विचार

सोमवार, 21 नवंबर 2011

जिंदगी


खुले पन्ने
बिखरे शब्द
धुंधली आकृति
स्याह कागजों में

                 लेखक, पाठक, श्रोता
                 दर्शक न कलाकार
                  बस समय,
                 चौराहे, सनसनाहट
                  आशंका हल नहीं
                   किताब में

                                      अदीप्त, अपठित
                                    संघर्ष, भुलावा, छलावा
                                    प्रेम, नफरत, क्षोभ, हार-जीत   
                                    धोखा, थकन, टूटन, चुभन, अंधेरा
                                    गड्डमड्ड हो रही है जिंदगी
                                    व्याकरण की तलाश में

बुधवार, 10 अगस्त 2011

जनाक्रोश की अभिव्यक्ति सिंघम

अन्ना का आंदोलन, सिस्टम और सिंघम में समानताएं

यह सुखद संयोग है कि देश की धड़कन बन चुके 'भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल बिलÓ के लिए आंदोलन और अजय देवगन अभिनीत सिंघम फिल्म रीलीज हुई। बारीकी से देखने पर फिल्म के कई किरदार आज के हमारे समाज में घूमते-फिरते दिखाई देंगे।
अन्ना के आंदोलन को देश के लगभग हर वर्ग (भ्रष्टाचारी अथवा उनसे किसी भी तरह का कोई सहानुभूति रखने वालों को छोड़कर) का समर्थन मिल रहा है। उसी तरह सिंघम को दर्शकों ने हाथों हाथ लिया है। कई नई फिल्मों की तरह सरकार के कई हथकंडों को जनता ने (आरोपों और धमकियों को) खारिज कर, अण्णा पर भरोसा जताया है। यह फिल्म करीब दस दिन में ही ६५ करोड़ की कमाई कर चुकी है। इस फिल्म को दर्शकों का समर्थन करवट ले रहे देश के जनाक्रोश की ही अभिव्यक्ति ही है।
अजीब संयोग है कि सिंघम में ईमानदार पुलिस अफसर की आत्महत्या के बाद उसकी पत्नी का सिस्टम और सरकार सपोर्ट नहीं करती, बल्कि मंत्री महिला और उसको वहां तक लाने वाले को बुरा-भला कहता है। वैसे ही आज सरकार उसके मददगार अण्णा और उसके सहयोगियों पर अनेक आरोप लगा रहे हैं। तिल-तिल मरती आत्मा की आवाज किसी ने सुनी तो ङ्क्षसघम (जनता) ने और अण्णा के साथ भ्रष्टाचार के खिलाफ एकजुट हो रही है। यह जनाक्रोश ही है कि सिंघम में विलन को उसी के हथकंडे से मारने के बाद भी फिल्म को हजारों लोग देखने पहुंच रहे हैं। जनता आज भ्रष्टाचार को किसी भी हालत में खत्म होते देखना चाहती है, हथियार चाहे कुछ भी हो। यह अलग बात है कि इनमें से कुछ सिस्टम से नहीं लड़ सकते थे, कभी न चाहते हुए उसका हिस्सा बना दिए गए थे, या बन गए थे। लेकिन ये अपनी ताकत और इच्छा अण्णा को सौंप चुके थे। जैसी की फिल्म में लोगों ने सिंघम को अपना भरोसा अर्पित किया था।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

