विचार

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

बंदिशों में है आजादी.

चुनाव आयोग ने चुनाव पूर्व सर्वे पर ४८ घंटे पूर्व रोक लगा दी है....यह प्रेस की अभिव्यक्ति की आजादी और जनता के सूचना के अधिकार दोनों पर बंदिश है...क्योंकि जनता के पास क्या इतनी ताकत (अधिकार)यह जानने की नही होनी चाहिए की उसका वोट असर कारक हो रहा है की नही.और नही हो रहा है तो अगले चरण में उसके लिए एकजुट होकर परिवर्तन की डगर पर चलने के लिए पहल कर सकें. या नेता यह मानते हैं की जनता इतनी बेवकूफ है की हर घटना का उसपर बुरा असर ही पड़ेगा....जबकि संविधान सभा में जब मताधिकार केवल पढ़े लिखे लोगो को देने की बात की गई तो नेहरू जी ने कहा था....जो अनपढ़ जनता अपनी आजादी के लिए लड़ सकती है.वह बुद्धिमान है और उसे भी अधिकार मीलना चाहिए.....फ़िर परदा क्यों॥यह शायद इसी देश में सम्भव है की एक साथ कोई चीज दी भी जाती है और नहीं भी।मतलब हम भूलें रहें इसके लिए झून्झूना पकडाया जाता है लेकिन उसमे से आवाज नही आएगी वह शोपिश ही रहेगा....इससे पूर्व सरकार ने भी इसी तरह के दिशा निर्देश जारी किए थे॥
निर्वाचन आयोग ने मीडिया के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा है, "चुनाव के दौरान यदि मतदाताओं के बीच जनमत सर्वेक्षण किया गया है तो एक चरण में होने वाले चुनावों में इसका प्रकाशन या प्रसारण पर मतदान ख़त्म होने के 48 घंटों पहले से रोक लग जाएगी."
कई चरण में होने वाले चुनाव के लिए यह रोक अंतिम चरण का मतदान ख़त्म होने तक जारी रहेगा ........निर्वाचन आयोग
आयोग के अनुसार, "यह रोक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया पर रहेगी"

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

मीडिया की कारगुजारी

मीडिया की भारी गलतियों की वजह से (सीधा प्रसारण ) आतंकवादियो को रणनीति बनाने में आसानी हुई । क्या मीडिया की यही जिम्मेदारी है ? जिसके सीधे प्रसारण के कारन कई नागरिको और पर्यटकों को अपनी जान गंवानी पड़ी । सवाल यह है की मीडिया कब अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगी ?

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

मानसिक दिवालिये पन के शिकार नेता (एक अपील अध्यक्ष जी के नाम)

यह माना जाता है की जब कोई सियार हुआ-हुआ करना शुरू करता है तो सारे सुरु कर देते हैं.मुंबई बम बिश्फोत के बाद जनता के बिरोध प्रदर्शनों के बाद ये आत्म्लुब्ध अकर्मण्य नेता तिलमिला गए हैं.और सारे के सारेएक ही सुर में बोलना शुरू कर दिए हैं।

कुछ नेता स्वयं को ही लोकतंत्र और प्रजातान्त्रिक संस्था समझाने लगे हैं.और अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर तिलमिला गए हैं।
नकवी ने कहा-कुछ संगठनो ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की जगह लोकतंत्र के खिलाफ जंग छेड़ दी है,इस तरह के प्रदर्शनों से वे लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैसा कर रहे है जम्मू कश्मीर में यही कम आतंकवादी कर रहे हैं.यह वक्त पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का है,नाकि प्रजातान्त्रिक संस्थाओं के खिलाफ असंतोष पैदा करने का ,साथ ही कहा कुछ महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं,उनमे और कश्मीरी आतंकियों में कोई फर्क नही हैदोनो लोकतंत्र और उसमे शामिल लोगो के खिलाफ हैं।

राय- दुखी और पीडितो के दुःख को नकवी नही देख पाए लेकिन लिपस्टिक देखा ,यह बताता है नकवी की निगाह कहा रहती है और औरतो के प्रति कितना सम्मान इनमे है,क्या महिला आयोग कोई एक्शन लेगा...इन्हे आतंकी कहना, इनके मानसिक दिवालियेपन को ही दिखाता है,और मानसिक दिवालिये नेता हमारे सांसद विधायक होने की योग्यता नही रखते यह संविधान में लिखा है....चुनाव आयोग को इसकी जांचकर इनको अयोग्य ठहराना चाहिए...

