ब्रह्मास्त्र देश दुनिया के घटनाक्रम, भारत की राजनीति, भारत की संस्कृति और सभ्यता, समाज की वर्तमान स्थिति पर अभिव्यक्ति का माध्यम है.
विचार
मंगलवार, 31 जनवरी 2012
साया
सोमवार, 21 नवंबर 2011
जिंदगी
खुले पन्ने
बिखरे शब्द
धुंधली आकृति
स्याह कागजों में
लेखक, पाठक, श्रोता
दर्शक न कलाकार
बस समय,
चौराहे, सनसनाहट
आशंका हल नहीं
किताब में
अदीप्त, अपठित
संघर्ष, भुलावा, छलावा
प्रेम, नफरत, क्षोभ, हार-जीत
धोखा, थकन, टूटन, चुभन, अंधेरा
गड्डमड्ड हो रही है जिंदगी
व्याकरण की तलाश में
बुधवार, 10 अगस्त 2011
जनाक्रोश की अभिव्यक्ति सिंघम
यह सुखद संयोग है कि देश की धड़कन बन चुके 'भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिलÓ के लिए आंदोलन और अजय देवगन अभिनीत सिंघम फिल्म रीलीज हुई। बारीकी से देखने पर फिल्म के कई किरदार आज के हमारे समाज में घूमते-फिरते दिखाई देंगे।
अन्ना के आंदोलन को देश के लगभग हर वर्ग (भ्रष्टाचारी अथवा उनसे किसी भी तरह का कोई सहानुभूति रखने वालों को छोड़कर) का समर्थन मिल रहा है। उसी तरह सिंघम को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया है। कई नई फिल्मों की तरह सरकार के कई हथकंडों को जनता ने (आरोपों और धमकियों को) खारिज कर, अण्णा पर भरोसा जताया है। यह फिल्म करीब दस दिन में ही ६५ करोड़ की कमाई कर चुकी है। इस फिल्म को दर्शकों का समर्थन करवट ले रहे देश के जनाक्रोश की ही अभिव्यक्ति ही है।
अजीब संयोग है कि सिंघम में ईमानदार पुलिस अफसर की आत्महत्या के बाद उसकी पत्नी का सिस्टम और सरकार सपोर्ट नहीं करती, बल्कि मंत्री महिला और उसको वहां तक लाने वाले को बुरा-भला कहता है। वैसे ही आज सरकार उसके मददगार अण्णा और उसके सहयोगियों पर अनेक आरोप लगा रहे हैं। तिल-तिल मरती आत्मा की आवाज किसी ने सुनी तो ङ्क्षसघम (जनता) ने और अण्णा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो रही है। यह जनाक्रोश ही है कि सिंघम में विलन को उसी के हथकंडे से मारने के बाद भी फिल्म को हजारों लोग देखने पहुंच रहे हैं। जनता आज भ्रष्टाचार को किसी भी हालत में खत्म होते देखना चाहती है, हथियार चाहे कुछ भी हो। यह अलग बात है कि इनमें से कुछ सिस्टम से नहीं लड़ सकते थे, कभी न चाहते हुए उसका हिस्सा बना दिए गए थे, या बन गए थे। लेकिन ये अपनी ताकत और इच्छा अण्णा को सौंप चुके थे। जैसी की फिल्म में लोगों ने सिंघम को अपना भरोसा अर्पित किया था।
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
तो क्या लब आजाद होते
शुक्रवार, 8 जुलाई 2011
तो इसलिए सिब्बल लोकपाल विरोधी हैं
रविवार, 3 जुलाई 2011
लो अब दिल की बात जुबां पर आ ही गई
गुरुवार, 30 जून 2011
भारत में नया दर्शन 'दुर्भाग्य जरूरी
शुक्रवार, 24 जून 2011
बंट गया देश
पहला समूह संविधान ·े दायरे में ए· ए· मजबूत लो·पाल चाहता है, जिस·े पास भ्रष्टाचार ·ा ·लेजा फाडऩे ·े लिए नाखून और दांत हो तो दूसरा समूह भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों ·ो सुरक्षा ·वच ·े अंदर रख·र उस·ा हर तरह से बचाव ·रने ·ी ·ोशिश ·र रही है। यह भी सर·ार न्यापालि·ा ·ो सर·ार ·ो
इस दरमियान पहला समूह(आम जनता) अपने अगुवा ·े पक्ष में समर्थन व्यक्त ·र चु·ा है तो दूसरा समूह अगुवा पर चौतरफा हमले ·र रहा है जिससे अगुवा ·ी छवि धूमिल हो, ले·िन बहुमत ·ी सर·ार संविधान ·े अनुसार जो जनता से ता·त ग्रहण ·रती है, वह जनता ·ा विश्वास लगातार खो रही है। ·ुछ धर्मगुरु भी सर·ार ·ी ·ठपुतली बन जन आंदोलन ·ो निशाना बना रहे हैं, ऐसे में वे ·हीं नहीं ·हीं अपने ·ो भ्रष्टाचार में लिप्त होने ·ी आशं·ा ·ो जन्म दे रहे हैं साथ ही अपनी विश्वसनीयता खत्म ·र रहे हैं। अब तो जनता बोले आर या पार।