तो क्या लब आजाद होते

मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर देश दो फाड़ में बंटता जा रहा है। एक पक्ष अपने लिए देश की संसद से कुछ मांग रहा है तो दूसरा पक्ष इससे अपने 'अहम्Ó से जोड़ कर देख रहा है। गुरुवार को समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके साथियों ने लोकसभा में प्रस्तुत कठपुतली और बूढ़े लोकपाल विधेयक को प्रस्तुत करने के विरोध में मसौदे की प्रतियां जलाईं। अब तथाकथित जनप्रतिनिधि इसे संसद का अपमान बता रहे हैं। आजादी से पहले ऐसे ही अंग्रेज भी किसी भी विरोध प्रदर्शन पर ब्रिटेन की संसद और कानून का अपमान बताकर जनप्रतिनिधियों को जेल में डाल देते थे और यातना देते थे। इसके बावजूद जनता और जनप्रतिनिधियों ने संघर्ष का रास्ता चुना और अपने मन और विवेक की बात मानी, जिसका नतीजा निकला, कम से कम हम कहने को तो आजाद हो गए। ऐसे ही अंग्रेजों द्वारा बनाया एक कानून (नमक) को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने १९३० में तोड़ा था। यही नहीं राष्ट्रपिता द्वारा चलाए गए सारे आंदोलन किसी न किसी नीति या कानून के विरोध में ही थे, ऐसे में हम यदि उन गलत कानूनों का मानकर हक के लिए न लड़ते तो शायद ये लब भी आजाद न होते। सविनय अवज्ञा आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, असहयोग आंदोलन आखिर किसकी रक्षा के लिए हुए, जो आज लोगों को अपनी बात रखने पर संसद का अपमान होने लगा और फिर तथाकथित जनप्रतिनिधि जन की भावना समझते तो क्या आज मसौदे की प्रति जलाने की नौबत आती, जबकि चर्चा का नाटक महीनों चला।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

तो इसलिए सिब्बल लोकपाल विरोधी हैं

मजबूत लोकपाल के लिए २०११ में जनता के आंदोलन के खिलाफ, यूपीए सरकार के सबसे मुखर (आंदोलन विरोधी) प्रवक्ता मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल ही बनकर उभरे थे। लेकिन अब भ्रष्टाचार की लपटें उनतक पहुंच रही हैं। इस संबंध में सीपीआईएल(सेंटर ऑफ पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) ने कोर्ट में आवेदन देकर यूएएसएल एग्रीमेंट का उल्लंघन करने पर आरकाम पर लगाए गए ६५० करोड़ के जुर्माने को पांच करोड़ में बदलने का आरोप लगाया है। अब मामला न्यायालय में पहुंचने पर इनकी भूमिका की भी जांच हो सकती है। इसके साथ ही २-जी स्पेक्ट्रम मामले में अटार्नी जनरल जीई वाहनवती की भी मुश्किल बढऩे की संभावना है।

रविवार, 3 जुलाई 2011

लो अब दिल की बात जुबां पर आ ही गई

देश के सबसे ईमानदार नेता और हमारे प्रधानमंत्री ने रविवार को लोकपाल के मुद्दे पर आयोजित सर्वदलीय बैठक में मन को अपने लोगों के सामने खोलकर रख दिया। प्रधानमंत्री का मानना है 'लोकपाल बिल हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में मौजूद अन्य संस्थाओं की तर्कसंगत भूमिका और उनके अधिकार को कोई कमतर नहीं कर सकताÓ। हमारा संविधान एक दूसरे की संतुलन की व्यवस्था पर कायम है। मतलब साफ है सरकार नई पहल नहीं करना चाहती चाहे देश घोटाले दर घोटाले का दंश झेलता रहे। साथ ही सरकार लोगों को धोखा देने के लिए वैसा ही कोई लोकपाल चाहती है। जैसा हमारे संविधान में सीवीसी जैसा सम्मानीय पद है। सरकार ऐसा लोकपाल चाहती है जो बिना दांत का हो और किसी नेता और अधिकारी को केवल उपकृत किया जा सके। बस हिस्सा मिले बस। आज तक इस देश में एक भी बड़े नेता को सजा शायद ही मिली हो। साथ ही आजकल के परिदृश्य को देखकर तो प्रधानमंत्री के कहे एक-एक शब्द सही प्रतीत हो रहे हैं कि हमारी व्यवस्था संतुलन पर आधारित है, सब एक दूसरे को पुष्ट करते हैं, सारे कानून कमजोरों के लिए हैं। वैसे सरकार ने इस बैठक के जरिए एक अपूरणीय शर्त तो थोप दी है, कि सर्वसम्मति से मजबूत लोकपाल का कानून बनेगा। हमें मालूम है हमारे घरों में यदि एक पिता के दो संतान हैं तो उनमें शायद ही किसी मुद्दे पर सहमति बनती हो।