माकपा के वी एस अच्च्युतानान्दन ने कहा-अगर वो संदीप (मुंबई में शहीद मेजर )का घर न होता तो वह कुत्ता भी झांकने न जाता.(संदीप के पिता द्वारा मिलाने से इनकार कराने पर )
राय-क्या इनसे कोई पूछने वाला है की आप मुख्यमंत्री न होते तो क्या होते....ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयां बताते है की यह पड़संभालने लायक यह नही बचे....ये इस्तीफा दे.कितने संवेदनशील है यह भी बताता है.साथ ही संसद या विधानसभा का सदस्य होने की योग्यता इनमे है की नही आयोग जांच करे॥
राकपा नेता का बयान-प्रफुल्ल पटेल कहते हैं -आतंकी घटना के लिए केवल राजनितिक दल या नेता जिम्मेदार नही है,सुरक्षा अधिकारी भी दोषी हैं इसके अलावा आम जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की वह सतर्कता बरते....
राय-जब अधिकारियों को संभाल नही पा रहे हो तो आतंकियों को क्या संभालोगे इस्तीफा दो...फ़िर सुरक्षा गार्डों के साए में क्यों टहलते हैं...आज तक आतंकी हमले में कितने नेता मरे कितने आम आदमी हिसाब दो.अभी ब्लॉग लिखे जाने तक किसके ऊपर आए किसे पता॥
नीतिश ने कहा-हमारे ख़िलाफ़ ऐसे प्रदर्शन अनुचित है..इससे लोकतंत्र पर असर पङता है ये तरिका अनुचित है॥हम जनता के प्रतिनिधि हैन्हामे इनके दर्द का अहसास है...
राय-दर्द का एहसास होता तो तो छोटे से विरोध पर इतना बुरा ना लगता वो भी तब जब हर बार शिकार आम आदमी ही होता है..उसमे असुरक्षा की भावना है..और वह शिकार है....
क्या आप बेशर्म नही है?क्या अमेरिक में नेता नही है?क्या वहा दोबारा आतंकी हमला हुआ.


शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

.........काश उजाला दिल में आए

विजयादशमी का महत्त्वपूर्ण पर्व आने वाला है.जिसका सभी भारतीय जनमानस खासकर हिंदू और बाज़ार बेसब्री से इंतजार करता है.विजयादशमी सच और न्याय का असत्य और अन्याय पर विजय का त्यौहार है,जिसके बाद खुशियों की बरसात दीपावली के रूप में आती है.
इस बार लगता है आसुरी अर्थात आतंकवादी शक्तियां उत्साह में है जो लगातार धमाके कर अशांति फैला रही हैं.इस पर्व पर हम कामना करते हैं की उनके अन्दर का असुर मर जाए और वे शान्ति का रास्ता अखतिआर करें, भारत में खुशहाली आए .

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

अजब दुनिया

ऐ दुनिया भी क्या खूब है..कब क्या हो जाय कहा नही जा सकता .गंजे लोग अपने बाल उगाने के लिए क्या-क्या जातां नही करते और कही न कहीं उन्हें सर पर बाल न होने का अफ़सोस होता था,लेकिन अब बाज़ी पलट गई है.न्यू जीलैंड की एक एयर लिनस कंपनी गंजो के सर पर अपना विज्ञापन देने जा रही है,जिसके उन्हें १००० डॉलर मिलेंगे ...मतलब शुद्ध मुनाफा न बालो को सवारने में कोई खर्च औरअब उसका व्यावसायिक उपयोग अब तो बल वालो को भी इनसे रश्क होगा क्योंकि महगाई बढती जा रही है.

