिए गए लोगों की चालबाजियों के चक्कर में हमें अपनी चुनाव प्रारणी में अतार्किक छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए।
हालांकि जनता को ईवीएम की खासियत जरूर बतानी चाहिए ताकि वो किसी चालबाजी में न फंसे। फिलहाल बैलेट पेपर से चुनाव में कुछ दिक्कतें हैं। पहला की इससे मतदान में बड़ी संख्या में वोट अमान्य हो जाते हैं क्योंकि अशिक्षित लोग सही से मोहर नहीं लगा पाते।स्याही इधर से उधर लगने या फैल जाने पर ये दिक्कत आएगी।
वहीं इससे वोट में कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ेगी क्योंकि कई बार अष्पष्ट स्याही लगने पर मतगणना कर्मी तय करेगा कि वोट सही है या नहीं अपने विवेक से और देश में डंडे के जोर से ही निष्पक्षता आती है जैसा चुनाव आयोग की कार्यवाही का डर।साथ ही हमारे यहां अशिक्षित लोगों का प्रतिशत काफी है।
वहीं बैलेट पेपर से मतदान और मतगणना में समय ज्यादा लगेगा और ज्यादा समय मतगणना में ज्यादा गड़बड़ी के मौके देगा।फिर बैलेट पेपर के दौर में तमाम बूथों पर बूथ कैप्चरिंग , चुनाव को प्रभावित करने के लिए बैलेट बॉक्स में पानी डालकर दोबारा चुनाव कराने के हथकंडे अपनाने के ये आरोप ईवीएम पर सवाल उठाने वाले विपक्षी दलों के तमाम स्थानीय नेताओं पर लगते रहे हैं। और आपमेंसे कई इसके गवाह होंगे या इसके किस्से सुने होंगे।ऐसे में दरअसल ईवीएम पर सवाल इनकी नीयत पर सवाल है।
मगर चिंताजनक है कि कैराना चुनाव में सत्तारूढ़ दल के लोगों की ओर से भी सवाल उठाए गए हैं हालांकि उनकी ओर से कर्मचारियों पर सवाल उठाए गए हैं मगर खबरों में इस तरह से प्रकाशित किया गया है जैसे उन्होंने भी ईवीएम पर सवाल उठाए हैं जबकि विपक्षी दल भी वीवीपैट की बात कर रहे हैं जो एक अलग मशीनहै।
इसके अलावा मतदान से पहले हर बूथ पर सभी प्रत्याशी के एजेंट की मौजूदगी में मॉक पोलिंग होती है और एजेंट के ओके करने पर मतदान शुरू होता है। ऐसे में गड़बड़ी होने पर पता चल जाएगा। इसलिये स्वार्थ की ख़ातिर संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल ठीक नहीं।