गुरुवार, 30 जून 2011

भारत में नया दर्शन 'दुर्भाग्य जरूरी

किसी भी देश के समाज में शुभ-अशुभ का दर्शन सभ्यता के विकास के साथ ही फल-फूल जाता है। भारत इसका अपवाद नहीं है। जिस तरह समाज में अशुभ और दुर्भाग्य का दर्शन विकसित होता है, इसे टालने के प्रयत्न भी किए जाते हैं। लेकिन भारत का समाज ही शायद इतना भ्रष्ट है कि यहां के प्रधानमंत्री 'दुर्भाग्यÓ पूर्ण कार्रवाई को जरूरी बताते हंै। इससे बड़ा दुर्भाग्य ढूढऩा शायद मुश्किल हो। वह भी उस कार्रवाई का बचाव करने की कोशिश की जा रही है, और उस जनता को धमकी दी जा रही है, जिसे कोई कानून और किसी देश का समाज शक्ति ग्रहण करता है। संविधान की प्रस्तावना के अनुसार जिस संविधान की रक्षा के नाम पर भ्रष्टाचार का विरोध करने वालों को सरकार सता रही है, वह संविधान किसी संसद को, किसी न्यायपालिका को नहीं बल्कि 'आत्मार्पितÓ किया गया है। मतलब संसद और अन्य मशीनरी लोगों के लिए स्थापित हैं। कायरतापूर्ण बर्बर कार्रवाई का बचाव करने से पता चलता है भारत सरकार के प्रमुखों में सीधे ईमानदार भले ही कोई दिखें, उनके पाक साफ होने पर संदेह खत्म नहीं होता।

शुक्रवार, 24 जून 2011

बंट गया देश

इन दिनों एक रेखा से पूरा देश दो धु्रवों में बंट गया है।वह है लोकपाल बिल एक समूह जो कमजोर है ले·िन हौंसले बुलंद है उस·ा नेतृत्व ·र रहे हैं अन्ना हजारे तो दूसरे वर्ग ·ी अगुआ है सर·ार।
पहला समूह संविधान ·े दायरे में ए· ए· मजबूत लो·पाल चाहता है, जिस·े पास भ्रष्टाचार ·ा ·लेजा फाडऩे ·े लिए नाखून और दांत हो तो दूसरा समूह भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों ·ो सुरक्षा ·वच ·े अंदर रख·र उस·ा हर तरह से बचाव ·रने ·ी ·ोशिश ·र रही है। यह भी सर·ार न्यापालि·ा ·ो सर·ार ·ो
इस दरमियान पहला समूह(आम जनता) अपने अगुवा ·े पक्ष में समर्थन व्यक्त ·र चु·ा है तो दूसरा समूह अगुवा पर चौतरफा हमले ·र रहा है जिससे अगुवा ·ी छवि धूमिल हो, ले·िन बहुमत ·ी सर·ार संविधान ·े अनुसार जो जनता से ता·त ग्रहण ·रती है, वह जनता ·ा विश्वास लगातार खो रही है। ·ुछ धर्मगुरु भी सर·ार ·ी ·ठपुतली बन जन आंदोलन ·ो निशाना बना रहे हैं, ऐसे में वे ·हीं नहीं ·हीं अपने ·ो भ्रष्टाचार में लिप्त होने ·ी आशं·ा ·ो जन्म दे रहे हैं साथ ही अपनी विश्वसनीयता खत्म ·र रहे हैं। अब तो जनता बोले आर या पार।
सर·ार द्वारा ·भी इस जनयुद्ध ·ो मीडिया प्रायोजित ·हा जाता है तो ·भी ·ुछ और, ले·िन सवाल यह है ·ि क्या मीडिया अछूत है जो उस·ा प्रायोजित आंदोलन गलत हो जाय या जनता ·ी बात ·रना उसे अस्पृश्य बनाता है, जब·ि मीडिया ·ा दायित्व यही है ·ि जो हो रहा है वह जनता त· पहुंचाया जाय, वह जनता और सर·ार ·े बीच ·ा माध्यम बने। फिर जब चुनाव और अन्य मौ·ों पर जब नेता मीडिया ·ो इस्तेमाल ·रते हैं तब मीडिया इन·े लिए सही क्यों होती है।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2010