बुधवार, 10 सितंबर 2008

कोसी के बहाने

बिहार प्रान्त में कोसी नदी में आई बाढ़ ने करीब ३५ लाख लोगो को प्रभावित किया है इस बाढ़ ने अरबों रूपये की संपत्ति को भी तहस नहस कर दिया है.सरकार सेना नागरिक और अन्य संगठन इससे निपटने की कोशिश कर रहे हैं.और व्यवस्था को पटरी पर लाने में लगे हैं ?किंतु इस बाढ़ ने हमारे सामने कुछ प्रश्न खड़े कर दिये हैं.जिनके जवाब ढूढना बेहद जरूरी है।

पहली ऐसी विपत्तियों के आ ही जाने के बाद इससे निपटने के लिए हम कितने तैयार हैं?क्योंकि बाढ़ के आने ने बाद लोग कई दिनों तक बाढ़ में फंसे रहे उन्हें बचाव और राहत सामग्री के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा..और भोजन के पैकेट गिराए गए तो भीड़ के बीच जरूरत से कम पैकेट गिराए गए.जिससे छीना झपटी और आराजकता की घटनाएं घटी.अराजकता से निपटने की योजना हमारे पास है ?और ऐसी स्थिति में होने वाले अपराधों से निपटने में क्या हम सक्षम है? समाचारों में ऐसी खबरें भी आई हैं की जान बचाने के लिए नाविकों ने पर व्यक्ति हजारों रूपये चार्ज किए .क्या ऐसी स्थितियों में भी हम अपना स्वार्थ त्याग नही सकते लोलुपता की यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है? ये घटनाएँ तब घाट रही हैं जब हमने आपदा प्रबंधन के लिए बाकायदा बोर्ड बना रखे हैं.
एक खामी यह दिखायी दी की नौकर शाही और अन्य संगठनो में समन्वय का अभाव है.ख़बर यह आई है की सेना को बचाव कार्य के लिए नौकरशाही से कई दिनों तक आदेश का इंतज़ार करना पडा.क्या कोई भी देश एक ही व्यक्ति और संगठन चला पायेगा?.और तब जब इसी देश में समन्वय की यह कल्पना की गई हो और उसकी शक्ति का बखान किया गया हो-


विकल व्यस्त विखरे पड़े हैं,शक्ति के विद्युत् कण निरूपाय

समन्वित करें जो इनको,विजयिनी मानवता हो जाय ।

- जयशंकर प्रसाद


पानी कम होने के बाद बिमारियों के फैलाने की भी खबरें आई थी.
एक दूसरा सवाल ऐसी आपदाओं को आने से रोकने से सम्बंधित है.कोशी के लिए गठित हाई लेवल कमिटी ने जब जून से पहले बाँध को रिपेयर कर लेने का आदेश दिया था तो इस पर काम क्यों नही हुआ इसका जवाब आना बाकी है.क्या हम इस तरह की दुर्घटना को रोकने का प्रयास कर रहे हैं.की मौत का नंगा नाच देखना हमारी आदत में शुमार हो गया है।

तीसरा सवाल द्र्घतना के बाद नेपाल के बयान से संबधित है.हमारी विदेशनीति किस ओर बढ़ रही है की हमारे पड़ोसी केवल हमें संदेह की दृष्टि से ही देख रहे हैं.प्रचंड पिछली संधियों की समीक्षा की बात कह रहे हैं और यह की भारत ने नेपाल से जो संधि की है वह तर्क सांगत नही है.क्या यह चीन का प्रभाव है और है तो क्यों?
एक सवाल यह भी की पर्वत पहाड़ नदी घाटी में अनावश्यक गतिविधिया बढ़ने का दंड प्रकृति ने तो नही दिया है और इसके बाद क्या? .शायद प्रकृति हमें सावधान भी कर रही थी की सावधान छेड़-छड़ न करो नही तो हम तुम्हे सबक भी सिखा सकते हैं. अंत में दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से मैं अपनी बात समाप्त करूंगा।