रविवार, 27 मई 2018

कहाँ जा रहे हैं हम एक समाज के रूप में

भारत देश विकास के आधुनिक मानकों पर तेजी से बढ़ रहा है, मगर भागदौड़ के बीच हम कुछ खोते भी जा रहे हैं और वो है मूल्य। भारतीय संस्कृति की जो ताकत है वही हम खो रहे हैं। मैं ये सब फिलहाल बहुत ही मामूली परिप्रेक्ष्य में बात करूंगा।
आज से कुछ अरसे पहले हमारे यहां समाज का बड़ा असर था लोग दूसरों के सुख दुख से प्रभावित होते थे और अपने स्तर पर अच्छा और मदद की कोशिश करते थे नतीजतन तमाम धर्मशाला स्कूल आज भी दिखाई देंगे जो लाभ के मद्देनजर नहीं बनाए गए मगर आज ये स्थिति नहीं है।
आज स्वार्थपरता चरम पर है और सब अपने और लाभ के लिये हो रहा है। ज्यादातर लालची ढोंगी और पाखंडी हैं और यह धर्म जाति की सीमा को तोड़कर एक तरह से है। लोगों के पास इतने मुखौटे हैं कि किसी व्यक्ति का असली स्वरूप क्या है कहना मुशकिल है। हाल यह है कि कानून तोड़ना लोगों को रोमांच दिलाता है, हालांकि खुद पीड़ित होने पर यही लोग, कानून न्याय समाज की दुहाई भी देते हैं।
 50 साठ साल पहले देश में इतने धनाढ्य लोग कम रहे होंगे मगर सामाजिक कार्य ज्यादा दिखाई देंगे अब करोड़पतियों की लंबी सूची है और हर कंपनी के लिए लाभ का एक हिस्सा सोसल रिस्पांसिबिलिटी के लिए खर्च का नियम है मगर कोई खर्च करता दिखाई नहीं देता और उल्टा गरीबों के हिस्से का धन लोन के रूप में चुराकर भागने का चलन बढ़ गया है।
 फ़िलहाल मैं इसको जिस बात से जोड़ना चाहता हूं। वो यह है देश में शिक्षा के अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों में गरीब तबके के लिए संभवतः 25 %सीट आरक्षित हैं मगर एक भी स्कूल गरीबों को दाखिला देने को तैयार नहीं दिखते। सख्ती पर गुरुग्राम जिले में इडब्लयूएस में किसी तरह दाखिला दिया मगर अभी भी सैकड़ो बच्चों को टरकाया जा रहा है। किसी को स्कूल के स्तर से कमतर बताया जा रहा है तो किसी पर और कुछ आपत्ति लगाई जा रही है।इधर शनिवार को cbse 12th के परीक्षा परिणाम जारी किए गए तो पुष्पा नाम की छात्रा ने 77% अंक पाये उसको ईडब्ल्यू एस में ही दाखिला मिला था और उसने कालेज का नाम रोशन किया। इससे स्तर की आपत्ति तो सवाल के घेरे में है।ऐसी और भी कहानियां होंगी।
एक और बात मैं एक वीडियो देख रहा था।इसमें सरकारी स्कूल की बच्चियां गीत के माध्यम से गर्भ में बालिका हत्या की समस्या को उठाती हैं और समाज को सोचने को मजबूर करती हैं। इससे पता चलता है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं है जरूरत है उसे तराशने की और अपनी जिम्मेदारी निभाने की और इंसान बनने की।

शनिवार, 19 मई 2018

कर्नाटक का नाटक

कर्नाटक का सियासी ड्रामा अपने आखिरी दौर में है। इससे पहले चुनाव प्रचार और उसके पहले जो हुआ शर्मनाक था तो अब जो हो रहा है वह भी खतरनाक है। लोकतंत्र के चोर दरवाजों का जमकर इस्तेमाल हो रहा है। हालांकि समय का फेर तो देखिए कुछ लोगों को उम्मीद नहीं रही होगी कि ऐसा भी समय आ सकता है कि उनके बनाये गलियारे का कोई और इस्तेमाल करेगा और उन्हें न्याय का राग अलापना पड़ेगा। फ़िलहाल आम लोग एक बार फिर सत्ता के लिये हर तरह की अनीति देखने के लिए विवश है।
 फ़िलहाल चलते हैं 2018 के परिणाम पर आम जनता बीजेपी को 104, कांग्रेस को 78, निर्दलीयों को 2, जनता दल एस गठबंधन को 38 सीट दीं। मतलब जता दिया किसी से ज्यादा खुश नहीं है, मगर जैसे हर कर्म का फल भुगतना पड़ता है वैसे जनता के इस निर्णय का फल तो उसे भुगतना था मगर इतनी जल्दी होगा पता नहीं था। अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियां इस क़दर उजागर होगा पता नहीं था। पहले जिसके खिलाफ जनादेश मांगा अब गठबंधन,  फिर राज्यपाल के फैसले औऱ इतिहास का दोहराया जाना सब पर सवाल है।