अखबार



दिन की शुरुआत का इंजन,

पथ निर्धारक समय की झांकी

बस इतना ही,

नहीं

काले अक्षरों का पुलिंदा भर नहीं,

नींद तोड़ने के छींटें हैं एक-एक शब्द

वंचितों की उम्मीद,

संघर्ष की पतवार हैं

ये अखबार

बनाने के पीछे,

लगे हैं हजारों हाथ, दिमाग

यन्त्र चालित नहीं,

विचारों की लौ के रक्षक

कुछ छूट गए,

कुछ त्याग दिए गए को,

अप्रासंगिक बनने से बचाने के लिए,

पहरुए

एक गलती, खेमा बदलने की

गरीब कमजोर से समर्थ मजबूत की ओर,

सिपाहियों की,

कर देता है पानी-पानी

बुधवार, 18 फ़रवरी 2009

बंदिशों में है आजादी.

चुनाव आयोग ने चुनाव पूर्व सर्वे पर ४८ घंटे पूर्व रोक लगा दी है....यह प्रेस की अभिव्यक्ति की आजादी और जनता के सूचना के अधिकार दोनों पर बंदिश है...क्योंकि जनता के पास क्या इतनी ताकत (अधिकार)यह जानने की नही होनी चाहिए की उसका वोट असर कारक हो रहा है की नही.और नही हो रहा है तो अगले चरण में उसके लिए एकजुट होकर परिवर्तन की डगर पर चलने के लिए पहल कर सकें. या नेता यह मानते हैं की जनता इतनी बेवकूफ है की हर घटना का उसपर बुरा असर ही पड़ेगा....जबकि संविधान सभा में जब मताधिकार केवल पढ़े लिखे लोगो को देने की बात की गई तो नेहरू जी ने कहा था....जो अनपढ़ जनता अपनी आजादी के लिए लड़ सकती है.वह बुद्धिमान है और उसे भी अधिकार मीलना चाहिए.....फ़िर परदा क्यों॥यह शायद इसी देश में सम्भव है की एक साथ कोई चीज दी भी जाती है और नहीं भी।मतलब हम भूलें रहें इसके लिए झून्झूना पकडाया जाता है लेकिन उसमे से आवाज नही आएगी वह शोपिश ही रहेगा....इससे पूर्व सरकार ने भी इसी तरह के दिशा निर्देश जारी किए थे॥
निर्वाचन आयोग ने मीडिया के लिए विस्तृत दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा है, "चुनाव के दौरान यदि मतदाताओं के बीच जनमत सर्वेक्षण किया गया है तो एक चरण में होने वाले चुनावों में इसका प्रकाशन या प्रसारण पर मतदान ख़त्म होने के 48 घंटों पहले से रोक लग जाएगी."
कई चरण में होने वाले चुनाव के लिए यह रोक अंतिम चरण का मतदान ख़त्म होने तक जारी रहेगा ........निर्वाचन आयोग
आयोग के अनुसार, "यह रोक प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक दोनों मीडिया पर रहेगी"

बुधवार, 3 दिसंबर 2008

मीडिया की कारगुजारी

मीडिया की भारी गलतियों की वजह से (सीधा प्रसारण ) आतंकवादियो को रणनीति बनाने में आसानी हुई । क्या मीडिया की यही जिम्मेदारी है ? जिसके सीधे प्रसारण के कारन कई नागरिको और पर्यटकों को अपनी जान गंवानी पड़ी । सवाल यह है की मीडिया कब अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगी ?