सर·ार द्वारा ·भी इस जनयुद्ध ·ो मीडिया प्रायोजित ·हा जाता है तो ·भी ·ुछ और, ले·िन सवाल यह है ·ि क्या मीडिया अछूत है जो उस·ा प्रायोजित आंदोलन गलत हो जाय या जनता ·ी बात ·रना उसे अस्पृश्य बनाता है, जब·ि मीडिया ·ा दायित्व यही है ·ि जो हो रहा है वह जनता त· पहुंचाया जाय, वह जनता और सर·ार ·े बीच ·ा माध्यम बने। फिर जब चुनाव और अन्य मौ·ों पर जब नेता मीडिया ·ो इस्तेमाल ·रते हैं तब मीडिया इन·े लिए सही क्यों होती है।
शुक्रवार, 29 जनवरी 2010
अखबार
दिन की शुरुआत का इंजन,
पथ निर्धारक समय की झांकी
बस इतना ही,
नहीं
काले अक्षरों का पुलिंदा भर नहीं,
नींद तोड़ने के छींटें हैं एक-एक शब्द
वंचितों की उम्मीद,
संघर्ष की पतवार हैं
ये अखबार
बनाने के पीछे,
लगे हैं हजारों हाथ, दिमाग
यन्त्र चालित नहीं,
विचारों की लौ के रक्षक
कुछ छूट गए,
कुछ त्याग दिए गए को,
अप्रासंगिक बनने से बचाने के लिए,
पहरुए
एक गलती, खेमा बदलने की
गरीब कमजोर से समर्थ मजबूत की ओर,
सिपाहियों की,
कर देता है पानी-पानी
बुधवार, 18 फ़रवरी 2009
बंदिशों में है आजादी.
कई चरण में होने वाले चुनाव के लिए यह रोक अंतिम चरण का मतदान ख़त्म होने तक जारी रहेगा ........निर्वाचन आयोग
बुधवार, 3 दिसंबर 2008
मीडिया की कारगुजारी
मंगलवार, 2 दिसंबर 2008
मानसिक दिवालिये पन के शिकार नेता (एक अपील अध्यक्ष जी के नाम)
कुछ नेता स्वयं को ही लोकतंत्र और प्रजातान्त्रिक संस्था समझाने लगे हैं.और अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर तिलमिला गए हैं।
नकवी ने कहा-कुछ संगठनो ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की जगह लोकतंत्र के खिलाफ जंग छेड़ दी है,इस तरह के प्रदर्शनों से वे लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैसा कर रहे है जम्मू कश्मीर में यही कम आतंकवादी कर रहे हैं.यह वक्त पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का है,नाकि प्रजातान्त्रिक संस्थाओं के खिलाफ असंतोष पैदा करने का ,साथ ही कहा कुछ महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं,उनमे और कश्मीरी आतंकियों में कोई फर्क नही हैदोनो लोकतंत्र और उसमे शामिल लोगो के खिलाफ हैं।
राय- दुखी और पीडितो के दुःख को नकवी नही देख पाए लेकिन लिपस्टिक देखा ,यह बताता है नकवी की निगाह कहा रहती है और औरतो के प्रति कितना सम्मान इनमे है,क्या महिला आयोग कोई एक्शन लेगा...इन्हे आतंकी कहना, इनके मानसिक दिवालियेपन को ही दिखाता है,और मानसिक दिवालिये नेता हमारे सांसद विधायक होने की योग्यता नही रखते यह संविधान में लिखा है....चुनाव आयोग को इसकी जांचकर इनको अयोग्य ठहराना चाहिए...
माकपा के वी एस अच्च्युतानान्दन ने कहा-अगर वो संदीप (मुंबई में शहीद मेजर )का घर न होता तो वह कुत्ता भी झांकने न जाता.(संदीप के पिता द्वारा मिलाने से इनकार कराने पर )
राय-क्या इनसे कोई पूछने वाला है की आप मुख्यमंत्री न होते तो क्या होते....ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयां बताते है की यह पड़संभालने लायक यह नही बचे....ये इस्तीफा दे.कितने संवेदनशील है यह भी बताता है.साथ ही संसद या विधानसभा का सदस्य होने की योग्यता इनमे है की नही आयोग जांच करे॥
राकपा नेता का बयान-प्रफुल्ल पटेल कहते हैं -आतंकी घटना के लिए केवल राजनितिक दल या नेता जिम्मेदार नही है,सुरक्षा अधिकारी भी दोषी हैं इसके अलावा आम जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की वह सतर्कता बरते....
राय-जब अधिकारियों को संभाल नही पा रहे हो तो आतंकियों को क्या संभालोगे इस्तीफा दो...फ़िर सुरक्षा गार्डों के साए में क्यों टहलते हैं...आज तक आतंकी हमले में कितने नेता मरे कितने आम आदमी हिसाब दो.अभी ब्लॉग लिखे जाने तक किसके ऊपर आए किसे पता॥
नीतिश ने कहा-हमारे ख़िलाफ़ ऐसे प्रदर्शन अनुचित है..इससे लोकतंत्र पर असर पङता है ये तरिका अनुचित है॥हम जनता के प्रतिनिधि हैन्हामे इनके दर्द का अहसास है...