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

दलित साधु को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा

आज की सुबह अखबार की एक खबर ने बरबस ही मेरी यादों की सुइयों को कुछ पीछे अतीत में पहुंचा दिया।ख़बर कहो या खिड़कियां खोले जाने का उपक्रम, जिसे प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत: जिसका अर्थ सम्भवतः है कि विचारों की खिड़कियां हमेशा खोलकर रखें ताकि दुनिया के हर कोने से सदविचार आ सकें।
    दरअसल, एक घोषणा हुई थी प्रयाग से, यहां अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने यमुना तट पर एक दलित साधु को महामंडलेश्वर बनाने की घोषणा की थी। वैसे तो साधु की कोई जाति नहीं होती, हमारे यहां यही आधार है मगर देश में फिलहाल जो माहौल है और कुछ लोग सत्ता के लिए इस हद तक गिर चुके हैं कि सामाजिक विभाजन का कोई मौका नहीं छड़ते इसलिए जोर देना पड़ रहा है कि सब देख लें उम्मीदें अभी बाकी हैं और सत्ता के स्वार्थ में जिस धर्म और संस्कृति को लांछित किया जाता है अबकी एकता सम्मान की आवाज वहीं से उठी है।
ये सब इसलिए याद आ रहा है कि अक्सर तमाम राजनीतिक लोग दलित साथियों को भड़काया जाता है कि उनकी समस्याओं की वजह उनका धर्म ही है। कुछ घटनाएं हो सकती हैं उस पर कार्रवाई भी होनी चाहिए, मगर इसके पीछे व्यक्ति विशेष की आपराधिक मानसिकता ही मानना चाहिए। अभी मुझे हाल की एक घटना याद आ रही है। दुनिया भर में न्याय का बुनियादी सिद्धान्त है कि 10 अपराधी छूट जाए मगर एक निरपराध सजा न पाए। इसलिये संभवतः कानून की आंखों पर पट्टी बंधी होती है ताकि वह सिर्फ सबूत की बिनाह पर फैसले दे।
इसी मकसद से सर्वोच्च न्यायालय ने एससी एसटी एक्ट के कार्यान्वयन के लिये जांच पर जोर दिया था ताकि अगर ग़लत आरोप लगाए जाएं तो निरपराध को सजा न मिले। मगर तमाम लोगों ने इसे ऐसे प्रचारित किया गया कि जैसे आरक्षण खत्म कर दिया गया और लोगों को भड़काकर देश को ठप कर दिया गया। अब भी इस तरह की कोशिश जारी है। इस माहौल में ऐसे कदम उन लोगों के लिये तमाचा हैं जो सत्ता के लिए सामाजिक विभाजन से बाज नहीं आते और देश हित को तिलांजलि दे देते हैं।
फिलहाल प्रयाग से जो फैसला हुआ है वो हमारे सामाजिक ताने बाने को मजबूत करेगा। उम्मीद करेंगे ऐसे और फैसले अलग अलग क्षेत्रों से आए ताकि ये मिसाल और खबर न हो बल्कि आम बात है। यही देश की एकता अखंडता और हमारी सांस्कृतिक विशेषताओं का अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक लाभ पहुंचना होगा।

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

विकास यज्ञ

चहुं ओर विकास के लिए

सरकार ने कथा सुनी

पूंजीपतियों ने किया मंत्र प्रवाह

और अरमान हमारे हवन बने

हम तो  श्रो ता, द्

दर्शक रहे हमको मिला प्रसाद
 


इस यज्ञ का धुंआ यहीं तक फैला

हम देख रहे अपनी ओर शांत आकाश

किसी ने बताया हवा के साथ

तुम्हारी ओर ही आएगा

होगी स्वर्ग कुसुमों की बरसात

बीते दिन पर दिन... अब तो आस भी छूटी

अब ऐसे ही फफक फफक कटेगी रात।।

सोमवार, 20 जून 2016

गर्मी मौसम रहा दुखीराम के अमरैयाँ मे पेड़ के शाखा से बड़े-बड़े गुच्छा में आम लदे रहे. घर के सयान उनका देखई के खातिर बगीचा में भेजी देहें लेकिन जइसा दुखीराम आदत रही बगीचा में पड़ी खटिया पर पड़े-पड़े देश दुनिया के बारे में सोचई लगे.उनका दिमाग में समय-समय पर netaa logan dwaaraa जज साहेब लोगन पर जवान आरोप लगाई जाथ उही पर उनका मन लगा रहा