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

मानसिक दिवालिये पन के शिकार नेता (एक अपील अध्यक्ष जी के नाम)

यह माना जाता है की जब कोई सियार हुआ-हुआ करना शुरू करता है तो सारे सुरु कर देते हैं.मुंबई बम बिश्फोत के बाद जनता के बिरोध प्रदर्शनों के बाद ये आत्म्लुब्ध अकर्मण्य नेता तिलमिला गए हैं.और सारे के सारेएक ही सुर में बोलना शुरू कर दिए हैं।

कुछ नेता स्वयं को ही लोकतंत्र और प्रजातान्त्रिक संस्था समझाने लगे हैं.और अपने खिलाफ विरोध प्रदर्शन पर तिलमिला गए हैं।
नकवी ने कहा-कुछ संगठनो ने आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की जगह लोकतंत्र के खिलाफ जंग छेड़ दी है,इस तरह के प्रदर्शनों से वे लोकतंत्र के प्रति अविश्वास पैसा कर रहे है जम्मू कश्मीर में यही कम आतंकवादी कर रहे हैं.यह वक्त पाक प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होने का है,नाकि प्रजातान्त्रिक संस्थाओं के खिलाफ असंतोष पैदा करने का ,साथ ही कहा कुछ महिलाएं लिपस्टिक पाउडर लगाकर नेताओं के खिलाफ प्रदर्शन कर रही हैं,उनमे और कश्मीरी आतंकियों में कोई फर्क नही हैदोनो लोकतंत्र और उसमे शामिल लोगो के खिलाफ हैं।

राय- दुखी और पीडितो के दुःख को नकवी नही देख पाए लेकिन लिपस्टिक देखा ,यह बताता है नकवी की निगाह कहा रहती है और औरतो के प्रति कितना सम्मान इनमे है,क्या महिला आयोग कोई एक्शन लेगा...इन्हे आतंकी कहना, इनके मानसिक दिवालियेपन को ही दिखाता है,और मानसिक दिवालिये नेता हमारे सांसद विधायक होने की योग्यता नही रखते यह संविधान में लिखा है....चुनाव आयोग को इसकी जांचकर इनको अयोग्य ठहराना चाहिए...

माकपा के वी एस अच्च्युतानान्दन ने कहा-अगर वो संदीप (मुंबई में शहीद मेजर )का घर न होता तो वह कुत्ता भी झांकने न जाता.(संदीप के पिता द्वारा मिलाने से इनकार कराने पर )
राय-क्या इनसे कोई पूछने वाला है की आप मुख्यमंत्री न होते तो क्या होते....ऐसे गैर जिम्मेदाराना बयां बताते है की यह पड़संभालने लायक यह नही बचे....ये इस्तीफा दे.कितने संवेदनशील है यह भी बताता है.साथ ही संसद या विधानसभा का सदस्य होने की योग्यता इनमे है की नही आयोग जांच करे॥
राकपा नेता का बयान-प्रफुल्ल पटेल कहते हैं -आतंकी घटना के लिए केवल राजनितिक दल या नेता जिम्मेदार नही है,सुरक्षा अधिकारी भी दोषी हैं इसके अलावा आम जनता की भी जिम्मेदारी बनती है की वह सतर्कता बरते....
राय-जब अधिकारियों को संभाल नही पा रहे हो तो आतंकियों को क्या संभालोगे इस्तीफा दो...फ़िर सुरक्षा गार्डों के साए में क्यों टहलते हैं...आज तक आतंकी हमले में कितने नेता मरे कितने आम आदमी हिसाब दो.अभी ब्लॉग लिखे जाने तक किसके ऊपर आए किसे पता॥
नीतिश ने कहा-हमारे ख़िलाफ़ ऐसे प्रदर्शन अनुचित है..इससे लोकतंत्र पर असर पङता है ये तरिका अनुचित है॥हम जनता के प्रतिनिधि हैन्हामे इनके दर्द का अहसास है...
राय-दर्द का एहसास होता तो तो छोटे से विरोध पर इतना बुरा ना लगता वो भी तब जब हर बार शिकार आम आदमी ही होता है..उसमे असुरक्षा की भावना है..और वह शिकार है....
क्या आप बेशर्म नही है?क्या अमेरिक में नेता नही है?क्या वहा दोबारा आतंकी हमला हुआ.