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,

और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर

,इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

खेल और भारत

लो ओलंपिक में भारत की एक और उम्मीद अखिल को मुह की खानी पड़ी.दोष टीम मैनेजमेंट की रणनीति को दिया जा रहा है.आख़िर कब तक रणनीति बनाने वालो की वजह से बड़े मंचो पर यह एक अरब से ज्यादा की आबादी वाला देश खाली हाथ या कुछ एक पदक लेकर लौटता रहेगा।
फ़िर भी यह ओलंपिक ख़ास रहा है क्योंकि अभिनव के व्यक्तिक प्रयास से पहली बार ओलंपिक में किसी व्यैक्तिक स्पर्धा में स्वर्ण जीतने का स्वाद हमें मिला.यह स्पर्धा हमारे लिए उम्मीद पैदा करने वाला रहा क्योंकि अखिल ,सा इना नेहवाल समेत अनेक खिलाड़ी नजदीकी मुकाबले हारे.जिससे आगे एक किरण दिखाई देती है।
अखिल ने जिस तरह विश्व चैम्पियन को हराया वह हमरे लिए गौरव की बात है.लेकिन इन खेलो के प्रशिक्षण में आने वाले खर्च को देखते हुए कहा जा सकता हैं बड़े मंचो पर पदक जीतना गरीबो के लिए मुश्किल होता जा रहा है,ये और बात है की रास्ते भले कठिन हो जीतना उनके लिए नामुमकिन नही है.लेकिन बदली परिस्थितियों में सरकार की तैयारी निराश करने वाली दिखाई पड़ती है।
राष्ट्रमंडल खेलो से पहले ,अगर सरकार चेत जाती है तो शायद हम बे-आबरू होने से बच सकते हैं । जबकि इसके लिए समय रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा है.और अभी डेल्ही में इसके लिए जरूरी आधारभूत संरचना का भी विकास नही किया जा सका है,इसके बावजूद सरकार इस स्पर्धा को पर्यटन के ही लिहाज़ से देख रही है,खेल से नही.बिना नजरिया बदले पदक की उम्मीद बेमानी है।

मंगलवार, 15 जुलाई 2008

....एक अच्छी शुरूआत

२२ जुलाई को अयोध्या में संतो का एक महा सम्मलेन होने जा रहा है। जिसमें देश के प्रमुख संत देश में हिंदुत्व की अलख जगाने की रणनीति तैयार करेंगे। इस सम्मलेन का उद्देश्य; पिछले माह हरिद्वार में तय हुए विहिप की योजनाओं को अमली जामा पहुचाना है।जिसमें देश के प्रमुख संत देश के एक-एक जिलों को गोद लेंगे।
विहिप (संतो)द्वारा उठाया यह कदम सराहनीय है। संतो द्वारा एक-एक जिलो को गोद लेने से वहां अनेक सांस्कृतिक,धार्मिक ,एवं सामाजिक कार्यक्रम ,आयोजित,कराये जा सकते हैं। जिससे इन जिलों में आर्थिक विकास और सामाजिक विकास की नदी अर्थात् गंगा बह सकती है।लोगो की धार्मिक (आध्यात्मिक) रुचियों के परिष्कार में मदद मिलेगी।
हमारी धार्मिक संस्थावो के पास काफ़ी पैसा है ,उन्हें दान भी काफ़ी मिलता है,जिनका उद्देश्य सामाजिक,धार्मिक कार्य कराने के लिए ही दान किया जाता है ।यह धन का सबसे अच्छा उपयोग होगा ।इधर मंदिरों और आश्रमों से सम्बंधित लोगो के हत्या जैसा आरोप लगने और इनमें सघर्ष की ख़बरों ने इनकी प्रतिष्ठा को धक्का पहुचाया है।
इस(जिलों के गोद लेने के ) कार्य से हिंदू धर्म में जाति पंथ और विचारधारा के नाम से जो विखराव और टकराव हो रहा है,उसे रोकने में भी मदद मिलेगी। साथ ही समाज में नैतिकता भी बढेगी। अपराध को बढ़ने से भी रोका जा सकता है। आर्थिक विकास के कुछ कार्यक्रम इन्होने चलाया तो गरीबो और विकास से दूर इन जिलों की तस्वीर बदल सकती है।
हमारे धर्म में दरिद्रो में (प्राणी मातृ में)नारायण के दर्शन किया जाने की परम्परा है। दान का लक्ष्य नारायण की सेवा ही होती है।इस कार्य में आशा है उन्हें यथेष्ट महत्त्व मिलेगा।

बुधवार, 9 जुलाई 2008

कुछ औरों को भी दे- दो.