मंगलवार, 31 जनवरी 2012

साया

साये साथी धुप के 
घुप अँधेरे में 
आदमी अकेला

रिश्ते हैं 
नींद के सपने 
आँखें खुली 
दिल रोया

गफलतों उधेड़बुन में 
आदमी का दर 
साया है

सोमवार, 21 नवंबर 2011

जिंदगी


खुले पन्ने
बिखरे शब्द
धुंधली आकृति
स्याह कागजों में

                 लेखक, पाठक, श्रोता
                 दर्शक न कलाकार
                  बस समय,
                 चौराहे, सनसनाहट
                  आशंका हल नहीं
                   किताब में

                                      अदीप्त, अपठित
                                    संघर्ष, भुलावा, छलावा
                                    प्रेम, नफरत, क्षोभ, हार-जीत   
                                    धोखा, थकन, टूटन, चुभन, अंधेरा
                                    गड्डमड्ड हो रही है जिंदगी
                                    व्याकरण की तलाश में

बुधवार, 10 अगस्त 2011

जनाक्रोश की अभिव्यक्ति सिंघम

अन्ना का आंदोलन, सिस्टम और सिंघम में समानताएं

यह सुखद संयोग है कि देश की धड़कन बन चुके 'भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिलÓ के लिए आंदोलन और अजय देवगन अभिनीत सिंघम फिल्म रीलीज हुई। बारीकी से देखने पर फिल्म के कई किरदार आज के हमारे समाज में घूमते-फिरते दिखाई देंगे।
अन्ना के आंदोलन को देश के लगभग हर वर्ग (भ्रष्टाचारी अथवा उनसे किसी भी तरह का कोई सहानुभूति रखने वालों को छोड़कर) का समर्थन मिल रहा है। उसी तरह सिंघम को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया है। कई नई फिल्मों की तरह सरकार के कई हथकंडों को जनता ने (आरोपों और धमकियों को) खारिज कर, अण्णा पर भरोसा जताया है। यह फिल्म करीब दस दिन में ही ६५ करोड़ की कमाई कर चुकी है। इस फिल्म को दर्शकों का समर्थन करवट ले रहे देश के जनाक्रोश की ही अभिव्यक्ति ही है।
अजीब संयोग है कि सिंघम में ईमानदार पुलिस अफसर की आत्महत्या के बाद उसकी पत्नी का सिस्टम और सरकार सपोर्ट नहीं करती, बल्कि मंत्री महिला और उसको वहां तक लाने वाले को बुरा-भला कहता है। वैसे ही आज सरकार उसके मददगार अण्णा और उसके सहयोगियों पर अनेक आरोप लगा रहे हैं। तिल-तिल मरती आत्मा की आवाज किसी ने सुनी तो ङ्क्षसघम (जनता) ने और अण्णा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो रही है। यह जनाक्रोश ही है कि सिंघम में विलन को उसी के हथकंडे से मारने के बाद भी फिल्म को हजारों लोग देखने पहुंच रहे हैं। जनता आज भ्रष्टाचार को किसी भी हालत में खत्म होते देखना चाहती है, हथियार चाहे कुछ भी हो। यह अलग बात है कि इनमें से कुछ सिस्टम से नहीं लड़ सकते थे, कभी न चाहते हुए उसका हिस्सा बना दिए गए थे, या बन गए थे। लेकिन ये अपनी ताकत और इच्छा अण्णा को सौंप चुके थे। जैसी की फिल्म में लोगों ने सिंघम को अपना भरोसा अर्पित किया था।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