राय-दर्द का एहसास होता तो तो छोटे से विरोध पर इतना बुरा ना लगता वो भी तब जब हर बार शिकार आम आदमी ही होता है..उसमे असुरक्षा की भावना है..और वह शिकार है....
क्या आप बेशर्म नही है?क्या अमेरिक में नेता नही है?क्या वहा दोबारा आतंकी हमला हुआ.
शनिवार, 4 अक्टूबर 2008
.........काश उजाला दिल में आए
इस बार लगता है आसुरी अर्थात आतंकवादी शक्तियां उत्साह में है जो लगातार धमाके कर अशांति फैला रही हैं.इस पर्व पर हम कामना करते हैं की उनके अन्दर का असुर मर जाए और वे शान्ति का रास्ता अखतिआर करें, भारत में खुशहाली आए .
गुरुवार, 11 सितंबर 2008
अजब दुनिया
बुधवार, 10 सितंबर 2008
कोसी के बहाने
बिहार प्रान्त में कोसी नदी में आई बाढ़ ने करीब ३५ लाख लोगो को प्रभावित किया है इस बाढ़ ने अरबों रूपये की संपत्ति को भी तहस नहस कर दिया है.सरकार सेना नागरिक और अन्य संगठन इससे निपटने की कोशिश कर रहे हैं.और व्यवस्था को पटरी पर लाने में लगे हैं ?किंतु इस बाढ़ ने हमारे सामने कुछ प्रश्न खड़े कर दिये हैं.जिनके जवाब ढूढना बेहद जरूरी है।
पहली ऐसी विपत्तियों के आ ही जाने के बाद इससे निपटने के लिए हम कितने तैयार हैं?क्योंकि बाढ़ के आने ने बाद लोग कई दिनों तक बाढ़ में फंसे रहे उन्हें बचाव और राहत सामग्री के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा..और भोजन के पैकेट गिराए गए तो भीड़ के बीच जरूरत से कम पैकेट गिराए गए.जिससे छीना झपटी और आराजकता की घटनाएं घटी.अराजकता से निपटने की योजना हमारे पास है ?और ऐसी स्थिति में होने वाले अपराधों से निपटने में क्या हम सक्षम है? समाचारों में ऐसी खबरें भी आई हैं की जान बचाने के लिए नाविकों ने पर व्यक्ति हजारों रूपये चार्ज किए .क्या ऐसी स्थितियों में भी हम अपना स्वार्थ त्याग नही सकते लोलुपता की यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है? ये घटनाएँ तब घाट रही हैं जब हमने आपदा प्रबंधन के लिए बाकायदा बोर्ड बना रखे हैं.
एक खामी यह दिखायी दी की नौकर शाही और अन्य संगठनो में समन्वय का अभाव है.ख़बर यह आई है की सेना को बचाव कार्य के लिए नौकरशाही से कई दिनों तक आदेश का इंतज़ार करना पडा.क्या कोई भी देश एक ही व्यक्ति और संगठन चला पायेगा?.और तब जब इसी देश में समन्वय की यह कल्पना की गई हो और उसकी शक्ति का बखान किया गया हो-
विकल व्यस्त विखरे पड़े हैं,शक्ति के विद्युत् कण निरूपाय
समन्वित करें जो इनको,विजयिनी मानवता हो जाय ।
- जयशंकर प्रसाद
पानी कम होने के बाद बिमारियों के फैलाने की भी खबरें आई थी.
एक दूसरा सवाल ऐसी आपदाओं को आने से रोकने से सम्बंधित है.कोशी के लिए गठित हाई लेवल कमिटी ने जब जून से पहले बाँध को रिपेयर कर लेने का आदेश दिया था तो इस पर काम क्यों नही हुआ इसका जवाब आना बाकी है.क्या हम इस तरह की दुर्घटना को रोकने का प्रयास कर रहे हैं.की मौत का नंगा नाच देखना हमारी आदत में शुमार हो गया है।
तीसरा सवाल द्र्घतना के बाद नेपाल के बयान से संबधित है.हमारी विदेशनीति किस ओर बढ़ रही है की हमारे पड़ोसी केवल हमें संदेह की दृष्टि से ही देख रहे हैं.प्रचंड पिछली संधियों की समीक्षा की बात कह रहे हैं और यह की भारत ने नेपाल से जो संधि की है वह तर्क सांगत नही है.क्या यह चीन का प्रभाव है और है तो क्यों?
एक सवाल यह भी की पर्वत पहाड़ नदी घाटी में अनावश्यक गतिविधिया बढ़ने का दंड प्रकृति ने तो नही दिया है और इसके बाद क्या? .शायद प्रकृति हमें सावधान भी कर रही थी की सावधान छेड़-छड़ न करो नही तो हम तुम्हे सबक भी सिखा सकते हैं. अंत में दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से मैं अपनी बात समाप्त करूंगा।
बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,
और नदियों के किनारे घर बने हैं ।
चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर
,इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।