शनिवार, 4 अक्टूबर 2008

.........काश उजाला दिल में आए

विजयादशमी का महत्त्वपूर्ण पर्व आने वाला है.जिसका सभी भारतीय जनमानस खासकर हिंदू और बाज़ार बेसब्री से इंतजार करता है.विजयादशमी सच और न्याय का असत्य और अन्याय पर विजय का त्यौहार है,जिसके बाद खुशियों की बरसात दीपावली के रूप में आती है.
इस बार लगता है आसुरी अर्थात आतंकवादी शक्तियां उत्साह में है जो लगातार धमाके कर अशांति फैला रही हैं.इस पर्व पर हम कामना करते हैं की उनके अन्दर का असुर मर जाए और वे शान्ति का रास्ता अखतिआर करें, भारत में खुशहाली आए .

गुरुवार, 11 सितंबर 2008

अजब दुनिया

ऐ दुनिया भी क्या खूब है..कब क्या हो जाय कहा नही जा सकता .गंजे लोग अपने बाल उगाने के लिए क्या-क्या जातां नही करते और कही न कहीं उन्हें सर पर बाल न होने का अफ़सोस होता था,लेकिन अब बाज़ी पलट गई है.न्यू जीलैंड की एक एयर लिनस कंपनी गंजो के सर पर अपना विज्ञापन देने जा रही है,जिसके उन्हें १००० डॉलर मिलेंगे ...मतलब शुद्ध मुनाफा न बालो को सवारने में कोई खर्च औरअब उसका व्यावसायिक उपयोग अब तो बल वालो को भी इनसे रश्क होगा क्योंकि महगाई बढती जा रही है.

बुधवार, 10 सितंबर 2008

कोसी के बहाने

बिहार प्रान्त में कोसी नदी में आई बाढ़ ने करीब ३५ लाख लोगो को प्रभावित किया है इस बाढ़ ने अरबों रूपये की संपत्ति को भी तहस नहस कर दिया है.सरकार सेना नागरिक और अन्य संगठन इससे निपटने की कोशिश कर रहे हैं.और व्यवस्था को पटरी पर लाने में लगे हैं ?किंतु इस बाढ़ ने हमारे सामने कुछ प्रश्न खड़े कर दिये हैं.जिनके जवाब ढूढना बेहद जरूरी है।

पहली ऐसी विपत्तियों के आ ही जाने के बाद इससे निपटने के लिए हम कितने तैयार हैं?क्योंकि बाढ़ के आने ने बाद लोग कई दिनों तक बाढ़ में फंसे रहे उन्हें बचाव और राहत सामग्री के लिए कई दिनों तक इंतजार करना पड़ा..और भोजन के पैकेट गिराए गए तो भीड़ के बीच जरूरत से कम पैकेट गिराए गए.जिससे छीना झपटी और आराजकता की घटनाएं घटी.अराजकता से निपटने की योजना हमारे पास है ?और ऐसी स्थिति में होने वाले अपराधों से निपटने में क्या हम सक्षम है? समाचारों में ऐसी खबरें भी आई हैं की जान बचाने के लिए नाविकों ने पर व्यक्ति हजारों रूपये चार्ज किए .क्या ऐसी स्थितियों में भी हम अपना स्वार्थ त्याग नही सकते लोलुपता की यह कैसी सामाजिक व्यवस्था है? ये घटनाएँ तब घाट रही हैं जब हमने आपदा प्रबंधन के लिए बाकायदा बोर्ड बना रखे हैं.
एक खामी यह दिखायी दी की नौकर शाही और अन्य संगठनो में समन्वय का अभाव है.ख़बर यह आई है की सेना को बचाव कार्य के लिए नौकरशाही से कई दिनों तक आदेश का इंतज़ार करना पडा.क्या कोई भी देश एक ही व्यक्ति और संगठन चला पायेगा?.और तब जब इसी देश में समन्वय की यह कल्पना की गई हो और उसकी शक्ति का बखान किया गया हो-