तो क्या लब आजाद होते

मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर देश दो फाड़ में बंटता जा रहा है। एक पक्ष अपने लिए देश की संसद से कुछ मांग रहा है तो दूसरा पक्ष इससे अपने 'अहम्Ó से जोड़ कर देख रहा है। गुरुवार को समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके साथियों ने लोकसभा में प्रस्तुत कठपुतली और बूढ़े लोकपाल विधेयक को प्रस्तुत करने के विरोध में मसौदे की प्रतियां जलाईं। अब तथाकथित जनप्रतिनिधि इसे संसद का अपमान बता रहे हैं। आजादी से पहले ऐसे ही अंग्रेज भी किसी भी विरोध प्रदर्शन पर ब्रिटेन की संसद और कानून का अपमान बताकर जनप्रतिनिधियों को जेल में डाल देते थे और यातना देते थे। इसके बावजूद जनता और जनप्रतिनिधियों ने संघर्ष का रास्ता चुना और अपने मन और विवेक की बात मानी, जिसका नतीजा निकला, कम से कम हम कहने को तो आजाद हो गए। ऐसे ही अंग्रेजों द्वारा बनाया एक कानून (नमक) को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने १९३० में तोड़ा था। यही नहीं राष्ट्रपिता द्वारा चलाए गए सारे आंदोलन किसी न किसी नीति या कानून के विरोध में ही थे, ऐसे में हम यदि उन गलत कानूनों का मानकर हक के लिए न लड़ते तो शायद ये लब भी आजाद न होते। सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, असहयोग आंदोलन आखिर किसकी रक्षा के लिए हुए, जो आज लोगों को अपनी बात रखने पर संसद का अपमान होने लगा और फिर तथाकथित जनप्रतिनिधि जन की भावना समझते तो क्या आज मसौदे की प्रति जलाने की नौबत आती, जबकि चर्चा का नाटक महीनों चला।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

तो इसलिए सिब्बल लोकपाल विरोधी हैं

मजबूत लोकपाल के लिए २०११ में जनता के आंदोलन के खिलाफ, यूपीए सरकार के सबसे मुखर (आंदोलन विरोधी) प्रवक्ता मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ही बनकर उभरे थे। लेकिन अब भ्रष्टाचार की लपटें उनतक पहुंच रही हैं। इस संबंध में सीपीआईएल(सेंटर ऑफ पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) ने कोर्ट में आवेदन देकर यूएएसएल एग्रीमेंट का उल्लंघन करने पर आरकाम पर लगाए गए ६५० करोड़ के जुर्माने को पांच करोड़ में बदलने का आरोप लगाया है। अब मामला न्यायालय में पहुंचने पर इनकी भूमिका की भी जांच हो सकती है। इसके साथ ही २-जी स्पेक्ट्रम मामले में अटार्नी जनरल जीई वाहनवती की भी मुश्किल बढऩे की संभावना है।

रविवार, 3 जुलाई 2011

लो अब दिल की बात जुबां पर आ ही गई

देश के सबसे ईमानदार नेता और हमारे प्रधानमंत्री ने रविवार को लोकपाल के मुद्दे पर आयोजित सर्वदलीय बैठक में मन को अपने लोगों के सामने खोलकर रख दिया। प्रधानमंत्री का मानना है 'लोकपाल बिल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कोई कमतर नहीं कर सकताÓ। हमारा संविधान एक दूसरे की संतुलन की व्यवस्था पर कायम है। मतलब साफ है सरकार नई पहल नहीं करना चाहती चाहे देश घोटाले दर घोटाले का दंश झेलता रहे। साथ ही सरकार लोगों को धोखा देने के लिए वैसा ही कोई लोकपाल चाहती है। जैसा हमारे संविधान में सीवीसी जैसा सम्मानीय पद है। सरकार ऐसा लोकपाल चाहती है जो बिना दांत का हो और किसी नेता और अधिकारी को केवल उपकृत किया जा सके। बस हिस्सा मिले बस। आज तक इस देश में एक भी बड़े नेता को सजा शायद ही मिली हो। साथ ही आजकल के परिदृश्य को देखकर तो प्रधानमंत्री के कहे एक-एक शब्द सही प्रतीत हो रहे हैं कि हमारी व्यवस्था संतुलन पर आधारित है, सब एक दूसरे को पुष्ट करते हैं, सारे कानून कमजोरों के लिए हैं। वैसे सरकार ने इस बैठक के जरिए एक अपूरणीय शर्त तो थोप दी है, कि सर्वसम्मति से मजबूत लोकपाल का कानून बनेगा। हमें मालूम है हमारे घरों में यदि एक पिता के दो संतान हैं तो उनमें शायद ही किसी मुद्दे पर सहमति बनती हो।