२७ जून को मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यमुनापार (इलाहाबाद) में देश का पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय के बनने का काम शुरू हो गया है। जिसकी आधारशिला पंडित जवाहर लाल नेहरू ने १९६२ में रखी थी। वैसे... पूर्वांचल की आबादी और आवश्यकता को देखते हुए इसकी सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी।
इस विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद, इलाहाबाद में दो केन्द्रीय विश्वविद्यालय होंगे इसके साथ एक मुक्त विश्वविद्यालय, एक एनआईटी, एक आई आई आई टी एवं कई शोध संस्थान देश और प्रदेश की शिक्षा में योगदान दे रहे हैं। यह एक गौरवशाली समय है। लेकिन इसके साथ यह (पूर्वांचल) क्षेत्र गरीबी बेरोजगारी के मकड़जाल में फंसा हुआ है, जबकि (अन्य जिलें भी) खनिज मानव और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है।
कुछ जिलों में तो पर्याप्त डिग्री कॉलेज, इंटर कॉलेज तथा प्राथमिक विद्यालय भी नही हैं। यहाँ आदिवासी और पिछड़ी जातियों की आबादी भी पर्याप्त है। इनकी बात छोड़ भी दी जाय तो सामान्य वर्ग की भी एक बड़ी जनसंख्या की आर्थिक स्थिति ऐसी नही है, कि बच्चे अपना घर छोड़ कर इलाहाबाद पढ़ने जा सके। इन जिलों की उच्च शिक्षा की रीढ़ पूर्वांचल विवि से २५६ महाविद्यालय सम्बद्ध हैं, जिससे सत्र में देरी होती है। कई बार इसकी वजह से इन महाविद्यालयों के छात्रों को अच्छे अवसर समय से अंकपत्र न मिलने के कारण छूट जाते हैं। इलाहबाद विवि (शहर से) बाहर के महाविद्यालयों को सम्बद्धता नहीं देता।
ऐसे में अच्छा होता यह विवि पूर्वांचल के किसी अन्य जिले में स्थापित किया जाता। अपेक्षाकृत विकसित इस जिले का इससे कुछ न बिगड़ता। जिससे इन पिछडे जिलों के गरीब छात्रों को अच्छी शिक्षा मिलती । साथ ही यहाँ का अकादमिक माहौल भी सुधरता (अच्छी शैक्षणिक गतिविधियों और विद्वानों के आगमन से)। विवि में नियुक्तियों से और तनख्वाह का कुछ हिस्सा तो कर्मचारी यहाँ खर्च ही करते, जिससे यहाँ की जर्जर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद मिलती। सब-कुछ समरथ को मिले, कमजोर ताकता रहे, यह कहाँ का न्याय है। इन नीतियों से विषमता बढती है घटती नहीं।

मंगलवार, 8 जुलाई 2008

चुनाव और बनती -बिगड़ती दोस्ती.

लोकसभा चुनाव आने वाला है.अब नए रिस्तो के बनने पुराने में खामियों के दिखने और टूटने का समय आ गया है.इसी क्रम में वाम पार्टिया कांग्रेस से बहुत नाराज हो गई है (४ सल् बाद).उसमे अब केवल खामिया इनको दिख रही है.क्योंकि वोट तो चाहिए ही।

वाम पार्टियाँ काग्रेस की असफलता पर एक आरोप पत्र लाना चाहती है .लेकिन यह आज से एक-दो-तीन चार सल् पहले क्यों नही कर सकी.तब तो मंहगाई और अन्य विरोध के लिए एक औपचारिकता की जाती थी.सरकार की बातचीत (पार्टी )के बाद सरकार का कदम ही ठीक.रहता था ?ये भूलते हैं की सरकार केवल इनके समर्थन से चल रही थी.सरकार की चाय पर जनता की तकलीफों को ये कुर्बान कर देते थे।

ये चाय -पानी पार्टियाँ चीन के किसी भी (सिक्किम और अरुणाचल पर उसके रूख )सरकार पर दबाव नही बनाती की सरकार कदा प्रतिरोध करे,बल्कि सरकार पर अप्रत्यक्ष दबाव ही उसके पक्ष में बनाती हैं। आज चुनाव आया है तो इन्हे देश हित और जनता,तथा मंहगाई याद आ रही है सवाल यह है की यह इन्हे पहले क्यों नही याद आया.क्योंकि मंहगाई लगातार बढ़ रही है.और करार पर सरकार लगभग दो साल से काम कर रही है.सरकार ४ साल से इनके समर्थन से चल रही है.