विकल व्यस्त विखरे पड़े हैं,शक्ति के विद्युत् कण निरूपाय

समन्वित करें जो इनको,विजयिनी मानवता हो जाय ।

- जयशंकर प्रसाद


पानी कम होने के बाद बिमारियों के फैलाने की भी खबरें आई थी.
एक दूसरा सवाल ऐसी आपदाओं को आने से रोकने से सम्बंधित है.कोशी के लिए गठित हाई लेवल कमिटी ने जब जून से पहले बाँध को रिपेयर कर लेने का आदेश दिया था तो इस पर काम क्यों नही हुआ इसका जवाब आना बाकी है.क्या हम इस तरह की दुर्घटना को रोकने का प्रयास कर रहे हैं.की मौत का नंगा नाच देखना हमारी आदत में शुमार हो गया है।

तीसरा सवाल द्र्घतना के बाद नेपाल के बयान से संबधित है.हमारी विदेशनीति किस ओर बढ़ रही है की हमारे पड़ोसी केवल हमें संदेह की दृष्टि से ही देख रहे हैं.प्रचंड पिछली संधियों की समीक्षा की बात कह रहे हैं और यह की भारत ने नेपाल से जो संधि की है वह तर्क सांगत नही है.क्या यह चीन का प्रभाव है और है तो क्यों?
एक सवाल यह भी की पर्वत पहाड़ नदी घाटी में अनावश्यक गतिविधिया बढ़ने का दंड प्रकृति ने तो नही दिया है और इसके बाद क्या? .शायद प्रकृति हमें सावधान भी कर रही थी की सावधान छेड़-छड़ न करो नही तो हम तुम्हे सबक भी सिखा सकते हैं. अंत में दुष्यंत कुमार की पंक्तियों से मैं अपनी बात समाप्त करूंगा।

बाढ़ की संभावनाएँ सामने हैं,

और नदियों के किनारे घर बने हैं ।

चीड़-वन में आँधियों की बात मत कर

,इन दरख्तों के बहुत नाज़ुक तने हैं ।

मंगलवार, 19 अगस्त 2008

खेल और भारत

लो ओलंपिक में भारत की एक और उम्मीद अखिल को मुह की खानी पड़ी.दोष टीम मैनेजमेंट की रणनीति को दिया जा रहा है.आख़िर कब तक रणनीति बनाने वालो की वजह से बड़े मंचो पर यह एक अरब से ज्यादा की आबादी वाला देश खाली हाथ या कुछ एक पदक लेकर लौटता रहेगा।
फ़िर भी यह ओलंपिक ख़ास रहा है क्योंकि अभिनव के व्यक्तिक प्रयास से पहली बार ओलंपिक में किसी व्यैक्तिक स्पर्धा में स्वर्ण जीतने का स्वाद हमें मिला.यह स्पर्धा हमारे लिए उम्मीद पैदा करने वाला रहा क्योंकि अखिल ,सा इना नेहवाल समेत अनेक खिलाड़ी नजदीकी मुकाबले हारे.जिससे आगे एक किरण दिखाई देती है।
अखिल ने जिस तरह विश्व चैम्पियन को हराया वह हमरे लिए गौरव की बात है.लेकिन इन खेलो के प्रशिक्षण में आने वाले खर्च को देखते हुए कहा जा सकता हैं बड़े मंचो पर पदक जीतना गरीबो के लिए मुश्किल होता जा रहा है,ये और बात है की रास्ते भले कठिन हो जीतना उनके लिए नामुमकिन नही है.लेकिन बदली परिस्थितियों में सरकार की तैयारी निराश करने वाली दिखाई पड़ती है।
राष्ट्रमंडल खेलो से पहले ,अगर सरकार चेत जाती है तो शायद हम बे-आबरू होने से बच सकते हैं । जबकि इसके लिए समय रेत की तरह हाथ से फिसलता जा रहा है.और अभी डेल्ही में इसके लिए जरूरी आधारभूत संरचना का भी विकास नही किया जा सका है,इसके बावजूद सरकार इस स्पर्धा को पर्यटन के ही लिहाज़ से देख रही है,खेल से नही.बिना नजरिया बदले पदक की उम्मीद बेमानी है।