शनिवार, 5 जुलाई 2008

बातें कैम्पस की

माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल की प्रवेश परीक्षा के परिणाम आज घोषित कर दिया गया.जिससे बेहतर शिक्षण के द्वारा नए पत्रकार तराशे जाने का रास्ता साफ़ होगया है.प्रत्येक पाठ्यक्रम के लिए लगभग २५ सीटें निर्धारित होने के कारन कुछ को अभी प्रतीक्षा सूची में रहना पनेगा।

नव आगंतुको का परिसर में विस्वविद्यालय के ब्लोग्गेर्स ,अद्यापकों और आपके वरिष्ठ साथियों की और से स्वागत है .

सोमवार, 30 जून 2008

क्षेत्रीयता और राजनीति

इस समय देश में क्षेत्रीय भावनाए तेजी से विकसित हो रही है ,जो अखंड भारत की संकल्पना के लिए हानिकारक है.क्षेत्रीय भावनाओं के उफान लेने का एक कारण आर्थिक सांस्कृतिक असुरक्षा की भावना एवं कुछ व्यक्तियों की राजनैतिक महत्वाकांक्षा है।

चालाक व्यक्ति भोले-भाले लोगों को अपने हितों के लिए इस्तेमाल करते है.जिसके लिए भारत में व्याप्त आर्थिक विषमता का बढ़ते जाना और सांस्कृतिक विरासत के लिए पागलपन का होना भी दोषी माना जा सकता है.जिसमें पर्याप्त विविधता भी है.पूर्वोत्तर राज्यों के अलगाववादी आन्दोलन,राजस्थान के गुर्जर आन्दोलन,कश्मीर का अमरनाथ यात्रा प्रकरण इसी का उदाहरण है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति से आज तक इस समस्या को टेकल करने में शीर्ष नेत्रित्व या तो असफल रहा है या उसने अपने हित के लिए इसे बढ़ने दिया है। इस समस्या के उभरने में राजनेताओं ने प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष तरीके से मदद कर देश की अखण्डता को तार -तार करने की कोशिश की है।

देश में गुर्जरों के अहिंसक आन्दोलन के बाद उनकी मांगो के पूरा होने के बाद अब दबाव के लिए हर वर्ग हिंसा का सहारा लेने की कोशिश कर रहा है.जलता जम्मू-कश्मीर इसका उदाहरण है. व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं रहने पर जब नेता ख़ुद को सम्पूर्ण भारत के जनता के नेता के रूप में प्रस्तुत नही कर पाते तो अपने स्वार्थों के लिए क्षेत्रीय हितों की बात करना इनकी मजबूरी बन जाती है।

देश इस समय मंहगाई और क्षेत्रीयता की चुनौती का सामना कर रहा है,जो विकास और हमारी एकता की सारी गणित को ही गदाबदाने पर उतारू है.ऐसे में संयम और धैर्य के साथ मिलजुलकर हमें इन चुनौतियों का सामना करना होगा.

सोमवार, 23 जून 2008

उफ़ ये गर्मी (भोपाल से दिल्ली)

एक शहर से दूसरे शहर में जाने पर कई फर्क पड़ते है.सबसे पहला तो वातावरण का ही पङता है.भोपाल से देल्ली आने पर यह फर्क मुझे सिद्दत से महसूस हुआ.जहा भोपाल का मौसम खुशनुमा है.तो देही में सुख-सुविधा की सारी चीजें होने की बावजूद व्यस्तता के कारण कहीं खोई -खोई सी रहती है.सारे देश की समस्याओं को अपने सर लेकर बड़ी जिम्मेदारी से अपना फर्ज निभा रही है।

तो दूसरी और गर्मी से हलाकान है एक मिनट के लिए बिजली गुल हो जाए तो जैसे जीना मुहाल हो जाता है .बहार निकले नही की उमस से से सामना करना पड़ता है.यहाँ इतनी उमस है की पंखे के निचे से हटे नही की लगता है की सीरे की कडाही से निकाले गए हो,चिपचिपी लिजलिजी ये गर्मी ख़ुद पर ही चिढ पैदा कर देती है।

देश के कोने -कोने से आकर लोग यहाँ बसे हैं.जिससे अपनी विशेषताओं केसाथ इसकी संस्कृति बहुरंगी हो गई है.जो भाषा के स्तर पर तो दिखाई ही पड़ती है जीवनशैली के स्तर पर भी दिखाई पड़ती है।

सच कहूं तो सारे देश की विशेषता एक दल्ली में काफी कुछ देखी जा सकती है.लेकिन इसकी गर्मी से तो भगवान् ही बचाए.यहाँ काफ़ी खुलापन दिखायी पड़ता है.देश के मिजाज के साथ दिल्ली भी बदल रही है.

शनिवार, 7 जून 2008

महारास्त्रियों के प्रेम का पाखण्ड

महारास्त्र की गठबंधन सरकार महारास्त्रियों के लिए मरीन ड्राइव के निकट समुद्र में शिवाजी की ३०९ फीट उची प्रतिमा बनाने वाली है.यह सब महारास्त्रियों के लिए कुछ कराने के नाम पर किया जा रहा है जैसे मराठियों के विकास रोजगार गरीबी का काम ख़त्म किया जा चुका हो अब केवल कृत्रिम मूर्तिया बनानी शेष हो।

विडम्बना है की जो महापुरुष जिन चीजो का विरोध करते हैं,उनके अनुयायी उनके सिधान्तो को अंगूठा दिखाकर उनके नाम पर वही काम करते है.जैसे कबीर ने उपासना मे वाह्यआडम्बर का विरोध किया तो अनुयायियों ने उन्ही की मूर्ति लगाकर उनके नाम पर मठ बनाए.शिवाजी ने पर्वत पहाडों को अपना दोस्त माना उन्ही के बीच पले बढे. उनकी रक्षा किचेतना उनके मन में थी तो अनुयायियों ने समुद्र के बीच कृत्रिम द्वीप बनाकर उनकी मूर्ति लगाने की ठान ली ।

वह भी तब-जब विश्व बढ़ते प्राकृतिक असंतुलन को लेकर चिंतित है.विश्व के सामने एक गंभीर समस्या के रूप में ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ता प्राकृतिक असंतुलन एक चुनौती बन गया है.ऐसे में इस चुनौती कोठेंगा दिखाकर प्रकृति को नुकसान पहुचाकर ,महारास्त्रियो के लिए कुछ करने का पाखण्ड क्यो ?पर्वत पहाड़ नदी तालाब समुद्र जिस भारतीय,महारास्त्री नायक के अजीज थे उन्ही के नाम पर उनके दोस्तो को नुकसान क्यो पहुचाया जा रहा है?

......और तब जब पहले किए गए इस तरह के प्रयासों को देश की सुरक्षा और पर्यावरण की चिंता से रोका जा चुका है.क्या यह संविधान विरोधी कार्य महारास्त्र वरोधी कार्य नही है.वोट कमाने के बहुत तरीके है.इसके लिए रोजगार बढ़ाने गरीबी उन्मूलन और विकास का कार्य किया जा सकता है.

रविवार, 1 जून 2008

मीडिया वार पर चर्चा

राजधानी भोपाल के स्वराज्य भवन में आज (भोपाल में छिड़ी) मीडिया वारकिसके हित में विषय पर चर्चा हुई । जिसमें भोपाल के सभी प्रमुख पत्रकारों प्रतिनिधियों ने हिस्सेदारी की। इसमे मीडिया के छात्रों ने इनके विचारों को सूना।
इस चर्चा में अभिलाष खांडेकर (भास्कर)दीपक तिवारी (दवीक )एल एन शीतल (राज)पी पी सिंह (प्रमुख,पत्रकारिता बिभाग माखनलाल विश्वविद्यालय )राकेश दिक्सित शिव अनुराग पतेरिया ,विजय दत्त श्रीधर समेत aनेक पत्रकारों ने अपने विचार व्यक्त किए।
जिसमे श्री पी पी सिंह ने कहा इस प्रतिस्पर्धा में पाठको का हित ही है.क्योंकि इससे रीडर तक अपनी पैठ बढ़ने के लिए जो खबर रोक दी जाती थी अब उस तक पहुच सकेगी । लेकिन प्रतिस्पर्धा और युद्ध में अन्तर करना जरूरी है क्योंकि प्रतिस्पर्धा स्वस्थ होती है लेकिन युद्ध में व्यक्तिगत दुर्भावना केन्द्र में आ जाती है.खांडेकर जी नेकहा समय बदल रहा है प्राथमिकताएं बदल रही हैंऐसे में आने वाले बदलाव का स्वागत करना चाहिए .......

क्रमशः